हिमाचली शॉलों ने रचा इतिहास, एक मंच पर 4,023 शॉलों के साथ बना गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड
शिमला, 04 जनवरी (हि.स.)। शिमला के ऐतिहासिक रिज मैदान पर ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने हिमाचल प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को एक नई पहचान दी। ठंडी हवा के बीच जब एक साथ हजारों पारंपरिक हिमाचली शॉलें प्रदर्शित की गईं, तो यह पल सिर्फ एक आयोजन तक सीमित
हिमाचली शॉल की प्रदर्शनी


शिमला, 04 जनवरी (हि.स.)। शिमला के ऐतिहासिक रिज मैदान पर ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने हिमाचल प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को एक नई पहचान दी। ठंडी हवा के बीच जब एक साथ हजारों पारंपरिक हिमाचली शॉलें प्रदर्शित की गईं, तो यह पल सिर्फ एक आयोजन तक सीमित नहीं रहा। यह क्षण हिमाचल की सदियों पुरानी हथकरघा परंपरा, बुनकरों की मेहनत और सामूहिक प्रयास का प्रतीक बन गया। इसी मंच से हिमाचल प्रदेश ने गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज कराया।

हिमाचल प्रदेश सरकार के उद्योग विभाग ने एक ही स्थान पर सबसे अधिक हस्तनिर्मित शॉलों के प्रदर्शन का रिकॉर्ड बनाया। इस आयोजन में कुल 4,023 शॉलों को एक साथ प्रदर्शित किया गया, जिसे गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स की टीम ने आधिकारिक रूप से सत्यापित किया। यह रिकॉर्ड शिमला में आयोजित तीन दिवसीय हिम एमएसएमई फेस्ट के पहले दिन शनिवार को कायम हुआ।

इस प्रदर्शनी में प्रदेश के सभी 12 जिलों से आए कारीगरों और महिला स्वयं सहायता समूहों की भागीदारी रही। कुल्लू, किन्नौर, चंबा, कांगड़ा और सिरमौर की शॉलें दर्शकों के आकर्षण का केंद्र बनीं। अलग-अलग क्षेत्रों की शॉलों में स्थानीय परंपरा, रंगों का संयोजन और बुनाई की विशिष्ट शैली साफ दिखाई दी। बहुरंगी पैटर्न और जटिल डिजाइन ने हिमाचल की बुनाई कला की गहराई को दर्शाया।

हिमाचली शॉलें अपनी गुणवत्ता और पारंपरिक निर्माण प्रक्रिया के लिए जानी जाती हैं। इन शॉलों में भेड़, अंगोरा और पश्मीना की ऊन का इस्तेमाल किया जाता है। पूरी तरह हाथ से बुनी गई इन शॉलों को तैयार करने में कई बार महीनों का समय लग जाता है। प्रदर्शनी में मौजूद शॉलों की कीमत उनकी बुनाई और ऊन की गुणवत्ता के अनुसार तय की गई थी। कुछ शॉलों की कीमत दो लाख रुपये तक बताई गई, जो कारीगरों की मेहनत और कौशल को दर्शाती है।

हिमाचल में शॉल केवल पहनने का वस्त्र नहीं है। यह राज्य की सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक परंपराओं से गहराई से जुड़ी हुई है। विवाह, धार्मिक आयोजनों और सरकारी समारोहों में अतिथियों को शॉल और टोपी पहनाकर सम्मानित करने की परंपरा आज भी निभाई जाती है। यही कारण है कि हिमाचली शॉल सम्मान और अपनत्व का प्रतीक मानी जाती है।

यह आयोजन उद्योग विभाग, हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा हिमाचल प्रदेश हैंडीक्राफ्ट्स एंड हैंडलूम कॉरपोरेशन लिमिटेड के सहयोग से आयोजित किया गया। सरकार का उद्देश्य स्थानीय बुनकरों की कला को मंच देना, पारंपरिक हस्तकरघा को जीवित रखना और हिमाचली शॉलों को वैश्विक पहचान दिलाना रहा। इस तरह के आयोजनों से ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले बुनकरों को सीधे बाजार से जुड़ने का अवसर मिलता है।

गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में शामिल होने का प्रमाण पत्र मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू को सौंपा गया। इस अवसर पर उद्योग मंत्री हर्षवर्धन चौहान, प्रशासनिक सचिव और राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। मुख्यमंत्री ने इसे पूरे हिमाचल प्रदेश के लिए गर्व का क्षण बताया। उन्होंने कहा कि इस उपलब्धि से प्रदेश के हथकरघा उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि हिमाचल की हैंडलूम परंपरा हजारों परिवारों की आजीविका का आधार है। राज्य सरकार कारीगरों को प्रशिक्षण, बेहतर विपणन सुविधा और आधुनिक संसाधन उपलब्ध कराने के लिए लगातार काम कर रही है। इस रिकॉर्ड से युवा पीढ़ी भी पारंपरिक बुनाई से जुड़ने के लिए प्रेरित होगी।

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हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा