Enter your Email Address to subscribe to our newsletters

कुलपति प्रो. बलदेव राज कम्बोज ने वैज्ञानिक को दी बधाई
हिसार, 04 जनवरी (हि.स.)। हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक प्रोफेसर
ओपी चौधरी ने मधुमक्खी बक्से के लिए मल्टीपरपज डिस्पेंसर बनाया है। इस खोज के लिए भारत
सरकार से डिज़ाइन पेटेंट संख्या 320896-00 मिला है।
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बलदेव राज कम्बोज ने वैज्ञानिक प्रो. ओपी चौधरी
द्वारा अर्जित के गई इस उपलब्धि के लिए उन्हें बधाई दी है। कुलपति प्रो. कम्बोज ने
रविवार काे बताया कि ‘मधुमक्खी बक्से के लिए मल्टीपरपज डिस्पेंसर’ एक विशेष यंत्र है
जिसे मधुमक्खियों को नुकसान पहुंचाने वाले विभिन्न प्रकार के कीड़ों व बीमारियों की
रोकथाम के लिए विकसित किया गया है। इस डिस्पेंसर द्वारा मधुमक्खी रोगों व कीटों की
रोकथाम के लिए प्रयुक्त सभी प्रकार के कीटनाशी, माइटनाशी, रसायन व दवाइयों के फ़ॉर्म्यूलेशंस
जैसे कि ठोस, द्रव, पाउडर, जैल आदि का प्रयोग विभिन्न रोगों वरोआ माइट, पैरासिटिक माइट
सिंड्रोम, अकरैपिस माइट, यूरोपियन फ़ाउल ब्रूड, मोमी पतंगा, आदि के रोकथाम के लिए किया
जा सकता है।
इस डिस्पेंसर की विशेषता यह है कि इसका प्रयोग मधुमक्खी बॉक्स में तल्पपट्टा,
फ्रेमों की टॉप बार, फ्रेमों के मध्य आदि किसी भी स्थान पर किया जा सकता है। इसके प्रयोग
से न केवल कार्यकुशलता व मधुमक्खियों की सुरक्षा सुनिश्चित होती है बल्कि शहद व अन्य
मधुमक्खी उत्पादों जैसे कि पराग, रॉयल जैली आदि में हानिकारक जहरीले रसायनों के अवशेषों
से भी बचाव होता है। इसीलिए भारत सरकार के पेटेंट ऑफिस नें इस आविष्कार के लिए इस मल्टीपरपज
डिस्पेंसर को डिज़ाइन पेटेंट प्रदान किया है।
मल्टीपरपज डिस्पेंसर का उपयोग मधुमक्खी की दोनों प्रजातिओं-एपिस मेलीफ़ेरा
व एपिस सेरेना- के बक्सों में सरलता से किया जा सकता है। यह मधुमक्खियों को रसायनों
के सीधे संपर्क में आने से बचाकर उन्हें पूरी तरह सुरक्षित रख कर इनके शत्रुओं का प्रभावी
नियंत्रण करता है। मल्टीपरपज डिस्पेंसर को वर्ष के सभी मौसमों-गर्मी, सर्दी, बरसात
आदि में मधुमक्खियों की दैनिक गतिविधियों में बाधा डाले बिना प्रयोग किया जा सकता है।
इसके विशेष डिज़ाइन के कारण मधुमक्खी पालक की कार्यकुशलता बड़ती है व मधुमक्खी पालन के कार्यों में मेहनत
भी काफी कम हो जाती है।
विश्वविद्यालय के करनाल स्थित क्षेत्रीय अनुसंधान केन्द्र के निदेशक प्रोफेसर
ओपी चौधरी ने बताया कि मधुमक्खियां पौधों के परागण द्वारा लगभग 1.12 लाख करोड़ रुपए
मूल्य की वृद्धि प्रतिवर्ष भारतीय अर्थव्यवस्था में करती हैं व इसके अतिरिक्त शहद जैसा
पौष्टिक आहार भी देती हैं। परंतु पिछले काफ़ी समय से कई बीमारियों व कीड़ों का आक्रमण
बहुत बढ़ा है। भारत में वरोआ माइट के वर्ष 2004 से आक्रमण लगभग 50-70 प्रतिशत मधुमक्खी
कालोनियां नष्ट हुई हैं। उनके द्वारा खोजे गए समन्वित वरोआ मैनेजमेंट विधि से भारत
में वरोआ माइट का प्रभावी नियंत्रण कर लिया गया है।
इस अवसर पर कुलसचिव डॉ. पवन कुमार, अनुसंधान निदेशक डॉ. राजबीर गर्ग, कृषि
महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. एसके पाहुजा व मानव संसाधन प्रबंधन निदेशक डॉ. रमेश कुमार
उपस्थित रहे।
हिन्दुस्थान समाचार / राजेश्वर