सनातन संस्कृति की जीवंत, सतत और अक्षय चेतना का उद्घोष है प्रयागराज
- माघ मेला : तप, संयम और साधना का पर्व प्रयागराज, 04 जनवरी(हि.स.)। तीर्थराज प्रयाग की पावन धरा पर माघ मेले का शुभारंभ पौष पूर्णिमा के स्नान से हो चुका है। शिशिर ऋतु की मंथर शीतलता, त्रिवेणी के तट पर प्रवाहित दिव्य नाद और कल्पवासियों की तपस्वी उपस
प्रयागराज—माघ मेला


- माघ मेला : तप, संयम और साधना का पर्व

प्रयागराज, 04 जनवरी(हि.स.)। तीर्थराज प्रयाग की पावन धरा पर माघ मेले का शुभारंभ पौष पूर्णिमा के स्नान से हो चुका है। शिशिर ऋतु की मंथर शीतलता, त्रिवेणी के तट पर प्रवाहित दिव्य नाद और कल्पवासियों की तपस्वी उपस्थिति हो चुकी है। यह समूचा वातावरण समूची मानव सभ्यता की आध्यात्मिक स्मृति का साक्ष्य है। सनातन संस्कृति की जीवंत, सतत और अक्षय चेतना का प्रयागराज उद्घोष है।

ज्योतिषाचार्य अविनाश चन्द्र राय ने कहा कि माघ मेला आरंभ होते ही प्रयागराज एक बार फिर उस चेतना-केंद्र के रूप में जाग उठा है, जहां धर्म केवल आस्था नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टि बनकर प्रवाहित होता है। यह वही प्रयागराज है, जहां काल स्वयं ठहरकर साक्षी बनता है। इतिहास, पुराण व वर्तमान एक ही क्षण में समाहित हो जाते हैं।

उन्होंने कहा कि बीते वर्ष 2025 में आयोजित महाकुंभ की स्मृति अभी भी विश्व के मानस पटल पर ताजा है। उस महाकुंभ में केवल करोड़ों भारतीय ही नहीं, बल्कि विश्व के कोने-कोने से आए लोग संगम तट पर उपस्थित थे। कैमरों, शोध-पत्रों, वृत्तचित्रों और अध्ययनों के माध्यम से पूरी दुनिया ने देखा कि सनातन संस्कृति कोई बीती हुई परंपरा नहीं, बल्कि आज भी जीवित और गतिशील चेतना है। उस समय यह कहा जाना अतिशयोक्ति नहीं था कि पूरी दुनिया संगम की ओर देख रही थी और विश्व सनातन संस्कृति में डूबा हुआ था। माघ मेला 2026 उसी निरंतरता का अगला अध्याय है- एक शांत, संयमित और साधनात्मक अध्याय।

तीर्थ परंपरा का पथप्रदर्शक प्रयागराज

प्रो. राजेन्द्र त्रिपाठी 'रसराज' की मानें तो प्रयाग का संगम मात्र नदियों का संयोग नहीं है। यह तत्वों का समन्वय है। गंगा-सत्त्व का प्रतीक, यमुना-कर्म का प्रवाह और अन्त:सलीला सरस्वती ज्ञान की सूक्ष्म धारा। इन तीनों का संगम मानव जीवन की पूर्णता का दार्शनिक प्रतिरूप है। भारतीय मनीषा ने प्रयाग को 'तीर्थराज' कहा कि राजा इसलिए नहीं कि वह सर्वोपरि है, बल्कि इसलिए कि वह मार्गदर्शक है। जैसे राजा प्रजा को दिशा देता है, वैसे ही प्रयाग सम्पूर्ण तीर्थ परंपरा को अर्थ प्रदान करता है। यही कारण है कि शास्त्रों में कहा गया कि प्रयागे स्नानमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते। यहां स्नान देह का नहीं, चेतना का परिष्कार है।

आत्मचिंतन का क्षण था महाकुंभ 2025, विश्व ने सनातन को देखा

ओंकारनाथ त्रिपाठी ने कहा कि 2025 का महाकुंभ केवल जनसमूह का दृश्य नहीं था। वह सभ्यताओं के संवाद का विराट मंच था। आधुनिक विश्व, जो भौतिक प्रगति के शिखर पर खड़ा होकर भी मानसिक अशांति से ग्रस्त है, उसने प्रयाग में आकर यह प्रश्न स्वयं से पूछा कि क्या विकास का कोई आध्यात्मिक विकल्प भी है? उत्तर संगम तट पर मौन में उपस्थित था। करोड़ों लोग बिना किसी केंद्रीकृत आदेश के अनुशासन में थे। न कोई बाध्यता, न कोई नियंत्रण, केवल आंतरिक स्वीकार। यही सनातन संस्कृति की शक्ति है। यह मनुष्य को बांधती नहीं, जागृत करती है।

माघ मेला : तप, संयम और साधना का पर्व

उन्होंने बताया कि कुंभ जहां विराटता का प्रतीक है, वहीं माघ मेला संयम और अंतर्मुखता का पर्व है। यहां शोर कम होता है, साधना अधिक। कल्पवास की परंपरा, मौन, स्नान, जप और ध्यान। ये सभी मनुष्य को उसके भीतर की यात्रा पर ले जाते हैं। यही कारण है कि माघ मेला केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मानसिक शुद्धि का उत्सव है।

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हिन्दुस्थान समाचार / राजेश