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-गिरीश्वर मिश्र
ज्ञान और भाषा का गहरा रिश्ता है। महान चिंतक भर्तृहरि की मानें तो भाषा के आलोक में ही दुनिया दिखती है: सर्वं शब्देन भासते। ज्ञान-सृजन, ज्ञान संरक्षण तथा अगली पीढ़ी तक ज्ञान संक्रमण का कार्य भाषा से ही हो पाता है। चिंतन और सर्जनात्मकता के लिए भाषा जरूरी है। इस तरह भाषा मानव जीवन के उत्कर्ष का साधन है जो नैसर्गिक रूप से सभी मनुष्यों को प्राप्त है। वह व्यक्ति और समाज दोनों ही स्तरों पर स्मृति और कल्पना को सुदृढ़ करती है।
भारत भाषाओं की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है जहाँ हज़ार से अधिक भाषाएं विद्यमान हैं। इनमें बहुतेरी ऐसी भी हैं जो सिर्फ़ बोली जाती हैं। उनकी लिपि ही नहीं है। इस भाषिक परिवेश में भाषाओं की बहुलता से द्विभाषिकता सहज है और बहुभाषिकता भी काफी पाई जाती है। हिंदी मध्य देश में बोली जाने वाली भाषा समूह का नाम है। ऐतिहासिक रूप से हिंदी हिंद की भाषा है और समग्र देश से जुड़ी रही है। आज इसके बोलने वाले विस्तृत भू भाग में पसरे हैं और अनेक देशों में मौजूद हैं। ऐसे में हिंदी के कई कई रूप उसकी बोलियों में मिलते हैं। हिंदी भारत के लोक जीवन व्याप्त रही और देश के स्वतंत्रता संग्राम में उसकी अखिल भारतीय भागीदारी ने उसे राष्ट्रभाषा बना दिया। जनता से जुड़ने के प्रयास में हिंदी भारत में चतुर्दिक गूंजी। सहज सम्पर्क के लिए हिंदी स्वाभाविक माध्यम बनी महाराष्ट्र हो या बंगाल, कश्मीर हो या गुजरात, पंजाब हो या दक्षिण भारत हर कहीं हिंदी को अंगीकार किया गया।
अंग्रेज सरकार सरकारी तंत्र और शिक्षा में अंग्रेजी वर्चस्व स्थापित किया जिसके अवशेष अभी भी विद्यमान हैं। संविधान में सरकारी काम-काज की भाषा यानी ‘राज भाषा ‘ (आफीशियल लैंग्वेज) का विचार अपनाया गया। संविधान का भाग 17 का अनुछेद 343 कहता है संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देव नागरी’ होगी। राजभाषा को अपरिभाषित छोड़ दिया गया परंतु प्रशासनिक उद्देश्य से उसे जोड़ा गया। साथ ही अनुछेद 351 में हिंदी के विकास को संघ के कर्तव्य के रूप में अंकित किया गया। राजभाषा विभाग बना और हिंदी फले-फूले इसके लिए बहुत से उपक्रम शुरू हुए।
राजभाषा नीति और उसके अनुपालन को लेकर धींगामुश्ती होती रही। संविधान ने आठवीं सूची नामक एक विशेष प्रावधान भी बनाया और 14 भाषाओं की सूची डाली। इस सूची का विस्तार होता रहा और अब इसमें 22 भाषाएं हैं। अभी 38 अन्य भाषाओं से गुहार है कि उनको भी शामिल कर लिया जाय हालांकि सूची में सदस्यता का भाषा के विकास के साथ कोई कार्य कारण सम्बन्ध नहीं दिखता। 1965 तक आते आते हिंदी की राजभाषा का सवाल मुल्तवी हो गया क्योंकि वह सक्षम नहीं लगी और अंग्रेजी में कार्य करते रहने के लिए असीमित छूट ले ली गई। अंग्रेजी का वर्चस्व बना रहा। इस बीच हिंदी के संस्थानों, समितियों, पुरस्कारों, समितियों, अकादमियों, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहल होती रही। अब अनेक विश्वविद्यालयों, कार्यालयों और प्रतियोगी परीक्षाओं में हिंदी में अवसर मिल रहे हैं तथापि स्थिति पूर्णतः संतोषजनक नहीं है। मीडिया, सिनेमा, व्यापार, विज्ञापन और लोक भाषा के रूप में हिंदी आगे बढ़ रही है। भारत के बाहर मॉरिशस, गुयाना, फ़ीजी, त्रिनिदाद, दक्षिण अफ्रीका आदि अनेक देशों में भारतीय मूल के लोग वर्षों पहले पहुंचे और अपने साथ हिंदी भी ले गए। पड़ोसी देशों में भी हिंदी बोली और समझी जाती है। इसके अतिरिक्त हिंदी का पठन पाठन अनेक देशों में होता है।
हिंदी की अंतरराष्ट्रीय छवि को तब विशेष बल मिला जब नागपुर में 10 जनवरी 1975 में नागपुर में विश्व हिन्दी सम्मलेन का पहली बार आयोजन हुआ। इस ऐतिहासिक पहल की स्मृति में 2006 से ‘विश्व हिन्दी दिवस’ मनाया जा रहा है। हिंदी को अन्तरराष्ट्रीय भाषा के रूप में बढ़ावा देने के संकल्प के साथ यह आयोजन शुरू हुआ था और तब से बारह ऐसे सम्मेलन भारत और अन्य देशों में हो चुके हैं। मारिशस में एक विश्व हिंदी सचिवालय तथा वर्धा में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय बना है। अन्तर राष्ट्रीय सांस्कृतिक संबंध परिषद अनेक देशों में हिन्दी के अध्ययन-अध्यापन के लिए प्राध्यापकों को उपलब्ध कराती है। हिंदी के वैश्विक प्रचार प्रसार के अनेक प्रयास हो रहे हैं। 12 वाँ विश्व हिंदी सम्मेलन फ़िजी में हुआ था। ऐसे सम्मेलनों से न केवल हिंदी को वैश्विक मंच मिला है बल्कि विश्व में अन्यत्र रहने वाले हिंदी भाषियों के बीच संबंधों को सुदृढ़ करने में भी मदद मिली है।
आज हिंदी भाषा संयुक्त राष्ट्र में ग़ैर आधिकारिक भाषाओं की सूची में सम्मिलित है। विश्व में अंग्रेजी और मंडारिन (चीनी) भाषाओं के बाद इसी का स्थान आता है। प्रवासी समुदाय में हिन्दी प्रचलित है, उसका उच्च कोटि का साहित्य है और अनुमानतः 60 करोड़ से अधिक लोग इसे बोलते हैं। हिंदी के प्रति जागरूकता और प्रचार प्रसार का कार्य प्रगति पर है। इस वर्ष विश्व हिंदी दिवस पारंपरिक ज्ञान से कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक के विकास पर केंद्रित है । आज इसे कोडिंग से लेकर डिजिटल प्लेटफार्म पर उपयोग के लिए आसान बनने का प्रयास हो रहा है। मशीन अनुवाद में बड़ी सफलता मिल रही है। कृत्रिम मेधा (एआई) के सहयोग से अपार संभावनाएं उभर रही हैं जिससे हिंदी को बड़ा आकाश मिल सकेगा।
स्मरणीय है कि संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी की गूंज 4 अक्टूबर 1977 को विदेश मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी के भाषण द्वारा हुई थी परंतु अभी तक आधिकारिक भाषा की सूची में नहीं आ सकी है। संयुक्त राष्ट्र में अंग्रेजी, फ्रेंच, स्पेनिश, चीनी अरबी और रूसी ये आधिकारिक भाषाएँ है।
स्मृति और भाषा के बीच जैसे बड़ा गहरा रिश्ता है उसी तरह स्मृति हमारी अपनी पहचान से भी जुड़ी हुई है । विश्व के अनेक देशों में फैले भारतीय मूल के लोगों का हिन्दी से लगाव और भारतीय संस्कृति के संरक्षण में रुचि इसकी पुष्टि करती है। विदेशों के कई विश्व विद्यालय हिन्दी के अध्यापन और अनुसंधान में लगे हुए हैं । हिन्दीभाषी जन-समुदाय के संख्या बल को देखते हुए एक बड़े बाजार का अवसर भी दिखता है और हिन्दी के प्रसार को बल मिलता है।
(लेखक, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश