स्मृति विशेष : प्रखर हिंदूवादी राजनेता थे कल्याण सिंह, राम मंदिर के लिए छोड़ी थी सीएम की कुर्सी, पूरा मंत्रिमंडल लेकर गए थे अयोध्या
—बच्चों को पढ़ाते-पढ़ाते बन गए राजनीति के मास्टर-5 जनवरी को मनाई जाएगी जयंती - दाे बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे लखनऊ, 04 जनवरी (हि.स.)। भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता रहे प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की जयंती 5 जनवरी को है
पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह


—बच्चों को पढ़ाते-पढ़ाते बन गए राजनीति के मास्टर-5 जनवरी को मनाई जाएगी जयंती

- दाे बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे

लखनऊ, 04 जनवरी (हि.स.)। भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता रहे प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की जयंती 5 जनवरी को है। राजनीतिक शख्सियत के रूप में उनके नाम कई रिकार्ड दर्ज हैं। राम मंदिर के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने और जेल जाने का साहस भी वही दिखा सके। वे इस बात का भी उदाहरण हैं एक सामान्य परिवार में जन्म लेकर भी व्यक्ति भी अपनी सूझबूझ, मेहनत और ईमानदारी से सत्ता के सर्वोच्च शिखर तक पहुंच सकता है।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में बाबूजी के नाम से चर्चित कल्याण सिंह राजनीति में आने से पहले अपने गृह जनपद अलीगढ़ में शिक्षक थे। इसी अवधि में राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ से जुड़कर समाजसेवा के क्षेत्र में सक्रिय हो गए और यहीं बच्चों को पढ़ाते -पढ़ाते खुद राजनीति के भी मास्टर बन गए। वे 1967 से लेकर वर्ष 2002 तक दस बार विधायक रहे। वे मंत्री, मुख्यमंत्री, राज्यपाल, सांसद रहे।

पहली बार 1967 में बने विधायक— इमरजेंसी में 20 महीने जेल में रहे

राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ में सक्रिय होने से उनका दायरा बढ़ने लगा। पहली बार 1967 में जनसंघ के टिकट पर अलीगढ़ जिले की अतरौली सीट से विधायक चुने गये। संघ से जुडे़ होने के कारण इन्हें आपातकाल में जेल भेजा गया और उन्हें लगभग 20 माह तक जेल में बिताने पडे़। इस बीच जनसंघ का जनता पार्टी में विलय हो गया ताे वे भी जनता पार्टी में आ गए। आपात काल खत्म होने के बाद जब 1977 में चुनाव हुए तो देश और प्रदेश में जनता पार्टी सरकार बनी । उत्तर प्रदेश में राम नरेश यादव के मुख्यमंत्रित्व में कल्याण सिंह स्वास्थ्य मंत्री बने, लेकिन यह सरकार आपसी विवादों में उलझ गई और विपक्ष बंट गया। 1980 में भाजपा की स्थापना के बाद कल्याण सिंह का कद तेजी से बढ़ा लेकिन भाजपा सत्ता से दूर ही रही। प्रदेश में राजनीतिक उठापटक तब शुरु हुई जब विश्व हिंदू परिषद के नेतृत्व में अयोध्या में राम मंदिर​ आंदोलन शुरु हुआ।

कल्याण सिंह पहली बार बने मुख्यमंत्री

90 के दशक में मंडल कमंडल की राजनीति के बीच पिछडे़ वर्ग लोधी जाति से आने वाले कल्याण सिंह का राजनीति में कद लगातार बढ़ता गया। राम मंदिर आंदोलन के कारण उनकी छवि एक राम भक्त की बन गई। वे गिरफ्तार भी हुए । 30 अक्टूबर 1990 में मुलायम ​सिंह यादव सरकार में जब अयोध्या में कारसेवकों पर ​गोलियां चलीं और तो पूरे देश में हिंदू एकजुट हो गया। भाजपा ने कल्याण सिंह के नेतृत्व में उप्र विधानसभा चुनाव लड़ा और पहली बार भारतीय जनता पार्टी को बहुमत मिलने पर सरकार बनी और कल्याण सिंह जून 1991 में मुख्यमंत्री बने । वे पूरे मंत्रिमंडल के साथ राम लला के दर्शन करने गए और राम मंदिर निर्माण का संकल्प लिया। वे कार्यकाल पूरा करते कि इसके पहले 6 दिसंबर 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचा गिरा और उन्होंने इसकी जिम्मेदारी लेते हुए मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया था।

एक नहीं कई सरकारें न्योछावर कर दूं

केंद्र सरकार द्वारा अपनी सरकार बर्खास्त कर दिए जाने पर उन्होंने कोई दुख व्यक्त नहीं बल्कि कहा कि वे राम लला के लिए एक—दो नहीं बल्कि कई सरकारें बलिदान करने में संकोच नहीं करेंगे। हालांकि इसके कुछ साल के अंतराल के बाद प्रदेश में फिर भाजपा सरकार बनी और उन्होंने दूसरी बार सीएम पद की शपथ ली । सरकार गति पकड़ती लेकिन इसके पहले ही सत्ता और भाजपा में तरह-तरह के विवाद होने लगे और उन्हें कुर्सी छाेड़नी पड़ी।

भाजपा छोड़ी लेकिन फिर लौटे

राजनीति हमेशा एक जैसी नहीं रहती और उत्तर प्रदेश में सत्ता मिलने के बाद भाजपा में उठापटक शुुरु हो गई। नेतृत्व के साथ विवादों के बाद उन्हाेंने भाजपा से अलग होकर अपनी पार्टी बनाई और सपा के सहयोग से निर्दलीय चुनाव लड़कर सांसद भी बने। कल्‍याण सिंह अपने लंबे राजनीतिक जीवन में अक्सर सुर्खियों में रहे। मस्जिद विध्वंस मामले में अदालत में लंबी सुनवाई चली। भाजपा नेतृत्व की सहमति के बाद वे फिर भाजपा में लौट आए। लेकिन वे पहले की तरह न तो प्रदेश की राजनीति में प्रभावी बन पाए और न ही वे भाजपा में पहले जैसा सम्मान ही हा​सिल कर पाए।

कुशल और सख्त प्रशासक की छवि

पहले स्वास्थ्य मंत्री और फिर मुख्यमंत्री के रूप में कल्याण सिंह की प्रशासनिक कामकाज की सराहना की जाती है। उनके सख्त फैसलों से जनता के बीच कुशल प्रशासक की छवि बनी। उत्तर प्रदेश में माफियाें और अपराधों पर अंकुश लगा। कल्याणकारी योजनाएं लोगों तक पहुंची। नकल विरोधी अध्यादेश ने उनकी सरकार को बड़ी पहचान दी।

पहली बार राज्यपाल बने

भाजपा में घर वापसी करने के बाद 2014 के लाेकसभा चुनाव में उन्हाेंने बहुत मेहनत की। भाजपा काे केंद्र में बहुमत मिला और केंद्र सरकार उन्हें 26 अगस्त 2014 को राजस्थान का राज्यपाल नियुक्त किया। उन्हें जनवरी 2015 में हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल का भी अतिरिक्त कार्यभार सौंपा गया। राज्यपाल का कार्यकाल पूरा होने के बाद सितंबर 2019 में लखनऊ लौटे और फिर से भारतीय जनता पार्टी में सक्रिय हो गए।

पद्मविभूषण से सम्मानित

उत्तर प्रदेश के जनपद अलीगढ़ जिले के मढ़ौली ग्राम में तेजपाल सिंह लोधी और सीता देवी के घर पांच जनवरी 1932 को जन्मे कल्‍याण सिंह ने स्नातक तथा साहित्य रत्न (एलटी) की शिक्षा प्राप्त की। वे विद्यालय में शिक्षक बने। राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ से जुडे़ और फिर राजनीति के​ शिखर पहुंचे। उन्हें समाज सेवा, राजनीति में उत्कृष्ट कार्य के लिए वर्ष 2022 में भारत का दूसरा सर्वोच्च पुरस्कार पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया। उनकी मृत्यु 21 अगस्त 2021 को हुई।

अब बेटा और पोता संभाल रहे विरासत

प्रदेश के पूर्व सीएम कल्याण सिंह की राजनीतिक विरासत उनके बेटे राजवीर सिंह और पौत्र संदीप सिंह संभाल रहे हैं। राजवीर एटा से सांसद रह चुके हैं जबकि संदीप सिंह वर्तमान में योगी सरकार में बेसिक शिक्षा मंत्री हैं।

हिन्दुस्थान समाचार / शिव सिंह