यादगार और शानदार हैं नंदा-सुनंदा की मूर्तियों
नैनीताल, 30 अगस्त (हि.स.)। माता नयना की नगरी नैनीताल में माता नंदा-सुनंदा के महोत्सव के दौरान माता की मूर्तियां पूरे प्रदेश में सबसे सुंदर तरीके से बनती हैं। इसका कारण यहां मूर्ति निर्माण में कलापक्ष पर अधिक ध्यान दिया जाना है। साथ ही यहां आयोजक संस्
वर्ष 2009 की माता नंदा-सुनंदा की मूर्तियां।


नैनीताल, 30 अगस्त (हि.स.)। माता नयना की नगरी नैनीताल में माता नंदा-सुनंदा के महोत्सव के दौरान माता की मूर्तियां पूरे प्रदेश में सबसे सुंदर तरीके से बनती हैं। इसका कारण यहां मूर्ति निर्माण में कलापक्ष पर अधिक ध्यान दिया जाना है। साथ ही यहां आयोजक संस्था हमेशा बेहतरी के लिये बदलावों को स्वीकार करने को तैयार रहती है। इसी कारण बीते कुछ वर्षों से नंदा-सुनंदा की मूर्तियां पूरी तरह ईको-फ्रेडली यानी पर्यावरण-मित्र पदार्थों से तैयार की जाती हैं। जबकि यहां एक दौर में चांदी की मूर्तियां बनाए जाने का इतिहास भी रहा है।

उल्लेखनीय है कि नैनीताल को अल्मोड़ा के साथ ही प्रदेश के अनेक स्थानों पर आयोजित होने वाले नंदादेवी महोत्सवों का प्रणेता कहा जाता है। यहां 1903 से लगातार बीच में दो विश्व युद्धों के दौरान भी जारी रहते हुऐ 123 वर्षों से नंदा देवी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। इधर राज्य के अनेक नगरों में यह आयोजन होने लगे हैं, बावजूद नैनीताल की मां नंदा-सुनंदा की मूर्तियां अल्मोड़ा सहित अन्य सभी नगरों से सुंदर होती हैं।

चांदी से भी बनती थीं मूर्तियां

उल्लेखनीय है कि पूर्व में यहां भी अल्मोड़ा की तरह परंपरागत मूर्तियां ही बनती थीं। लेकिन 1945 के दौरान से यहां बदलाव आने लगे। 1950 में शारदा संघ के संस्थापक कलाप्रेमी बाबू चंद्र लाल साह व कला मंदिर फोटोशॉप के स्वामी मूलचंद की जुगलबंदी के बाद यहां मूर्तियां सुंदर बनाई जाने लगीं। 1955-56 तक नंदा देवी की मूर्तियों का निर्माण चांदी से होता था लेकिन बाद में वापस परंपरागत परंतु अधिक सुंदर मूर्तियां बनने लगीं। वरिष्ठ कलाकार चंद्र लाल साह 1971 तक मूर्तियों का निर्माण करते रहे, और इस दौरान माता के चेहरे पर दिखने वाली मुस्कुराहट को लोग अब भी याद करते हैं।

पूरी तरह से ईको फ्रेंडली होती हैं माता नंदा-सुनंदा की मूर्तियां

बाद में स्थानीय कलाकारों ने मूर्तियों को सजीव रूप देकर व लगातार सुधार किया, जिसके परिणाम स्वरूप नैनीताल की नंदा सुनंदा की प्राकृत पर्वताकार मूर्तियां, केवल मुखाकृति होने के बावजूद महाराष्ट्र के गणपति बप्पा जैसी ही जीवंत व सुंदर बनती हैं। खास बात यह भी कि मूर्तियों के निर्माण में पूरी तरह पर्यावरण मित्र पदार्थ-कदली दल के तने, पाती नाम की धार्मिक आयोजनों में प्रयुक्त खुशबूदार घास, कपड़ा, रुई व प्राकृतिक रंगों का ही प्रयोग किया जाता है। बीते लगभग एक दशक से थर्मोकोल का सीमित प्रयोग भी बंद कर दिया गया है, जिसके बाद महोत्सव पूरी तरह ‘ईको फ्रेंडली’ भी हो गया है।

हर वर्ष मूर्तियां समान आकार की बनें इस हेतु भी खास ध्यान रखा जाता है। गत वर्षों की मूर्ति के कपड़े को देखकर मूर्ति बनाई जाती है। बेहतर स्वरूप के लिये मां के चेहरे में कपड़े के भीतर परिवर्तन किया जाती है। साथ ही मां के चेहरे को मुस्कुराहट लिए हुए बनाने की कोशिश की जाती है, इससे मां की सुंदरता देखते ही बन रही है। इस दौरान वर्ष 2009 में बनी माता नंदा-सुनंदा की मूर्तियां सबसे बेहतर बनीं। उन्हें आज भी श्रद्धालु याद करते हैं।

हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. नवीन चन्द्र जोशी