सोमनाथ: भारत के अमिट स्वाभिमान का गौरवशाली प्रतीक
-विनय राठौर हिन्दुस्तानी सौराष्ट्रदेशे विशदेऽतिरम्ये ज्योतिर्मयं चन्द्रकलावतंसम्। भक्तिप्रदानाय कृपावतीर्णं तं सोमनाथं शरणं प्रपद्ये।। (अर्थः जो भगवान शंकर अपनी भक्ति प्रदान करने के लिए परम रमणीय व स्वच्छ सौराष्ट्र प्रदेश गुजरात में कृपा करक
सोमनाथ


-विनय राठौर हिन्दुस्तानी

सौराष्ट्रदेशे विशदेऽतिरम्ये ज्योतिर्मयं चन्द्रकलावतंसम्।

भक्तिप्रदानाय कृपावतीर्णं तं सोमनाथं शरणं प्रपद्ये।।

(अर्थः जो भगवान शंकर अपनी भक्ति प्रदान करने के लिए परम रमणीय व स्वच्छ सौराष्ट्र प्रदेश

गुजरात में कृपा करके अवतीर्ण हुए हैं, मैं उन्हीं ज्योतिर्मयलिंगस्वरूप, चन्द्रकला को आभूषण

बनाये हुए भगवान् श्री सोमनाथ की शरण में जाता हूं।)

सोमनाथ, यह केवल एक तीर्थस्थल नहीं है, यह भारत की गौरवशाली धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का अद्वितीय प्रतीक है। यह वह भूमि है, जहां भारत का स्वाभिमान मंदिर के शिखर पर लहराती पताका में प्रतिबिंबित होता है। यह वह स्थान है, जहां कण-कण में भारतीयों की आस्था और जीवटता की महक महसूस होती है। यह वह देवालय है, जो विध्वंस और पुनर्निर्माण की शृंखलाबद्ध घटनाओं की गवाही देता है। यह वह शहर है, जो बताता है कि कैसे शांत, अहिंसक और धर्मानुरागी जनता की समृद्धि और वैभव मतांध लुटेरों की बर्बर मानसिकता का शिकार बनीं। साथ ही, सोमनाथ यह भी बताता है कि सृजन और निर्माण की प्रकृति के आगे विध्वंस सचमुच बहुत बौना है।

सोमनाथ के गौरव को पुनर्प्रतिष्ठित करने के लिए देश के प्रथम उप प्रधानमंत्री सरदार पटेल और स्वतंत्रता सेनानी एवं प्रसिद्ध साहित्यकार कन्हैयालाल मुंशी ने उल्लेखनीय योगदान दिया। सरदार पटेल ने गुलामी से मुक्ति के बाद स्वतंत्र भारत के स्वाभिमान और जन आस्था को मजबूत करने के लिए सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का भगीरथ कार्य किया। बाद में, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘विकास भी, विरासत भी’ मंत्र के साथ सोमनाथ तीर्थस्थल को पूरी भव्यता के साथ विकसित करने का बीड़ा उठाया।

भारत के पश्चिमी छोर पर स्थित गुजरात के तटीय शहर सोमनाथ का वैभवशाली अतीत इतिहास में सुनहरे अक्षरों में अंकित है।

सनातन धर्म में वर्णित 12 ज्योतिर्लिंगों में से प्रथम ज्योतिर्लिंग के रूप में सोमनाथ दुनिया भर में फैले करोड़ों हिन्दुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार स्वयं चंद्रदेव ने सोमनाथ मंदिर की स्थापना की थी। सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की महिमा ऋग्वेद, महाभारत, श्रीमद्भावत और स्कन्द पुराण में भी वर्णित है।

वह साल था 1026, जब एक विदेशी आक्रांता महमूद गजनवी ने पहली बार सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया। आज साल 2026 में उस घटना को एक हजार वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। सोमनाथ मंदिर का हजार वर्षों का इतिहास विध्वंस, लूट और रक्तपात की अनेक घटनाओं के साथ-साथ स्वाभिमान और गौरव से भरे सृजन और पुनर्निर्माण की गौरवशाली गाथा कहता है।

यह समझना जरूरी है कि सोमनाथ मंदिर पर महमूद गजनवी के आक्रमण का मकसद केवल बेशुमार धन-दौलत को लूटना नहीं था। गजनवी का उद्देश्य भारत के एक महान धार्मिक और सभ्यागत प्रतीक को नष्ट करना था। यही वजह है कि उसने मंदिर को ध्वस्त करने और पवित्र ज्योतिर्लिंग को खंडित करने के साथ-साथ पूरे नगर को तबाह कर दिया था। यह प्रयास था लोगों को भयभीत करने का, यह इरादा था लोगों की आस्था को डांवाडोल करने का, यह कट्टरता से भरा ऐसा कृत्य था, जो दूसरों की आस्था को नीचा दिखाकर स्वयं के श्रेष्ठ होने का दंभ भरता था। मंदिर को लूटना तो बस बहाना भर था, असल मकसद था काफिरों (हिन्दुओं) और उनके प्रतीकों को नष्ट करना। काफिरों की हत्या करने और सोमनाथ मंदिर एवं मूर्तियों को ध्वस्त करने के लिए गजनवी को ‘गाजी’ और ‘मूर्तिभंजक’ जैसी उपाधियां दी गईं।

लेकिन, गजनवी शायद भारत को जानता ही नहीं था। वह भारतीयों की आस्था, स्वाभिमान, जीवटता, मिजाज और गर्वित प्रकृति से अनजान था। उसने मंदिर को तोड़ कर सनातन को अपमानित करने की कोशिश की, तो हम भारतीयों ने उसी स्थान पर फिर से नया मंदिर खड़ा कर दिया। यह हमें जीवन का एक मूल्यवान सबक सिखाता है कि कैसे गिरकर दोबारा खड़ा हुआ जाए, कैसे सबकुछ गंवाने के बाद बजाय हिम्मत हारने के फिर से सृजन किया जाए।

यह सिलसिला केवल गजनवी तक ही सीमित नहीं रहा। उसके बाद और भी कई आक्रांता आए। उन सभी ने सोमनाथ तीर्थ का विध्वंस कर भारतीयता को चोट पहुंचाने की कोशिश की। भारत की आत्मा पर घाव देने का प्रयास किया। भारत के स्वाभिमान को ठेस पहुंचाने का अधम कृत्य किया। इन सभी के मंसूबे हमारे गौरवशाली प्रतीकों को नष्ट करना था, ताकि हम भारतीय स्वयं को लाचार और अपमानित महसूस कर सकें।

लेकिन, यह भारत भूमि है। यहां समय-समय पर ऐसी विभूतियों ने जन्म लिया है, जिन्होंने भारत माता के गौरव को शिखर पर प्रस्थापित करने का कार्य किया है।

गुजरात के लिए यह गर्व की बात है कि उसके दो-दो सपूतों ने मातृभूमि के गौरव और सनातन के पुनर्जागरण के भगीरथ कार्य में सर्वोच्च योगदान दिया है। लौह पुरुष सरदार पटेल ने जहां सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का ऐतिहासिक कार्य कर अपने मजबूत मनोबल और दृढ़ संकल्प का परिचय दिया, तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राम मंदिर के निर्माण और सोमनाथ के आधुनिक विकास का मार्ग प्रशस्त किया। भारत के आत्म गौरव और स्वाभिमान के प्रतीकों को नष्ट करने की कट्टवादी सोच के जवाब में सरदार पटेल ने सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण कराया। वहीं, प्रधानमंत्री मोदी ने इस मंदिर को और भी भव्यता प्रदान करने के साथ इसके दायरे को पूजा-अर्चना से बढ़ाकर सामाजिक दायित्व, रोजगार, पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ विकास से जोड़ दिया।

सोमनाथ का मंदिर हो या अयोध्या का श्री राम मंदिर, दोनों यह संदेश देते हैं कि सत्य को दबाया नहीं जा सकता, विश्वास का विध्वंस नहीं हो सकता, आस्था कभी मर नहीं सकती और सांस्कृतिक चेतना एवं राष्ट्रीय स्वाभिमान खंडित तो हो सकता है, लेकिन खत्म कभी नहीं हो सकता। यह भारत का अपना विचार है। यह हम भारतीयों की सोच है।

वास्तव में सोमनाथ जैसे प्रतीकों को केवल मंदिर कहना पर्याप्त नहीं होगा। ये भारत की आध्यात्मिक शक्ति के शक्तिशाली केंद्र हैं। ये हमारी आत्मा से जुड़े हुए वे प्रतीक हैं, जिनसे हमारी पहचान है। हम अपने जीवन को बेहतर बनाने, अपने ज्ञान को समृद्ध करने, जीवन की ऊर्जा प्राप्त करने, नैतिकता की शिक्षा ग्रहण करने, धन-धान्य से लेकर उत्तम मानव जीवन का आशीष पाने के लिए इन्हीं प्रतीकों की शरण में जाते हैं, और प्रार्थना करते हैं।

भारत के इसी सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रीय स्वाभिमान को पुनर्स्थापित करने के लिए सरदार पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की पहल की।

सरदार पटेल के नेतृत्व में पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर 1951 में अपनी पूरी भव्यता के साथ आम श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया गया। आज यह मंदिर भारत के अडिग स्वाभिमान के साथ ही सरदार पटेल के दृढ़ संकल्प का प्रतीक बनकर करोड़ों लोगों को प्रेरणा दे रहा है। मंदिर के उद्घाटन समारोह में देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद मौजूद रहे।

आज सोमनाथ मंदिर शानदार इंफ्रास्ट्रक्चर और बेहतरीन यात्री सुविधाओं के साथ अपनी अलौकिक छटा बिखेर रहा है। बीते वर्षों में हुए विकास कार्यों ने मंदिर परिसर का कायापलट कर दिया है। इस बदलाव का श्रेय जाता है प्रधानमंत्री मोदी को, जो श्री सोमनाथ ट्रस्ट के अध्यक्ष भी हैं। मोदी ने भारत के ‘अमृत काल’ के लिए जो पंच प्रण दिए, उनमें से एक अपनी ‘विरासत पर गर्व’ करना भी है। उन्होंने सोमनाथ तीर्थस्थल में श्रद्धालुओं के लिए सर्वोत्तम सुविधाएं और मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने का विजन दिया। आज सोमनाथ भारत के सबसे बेहतरीन सुविधा वाले तीर्थ स्थलों में से एक के रूप में उभरा है। यह विकास और विरासत का अद्वितीय दृष्टांत बन गया है।

जब आस्था के साथ-साथ सुविधाएं और सहूलियतें भी जुड़ जाएं, तो यह भक्तों के लिए सबसे बड़ा उपहार बन जाता है। सोमनाथ के अलौकिक दर्शन और आधुनिक विकास का अनुभव करने के लिए साल 2020 में लगभग 98 लाख श्रद्धालु यहां पहुंचे, बाद में साल 2024 तक हर वर्ष यह संख्या 92 से 97 लाख तक बनी रही। परिवहन और कनेक्टिविटी को बेहतर बनाने के लिए 828 करोड़ रुपए की लागत से जेतपुर-सोमनाथ हाईवे बनाया गया। अहमदाबाद से सोमनाथ के लिए साबरमती-वेरावल वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेन शुरू की गई और पुराने केशोद एयरपोर्ट का नवीनीकरण उसे फिर से शुरू कर दिया गया है।

प्रधानमंत्री के ‘डिजिटल इंडिया’ अभियान से प्रेरणा लेकर ट्रस्ट ने ऑनलाइन बुकिंग और पोस्टल प्रसाद जैसी अभिनव पहल शुरू की हैं, जिससे श्रद्धालुओं को पूजा-अर्चना से लेकर सोमनाथ दादा के प्रसाद का लाभ घर बैठे मिल रहा है।

प्रधानमंत्री के ‘मिशन लाइफ’ के अंतर्गत पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखकर अब सोमनाथ मंदिर के फूलों को वर्मीकम्पोस्ट में बदल दिया जाता है, जो 1700 बिल्व पेड़ों के पालन-पोषण में योगदान देता है। प्लास्टिक कचरे का इस्तेमाल अब पेवर ब्लॉक बनाने में किया जा रहा है। यही नहीं, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के जरिए करोड़ों लीटर पानी का फिल्ट्रेशन, समुद्र तट पर मियावाकी जंगल का निर्माण और गिर-सोमनाथ जिले में 5 लाख से अधिक पौधरोपण भी ट्रस्ट की पर्यावरण-उन्मुख गतिविधियों को रेखांकित करता है।

सोमनाथ अब नेट जीरो मंदिर बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

सोमनाथ ट्रस्ट के चेयरमैन के रूप में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भक्ति की धारा में सामाजिक समरसता और विकास को जोड़कर सोमनाथ की त्रिवेणी को मूर्त स्वरूप दिया है। उन्होंने उत्तर और दक्षिण भारत के बीच पैदा की गई दिलों की दूरी को पाटने के लिए ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ पहल के अंतर्गत सोमनाथ में ‘सौराष्ट्र-तमिल संगमम’ कार्यक्रम के आयोजन का मार्गदर्शन दिया। इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए सात स्पेशल ट्रेनों में 2002 तमिल भक्त सोमनाथ के दरबार में पहुंचे।

इतना ही नहीं, ट्रस्ट की ओर से 62 लाख रुपए की लागत से छह वर्षा जल संचयन कुएं और एक जलाशय को बहाल किया है।

2019-20 में 160 लाख रुपए के निवेश के साथ, सोमनाथ के 8 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट ने 20.53 करोड़ लीटर पानी को फिल्टर किया है। सोमनाथ में हरित और बेहतर पर्यावरण के लिए समुद्र तट पर 72,000 वर्ग फुट क्षेत्र में 7200 पेड़ों के साथ मियावाकी जंगल तैयार किया गया है। यह भक्ति और पर्यावरण विज्ञान का एक बेजोड़ मेल है। ट्रस्ट आपदा की स्थिति में पीड़ितों के साथ खड़े रहने और उनका दुःख बांटने का मानवीय कर्तव्य भी निभाता है। चक्रवात ‘तौकते’ के बाद ट्रस्ट ने किसानों को फलों के पेड़ बांटे। गिर सोमनाथ जिले की सभी तहसीलों में 5 करोड़ रुपए से अधिक के खर्च से 5 लाख से अधिक पौधे लगाए।

दरअसल, अब सोमनाथ केवल तीर्थयात्रियों के लिए सजाया-संवारा गया एक मंदिर ही नहीं है, बल्कि यह इस बात की प्रयोगशाला भी है कि अपनी विरासत को भविष्य के लिए कैसे सुरक्षित रखा जा सकता है, कैसे हमारे रीति-रिवाज रोजगार पैदा कर सकते हैं और कैसे पर्यावरण को धर्मशास्त्र में शामिल किया जा सकता है। अब सोमनाथ सोलर पैनल, संस्कृत सीखने के केंद्रों, तटीय ग्रीन बेल्ट और डिजिटल रसीदों के माध्यम से परंपरा और तकनीक के संमिश्रण की राह दिखा रहा है।

दूरदृष्टा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मार्गदर्शन में सोमनाथ गत दो दशकों में, इस बात का शानदार उदाहरण बन गया है कि कैसे भक्ति और विकास एक ही मार्ग पर साथ-साथ चलते हैं। एक आदर्श तीर्थस्थल के रूप में आज सोमनाथ भारत ही नहीं दुनिया को दिशा दिखा रहा है। एक ऐसा तीर्थस्थल जहां पूजा-पाठ के साथ-साथ पर्यावरण और रोजगार की भी चिंता की जाती है, जहां विकास और विरासत दोनों का मिलन होता है।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संतोष मधुप