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चेन्नई, 30 अगस्त (हि.स.)। तमिलनाडु सरकार ने ऑलिव रिडले कछुओं को बचाने के लिए एक जरूरी कदम उठाया है। सरकार ने इन कछुओं को ट्रैक करने के लिए दो साल का एक अध्ययन शुरू करने का फैसला किया है। इस काम पर 84 लाख रुपये खर्च होंगे।
तमिलनाडु सरकार के पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन और वन विभाग की अतिरिक्त मुख्य सचिव सुप्रिया साहू द्वारा जारी एक सरकारी आदेश के अनुसार, चेन्नई तट और कावेरी डेल्टा सहित प्रमुख घोंसला स्थलों पर 20 ऑलिव रिडले कछुओं पर सैटेलाइट ट्रांसमीटर लगाए जाएंगे। यह अध्ययन दिसंबर 2024 और मार्च 2025 के दौरान उत्तरी तमिलनाडु के समुद्र तट पर सैकड़ों कछुओं के मरने के बाद शुरू किया गया है। माना जा रहा है कि इनमें से कई कछुए मछली पकड़ने के जाल में फंसकर मर गए थे।
इस अध्ययन को वन्यजीव संस्थान ऑफ इंडिया (डब्लूआईआई) और उन्नत वन्यजीव संरक्षण संस्थान (एआईडब्लूसी) मिलकर करेंगे। डब्लूआईआई कछुओं को टैग करेगा और उनकी जानकारी इकट्ठा करेगा, जबकि एआईडब्लूसी समुद्र तट पर जाकर यह पता लगाएगा कि कछुए कहां सबसे ज्यादा मिलते हैं। वे यह भी जानेंगे कि मछली पकड़ने से कछुओं को कितना खतरा है।
राज्य सरकार की ओर से इस योजना के लिए मिले 84 लाख रुपये डब्लूआईआई और एआईडब्लूसी के बीच बांटे गए हैं। डब्लूआईआई को 53.65 लाख रुपये दिए गए हैं, जो सैटेलाइट टैग और डेटा से जुड़े काम के लिए हैं। एआईडब्लूसी को 30.29 लाख रुपये मिले हैं, जो नाव के किराए और दूसरे सामान के लिए हैं। इस काम में स्थानीय मछुआरे भी मदद करेंगे। वे कछुओं के आने की खबर देंगे और उन इलाकों की पहचान करने में मदद करेंगे जहां कछुओं को खतरा हो सकता है।
तमिलनाडु सरकार ने इस योजना के लिए 30 अगस्त को पैसा जारी कर दिया। अब डब्लूआईआई और एआईडब्लूसी ने अध्ययन शुरू करने की तैयारी कर ली है। सैटेलाइट टैग लगाने का काम दिसंबर 2025 से शुरू होगा। मई 2025 को तमिलनाडु में 2.29 लाख कछुए के बच्चों को समुद्र में छोड़ा गया, जो एक नया रिकॉर्ड है।
दरअसल, ऑलिव रिडले कछुए को असुरक्षित जीव माना गया है। नवंबर से मार्च के बीच ये कछुए अंडे देने के लिए तमिलनाडु के तटों पर आते हैं। लेकिन मछली पकड़ने की जाल में फंसने से इनकी संख्या कम हो रही है। इस साल जनवरी और फरवरी में अकेले चेन्नई की तट पर 1,000 से ज्यादा कछुए मरे हुए मिले थे।
तमिलनाडु में कछुओं को बचाने का काम पहले से चल रहा है। इस साल मार्च तक राज्य में 2.53 लाख से ज्यादा अंडे जमा किए गए और 2.29 लाख बच्चे समुद्र में छोड़े गए। यह पिछले पांच साल में सबसे ज्यादा है। चेन्नई, कडलूर और नागपट्टिनम में 55 जगहें बनाई गई हैं, जहां कछुओं के अंडे रखे जाते हैं।
इस अध्ययन से कछुओं के रास्ते और खाने-पीने की जगहों के बारे में जरूरी जानकारी मिलेगी। इस जानकारी से आगे की योजनाएं बनाने में मदद मिलेगी, जिससे मछली पकड़ने से कछुओं को होने वाले खतरे को कम किया जा सके। सरकार चाहती है कि तमिलनाडु कछुओं को बचाने के काम में पूरे देश में सबसे आगे हो।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ आर बी चौधरी