Enter your Email Address to subscribe to our newsletters

-हृदयनारायण दीक्षित
भारतीय संस्कृति उत्सवधर्मा है। यहां बारहों महीने उत्सव चलते हैं। 6 ऋतुएं हैं। प्रत्येक ऋतु के अपने उत्सव हैं। वर्षा और बसंत प्रकृति प्रायोजित उत्सव हैं। शिशिर और हेमंत का क्या कहना। होली सनातन उल्लास है। व्यक्ति की तरह समाज और राष्ट्र की भी ऊर्जा होती है। जैसे मनुष्य अपने शरीर को स्वस्थ रखने का प्रयास करते हैं, वैसे ही समाज और राष्ट्र को स्वस्थ रखने के प्रयास जरूरी हैं और यह प्रयास संस्कृतिधर्मा लोगों द्वारा किया जाता रहता है। उत्स का अर्थ होता है मूल। उत्सव का अर्थ है देश के मूल से जुड़ी सामाजिक सक्रियता।
संस्कृति मनुष्य की रचना है। संस्कृति का निर्माण सतत प्रवाही प्रक्रिया है। भारत के मन की संस्कारमय संस्कृति प्राचीन ज्ञान परंपरा में निहित है। भारत की संस्कृति का जन्म और विकास ज्ञान व दर्शन की परंपरा से हुआ है।
भारतीय दर्शन में बुध और जैन को मिलाकर आठ दार्शनिक धाराएं हैं। भारत के राष्ट्रजीवन के सभी धाराओं ने प्रभावित किया है। कपिल का सांख्य दर्शन अनिश्वरवादी माना जाता है। बुद्ध व जैन दर्शन भी ईश्वर की सत्ता को स्वीकार नहीं करते। अद्वैत वेदांत का प्रभाव काफी बड़ा है। अद्वैत की धारा शंकराचार्य के पहले से थी, लेकिन शंकराचार्य ने उपनिषदों, गीता और ब्रह्मसूत्र के तत्वों के आधार पर ब्रह्म को सत्य और जगत को मिथ्या कहा है। वे घर बैठ तर्क का आनंद उठाने वाले कार्यकर्ता नहीं थे।
शंकराचार्य ने देश की एकता को देखते हुए चार धामों की घोषणा की। उन्होंने उत्तर में ऊंचे पहाड़ों पर बद्रीनाथ धाम की स्थापना की और पश्चिम में द्वारका की। पूरब में जगन्नाथ पुरी की और दक्षिण में रामेश्वरम की। चारों स्थान पहले बहुत प्रतिष्ठित नहीं थे लेकिन शंकर की घोषणा के बाद वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हो गए।
भारत का मन उत्सवी है। भारतीयों की रुचि पर्यटन के बजाय तीर्थाटन में रही है। पर्यटन और तीर्थाटन में मूलभूत अंतर है। पर्यटन में अच्छा खाना, अच्छे होटल और अच्छी सुख-सुविधाएं जरूरी होती हैं, लेकिन तीर्थाटन में इन कारकों की महत्वपूर्ण आवश्यकता नहीं होती। तीर्थाटन में प्रायः किसी ऐसी जगह पर जाते हैं, जहां नदियां आपस में मिलती हैं। जहां प्रकृति खिलती है, जहां किसी न किसी देवता के दर्शन की अभिलाषा रहती है। प्रयागराज इसका जीवंत उदाहरण है। ऋषिकेश की पहाड़ियों के दरश परश से मन संगीतमय हो जाता है। ऋग्वेद में नदियों से पर उतरने के लिए उथले स्थल को तीर्थ बताया गया है। जहां से हम आसानी से नदी पार कर सकते हैं। उपासना परंपरा में किसी देवता के नाम से चले आ रहे पुण्य स्थान तीर्थ कहलाते हैं। कुंभ (प्रयागराज) में सारी दुनिया के लोग आते हैं। करोड़ों लोगों का यह एकत्रीकरण गंगा, जमुना व सरस्वती का संगम बनता है।
प्रयागराज दुनिया का आकर्षण है। ऐसे ही हरिद्वार, रामेश्वरम, तिरुपति, कांचीपुरम आदि अनेक स्थलों पर तीर्थ यात्री भूखे-प्यासे चले जाते हैं। अयोध्या, मथुरा, काशी ऐतिहासिक तीर्थ हैं। काशी में शिव दर्शन के लिए लाखों लोग आते हैं। वैसे भारतीय दर्शन में तीर्थाटन की तुलना में दर्शन को ज्यादा श्रेष्ठ बताया गया है।
शंकराचार्य ने एकमात्र ब्रह्म की सत्ता को सत्य मानते हुए कर्मकांड को भी उचित बताया है। उन्होंने काशी के प्रवास में अपना दर्शन सबको बताया था। ब्रह्म को एकमात्र सत्य और संसार को मिथ्या बताने वाले आचार्य शंकर के दर्शन ने परवर्ती संतों का ध्यान भी आकर्षित किया था। शंकराचार्य जगत् को मिथ्या बताते थे।
भारत स्वयं में एक तीर्थ है। सारी दुनिया को परिवार बताने वाला यह राष्ट्र शंकराचार्य जैसे दार्शनिकों की जन्मस्थली और कर्मस्थली है। आवागमन के साधन बढ़े हैं। शंकराचार्य के समय न साइकिल थी न रेल। आश्चर्य है कि आचार्य ने कैसे भारत भ्रमण किया होगा? अब आवागमन के व्रतगामी साधन बढ़े हैं। हजारों किलोमीटर की दूरी अल्प समय में तय की जा सकती है। आधुनिक सभ्यता के दबाव में देश के लोगों का एक वर्ग तनाव में रहता है। वह तीर्थाटन का मजा नहीं लेता। पर्यटन को महत्व देता है। पर्यटन से मानसिक शांति नहीं मिलती। तीर्थाटन से लौटे परिवार आनंद से भरे-पूरे दिखाई पड़ते हैं। भारत राष्ट्रजीवन के सभी क्षेत्रों में आत्मविश्वास से भरा-पूरा है। पर्यटन उद्योग बन गया है। पर्यटन की दृष्टि से महात्मा गांधी के जन्म और कर्म स्थान साबरमती जाना अपने आप में जीवंत अनुभव है। सरदार पटेल की प्रतिमा केवड़िया, गुजरात में दर्शनीय है। डॉक्टर आम्बेडकर के दिल्ली सहित कई स्थानों पर बने स्मारक दर्शनीय हैं। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में राष्ट्रीय प्रेरणास्थल भी दर्शनीय है।
यज्ञ में काफी धन लगता था। इसलिए पुण्य प्राप्त करने के लिए यज्ञ का विकल्प तीर्थ यात्रा बताया गया है। महाभारत वन पर्व के 42वें अध्याय में यज्ञ के विकल्प की चर्चा की गई है। पुलस्त्य भीष्म से कहते हैं कि, ”ऋषियों के अनुसार यज्ञ करने से इस लोक और परलोक में फल मिलता है। परंतु गरीब मनुष्य यज्ञों का अनुष्ठान नहीं कर सकते। उनके पास साधन नहीं होते। इसलिए जो साधनहीन हैं, वे तीर्थ यात्रा कर सकते हैं। तीर्थ यात्रा को यज्ञ के विकल्प के रूप में प्रस्तुत करते हुए कहते हैं, ”मनुष्य तीर्थ यात्रा से जो फल पाता है वह बड़े से बड़े यज्ञों से नहीं मिलता।”
महाभारत के रचनाकाल में ज्यादातर तीर्थ कुरुक्षेत्र के आसपास थे। पुष्कर तीर्थ का महत्व बताते हुए कहते हैं, ”पुष्कर में दस सहस्त्र कोटि तीर्थ का निवास रहता है।” यहां पुष्कर तीर्थ का महत्व बताने कि लिए दस खरब तीर्थों की उपस्थिति बताई गई है। बताते हैं कि पुष्कर में ब्रह्मा जी नित्य निवास करते हैं। यहां स्नान करने से अश्वमेघ यज्ञ का दस गुना फल मिलता है। पुष्कर तीर्थ ब्रह्मा से जुड़ा हुआ है।
महाकाल (उज्जैन) में शिव के दर्शन से हजार गोदान का फल मिलता है।
ऐसी बहस बहुत सी नदियां हैं, जिनमें स्नान करने से यज्ञ के फल मिलते हैं। नर्मदा सहित अनेक नदियों में स्नान से यज्ञों के फल मिलते हैं। महाभारत के रचनाकाल में सरस्वती पर्याप्त जल से भरी हुई दिखाई पड़ती हैं। ये बाद में सूखीं। सिंधु और सागर के मिलन स्थल पर स्नान करने से वरुण लोक मिलता है। सरस्वती ऋग्वेद के ऋषियों की प्रिय नदीतमा हैं। पुलस्त्य कहते हैं कि वायु द्वारा उड़ा कर लाई गई कुरुक्षेत्र की धूल से मनुष्य को परम गति मिल जाती है। जो यहां नहीं रहते कुरुक्षेत्र जाने की इच्छा करें। तीर्थ की प्रशंसा मजेदार है। बताते हैं भूमंडल के निवासियों के लिए नैमिष, अंतरिक्ष निवासियों के लिए पुष्कर और तीनों लोकों के निवासियों के लिए कुरुक्षेत्र तीर्थ है।
देवी उपासना भारत में वैदिक काल से स्पष्ट दिखाई देती है। ऋग्वेद में जल माताएं हैं। वन देवी हैं। उत्तर प्रदेश का विंध्याचल देवी उपासना का महत्वपूर्ण केन्द्र है। मध्य प्रदेश का दतिया और असम के गुवाहाटी में कामाख्या देवी के दर्शनार्थ पूरे देश से श्रद्धालु आते हैं। तीर्थाटन से मिलने वाले लाभ व हानि पर आग्रही बहस चलना जरूरी नहीं है। मुख्य बात है देश के एक कोने से दूसरे कोने तक भारत भक्तों का आवागमन। शंकराचार्य ने इसीलिए चारों धामों की स्थापना की थी। प्रत्येक तीर्थ के साथ अविश्वसनीय कथाएं चलती हैं। इन्हें बड़े सरल ढंग से अंधविश्वास कहा जा सकता है लेकिन पर्यटन का विकल्प तीर्थाटन ही है।
(लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं।)
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश