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भोपाल, 11 जनवरी (हि.स.) । मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित मप्र जनजातीय संग्रहालय में नृत्य, गायन एवं वादन पर केंद्रित गतिविधि संभावना का आयोजन किया जाता है। इस रविवार को बुरहानपुर के निलेश पटेल एवं साथी कलाकारों द्वारा गदली व थापटी नृत्य, जबलपुर के अनरकांत चौधरी एवं साथियों द्वारा अहिराई नृत्य, छतरपुर के मथुरा प्रसाद प्रजापति एवं साथियों द्वारा बुन्देली गायन में गणेश वंदना, बुन्देली भजन, भोपाल की महिमा आधारित गीतों के साथ अन्य गीतों की प्रस्तुति दी गई।
गदली नृत्य
यह शादी-विवाह के अवसर पर किया जाने वाला कोरकू स्त्रियों का प्रसिद्ध नृत्य है। पुरुष बाँसुरी, अलगोझा, ढोल, ढोलक, टिमकी और झाँझ बजाते हैं। बाँसुरी और अलगोझा की लोक धुन पर स्त्रियाँ हाथों में चिटकोरा बजाती हुईं विभिन्न मुद्राओं में बहुत ही आकर्षक व मनमोहक नृत्य करती हैं। पुरुष वादक भी मस्ती में झूम-झूमकर नृत्य करते हुए वाद्यों को गति प्रदान करते हैं। जैसे-जैसे वाद्यों की गति बढ़ती है, नृत्य में भी उतना निखार आता-जाता है। धीरे-धीरे नृत्य जब तीव्र होने के साथ ही साथ अपनी चरम सीमा पर पहुँचता है, तो बहुत ही लुभावना और दर्शनीय होता है। रात-रात भर होने वाला कोरकू स्त्रियों का बहुत ही लोकप्रिय नृत्य है।
थापटी नृत्य
यह वैशाख के महीने में किया जाने वाला स्त्री-प्रधान समूह नृत्य है। युवतियाँ वृत्त में नृत्य करती हैं। इनके हाथों में बजाने के लिए झाँझ और चिटकोरा (सागौन या खाखरे की लकड़ी से बना करताल-नुमा लघु वाद्य) रहता है। इस नृत्य में गाये जाने वाले गीतों को थापटी सिरिंज कहते हैं। नृत्य में ढोलक, टिमकी, झाँझ आदि वाद्यों का उपयोग होता है। स्त्रियाँ झाँझ और चिटकोरा बजाती हैं, शेष सभी वाद्य पुरुष वादक ही बजाते हैंय़ चिटकोरा वाद्य के कारण इसे चिटकोरा नृत्य भी कहते हैं।
अहिराई नृत्य
अहिराई नृत्य अहीर समुदाय द्वारा किया जाने वाला पुरूष प्रधान नृत्य है। दीपावली के दूसरे दिन यदुवंशी अहीर जाति के लोग अपने घर में गोवर्द्धन पर्वत की आकृति बनाकर पूजा करते हैं। इसी दौरान पूरूष अपने अस्त्र-शस्त्र लाठी, फरसे आदि की पूजा करते हैं। नृत्य के दौरान दोहे, कहावतों की लम्बी टेर लगाकर गाते हैं और नर्तक दल पद संचालन के साथ नृत्य की शुरूआत करते हैं।
गौरतलब है कि मध्य प्रदेश जनजातीय संग्रहालय़ में हर रविवार दोपहर 02 बजे से आयोजित होने वाली इस गतिविधि में मध्य प्रदेश के पांच लोकांचलों एवं सात प्रमुख जनजातियों की बहुविध कला परंपराओं की प्रस्तुति दी जाती है। इसके अलावा देश के अन्य राज्यों के कलारूपों को भी देखने समझने का अवसर जनसामान्य को प्राप्त होता है।
हिन्दुस्थान समाचार / उम्मेद सिंह रावत