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- डॉ. मयंक चतुर्वेदी
अंतरराष्ट्रीय व्यापार की दुनिया में कई बार ऐसा होता है कि एक बड़े देश की नीति छोटे-बड़े देशों की अर्थव्यवस्था पर भूकंप की तरह असर डालती है। बीते वर्षों में अमेरिका ने जिस तरह से टैरिफ यानी आयात शुल्क का इस्तेमाल किया, उसने वैश्विक अर्थव्यवस्था को अनिश्चितताओं में धकेल दिया। कई देशों के लिए यह सीधा झटका था, क्योंकि उनकी निर्यात क्षमता, निवेश प्रवाह और मुद्रा स्थिरता इस तरह के फैसलों पर निर्भर करती है। अमेरिका की यह नीति, जो ट्रंप प्रशासन की ‘अमेरिका फर्स्ट’ सोच का परिणाम बताई जा रही है, का उद्देश्य अपने घरेलू उद्योगों और रोजगार को सुरक्षित करना बताया गया, लेकिन असल में यह दुनिया के लिए एकतरफा आर्थिक दबाव का साधन बन गई है। सवाल यह था कि भारत जैसे विकासशील देश इस चुनौती का सामना किस तरह करेंगे?
रेटिंग एजेंसियों और वैश्विक थिंक-टैंकों ने चेतावनी दी थी कि अमेरिका के टैरिफ का असर भारत पर गंभीर होगा। कहा गया कि भारत का निर्यात बुरी तरह प्रभावित होगा, विदेशी निवेशक भारत से मुंह मोड़ सकते हैं, रुपये पर दबाव बनेगा और रोजगार पर संकट आएगा। लेकिन, ठीक इसके उलट भारत ने जिस आत्मविश्वास और मजबूती के साथ इस दबाव का सामना किया, उसने सारी भविष्यवाणियों को गलत साबित कर दिया है।
अमेरिकी टैरिफ बम के बावजूद यह उपलब्धि अपने आप में असाधारण
ताजा तथ्य इसे और मजबूती से साबित करते हैं। सांख्यिकी मंत्रालय ने चालू वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) के आंकड़े जारी किए हैं। इन आंकड़ों के सामने आते ही आज पूरी दुनिया ने देखा कि भारत की जीडीपी 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। यह वृद्धि न केवल पिछले वित्त वर्ष की इसी तिमाही (6.5 प्रतिशत) से कहीं अधिक है, बल्कि भारतीय रिजर्व बैंक के अनुमानित 6.5 प्रतिशत से भी ज्यादा है। वैश्विक अनिश्चितताओं, व्यापारिक तनाव और अमेरिकी टैरिफ बम के बावजूद यह उपलब्धि अपने आप में असाधारण कही जाएगी।
कृषि ने निभाई ताकतवर भूमिका
अगर हम क्षेत्रवार देखें तो कृषि ने इस बार बड़ी भूमिका निभाई। बेहतर मानसून और सरकारी निवेश की बदौलत कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में 3.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि पिछले साल यह केवल 1.5 प्रतिशत थी। विनिर्माण क्षेत्र ने 7.7 प्रतिशत की दर से विकास किया और निर्माण क्षेत्र ने 7.6 प्रतिशत की। सेवा क्षेत्र, जो भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, ने 9.3 प्रतिशत की शानदार गति हासिल की, जबकि पिछले साल यह महज़ 6.8 प्रतिशत था। यानी कि ग्रामीण खेतों से लेकर शहरी बाजारों तक और फैक्टरी की मशीनों से लेकर डिजिटल सेवाओं तक हर जगह विकास की आहट साफ-साफ सुनाई दे रही है।
सकल स्थायी पूंजी निर्माण में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज
आर्थिक स्वास्थ्य का एक बड़ा संकेतक निवेश का स्तर होता है। इस तिमाही में सकल स्थायी पूंजी निर्माण में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई, जबकि पिछले साल यह 6.7 प्रतिशत थी। इसका सीधा मतलब है कि भारत में उद्योगों और बुनियादी ढांचे में निवेश का रुझान तेज है। सरकार के अंतिम उपभोग व्यय में भी 9.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में दोगुने से अधिक है। राजमार्गों, रेलवे, बंदरगाहों और हवाई अड्डों में सरकारी पूंजीगत खर्च ने इस वृद्धि को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है।
ग्रामीण मांग का मजबूत बने रहना भी इस वृद्धि की कहानी का अहम हिस्सा है। बेहतर मानसून, कृषि उत्पादन और सरकारी योजनाओं ने गांवों में खपत को बनाए रखा। हालांकि निजी अंतिम उपभोग व्यय की वृद्धि पिछले साल की तुलना में कुछ धीमी रही। सात प्रतिशत की तुलना में महज 8.3 प्रतिशत, लेकिन कुल तस्वीर में इसका असर गंभीर नहीं पड़ा, क्योंकि सार्वजनिक निवेश ने इस कमी की भरपाई कर दी।
आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा कहते हैं कि सामान्य से बेहतर दक्षिण-पश्चिम मानसून, कम मुद्रास्फीति, बढ़ती क्षमता उपयोग और अनुकूल वित्तीय परिस्थितियों से आर्थिक गति बनी रहने की उम्मीद है। मज़बूत सरकारी पूंजीगत व्यय सहित सहायक मौद्रिक, नियामक और राजकोषीय नीतियों से भी मांग में वृद्धि होनी चाहिए। निर्माण और व्यापार में निरंतर वृद्धि के साथ सेवा क्षेत्र में भी तेजी बनी रहने की संभावना है।
अमेरिका और यूरोप मंदी की आशंकाओं से जूझ रहे
अगर हम वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह सफलता और बड़ी दिखाई देती है। अमेरिका और यूरोप मंदी जैसी आशंकाओं से जूझ रहे हैं। चीन की अर्थव्यवस्था भी पिछले वर्षों की तरह तेजी से नहीं बढ़ रही। ऐसे समय में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी माना है कि भारत आने वाले वर्षों में 6 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर बनाए रखने वाली दुनिया की एकमात्र प्रमुख अर्थव्यवस्था रहेगा। यह भारत की नीतिगत स्थिरता, युवा जनसांख्यिकी, डिजिटल क्रांति और बुनियादी ढांचे पर किए जा रहे भारी-भरकम निवेश का परिणाम है।
ये बनी भारत की सबसे बड़ी ताकत
यहां यह बात समझनी होगी कि अमेरिकी टैरिफ बम से भारत कैसे बचा! दरअसल, इसका पहला कारण है, भारत का विशाल घरेलू उपभोक्ता बाजार। 140 करोड़ की जनसंख्या अपने आप में एक बहुत बड़ी ताकत है। जब घरेलू मांग बनी रहती है, तो बाहरी झटकों का असर सीमित हो जाता है। दूसरा कारण है, केन्द्र की मोदी सरकार की नीतियां। आत्मनिर्भर भारत अभियान, वोकल फॉर लोकल, स्टार्टअप्स और एमएसएमईस को समर्थन, सबने मिलकर विदेशी दबाव कम किया। तीसरा कारण यह है कि जनता का सहयोग। उपभोक्ताओं ने कठिन परिस्थितियों में भी देशी उत्पादों का साथ दिया, स्थानीय उद्योगों को प्रोत्साहन दिया और आर्थिक आत्मनिर्भरता को मजबूत किया।
भारत की यह मजबूती शोधपरक दृष्टि से भी दिलचस्प है। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि भारत की सबसे बड़ी ताक़त उसका युवा जनसंख्या आधार है। आधे से अधिक लोग 35 साल से कम उम्र के हैं। डिजिटल इकोनॉमी तेजी से बढ़ रही है और स्टार्टअप इकोसिस्टम में भारत दुनिया में सबसे आगे है। इसके साथ ही रिज़र्व बैंक और सरकार की समन्वित नीतियां अर्थव्यवस्था को स्थिरता देती हैं।
आज भारत जिस आत्मविश्वास से आगे बढ़ रहा है, वह केवल आर्थिक संकेतकों की कहानी नहीं है। यह जनता और सरकार की साझी ताकत की गाथा है। यह उस देश की कहानी है जो बाहरी दबावों के बावजूद न केवल टिकता है, बल्कि और तेज दौड़ने लगता है। अमेरिका का टैरिफ बम भारत को डराने में नाकाम रहा। इसके उलट इसने भारत की अर्थव्यवस्था को और भी मज़बूत कर दिया।
इन सभी तथ्यों के आधार पर निष्कर्ष रूप में यही कहना होगा कि जब दुनिया मंदी के डर और वैश्विक व्यापारिक तनाव से घिरी है, भारत ने यह दिखाया है कि उसकी अर्थव्यवस्था का इंजन आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और जन-सहयोग से चलता है। यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है और यही उसे आने वाले वर्षों में वैश्विक नेतृत्व की राह पर ले जाएगा।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी