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गोपेश्वर 30 अगस्त (हि.स.)। बीते एक पखवाडे से चल रही मां नंदा की वार्षिक लोकजात यात्रा का शनिवार को समापन हो गया। उच्च हिमालयी बुग्याल में श्रद्धालुओं नें पौराणिक लोकगीतों और जागर गाकर हिमालय की अधिष्टात्री देवी मां नंदा को कैलाश के लिये विदा किया। विदाई में लोगों की आंखों से अश्रुधारा बह रही थी। अपनी ध्याण (विवाहित बेटी, बहन) को विदा करते समय महिलाओं की आंखे अश्रुओं से छलछला गयी। खासतौर पर ध्याणियां मां नंदा की डोली को कैलाश विदा करते समय फफककर रो पड़ी।
इस दौरान श्रद्धालुओं नें अपने साथ लाए सौगात खाजा, चूडा, बिंदी, चूडी, ककड़ी, मुंगरी भी समौण के रूप में मां नंदा को अर्पित किये। अपने अंतिम पडाव से शनिवार सुबह नंदा सप्तमी के दिन नंदा ,राजराजेश्वरी की डोली हिमालयी उच्च बुग्याल बेदनी, बंड की नंदा डोली नरेला बुग्याल, कुरूड दशोली की नंदा डोली बालपाटा पहुंची और यहां पर पूजा अर्चना कर, तर्पण करके मां नंदा को कैलाश के लिए विदा किया।
बंड क्षेत्र की छंतोली नरेला बुग्याल पहुंची जहां पर श्रद्वालुओं ने मां नंदा की पूजा अर्चना कर उन्हें समौण भेंट की और मां नंदा को जागरों के माध्यम से कैलाश की ओर विदा किया गया। इस दौरान पूरा हिमालय मां नंदा के जयकारे से गुंजयमान हो गया।
हिन्दुस्थान समाचार / जगदीश पोखरियाल