Enter your Email Address to subscribe to our newsletters

प्रयागराज, 11 सितंबर (हि.स.)। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि जब पुलिस विवेचना के बाद किसी मामले में केवल गैर-संज्ञेय अपराध पाए जाते हैं, तो पुलिस अधिकारी द्वारा दाखिल चार्जशीट को राज्य के मुकदमे के बजाय परिवाद (कंप्लेंट केस) के रूप में लिया जाना चाहिए।
न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव की एकल पीठ ने यह आदेश विकास सिंह और दो अन्य की ओर से दाखिल याचिका पर पारित किया। फतेहपुर जिले के मलवां थाने में एफआईआर दर्ज कराई गई। जिसमें पुलिस चार्जशीट पर संज्ञान लेकर कोर्ट ने सम्मन जारी किया था।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता ने अदालत में दलील दी कि कथित धाराओं के अपराध गैर-संज्ञेय की श्रेणी में आते हैं। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 2(1)(ह) के स्पष्टीकरण के अनुसार, ऐसी स्थिति में विवेचना अधिकारी की रिपोर्ट को परिवाद माना जाएगा और संबंधित पुलिस अधिकारी को परिवादी माना जाएगा। राज्य की ओर से पेश अपर शासकीय अधिवक्ता ने याचिका का विरोध तो किया, लेकिन इस कानूनी तर्क को चुनौती नहीं दी।
अदालत ने पाया कि फतेहपुर की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत ने 13 अप्रैल 2026 को इस मामले को गलत तरीके से राज्य के मुकदमे के रूप में लेते हुए याचिकाकर्ताओं को सम्मन जारी किया था, जो विधिक भूल है। इसी आधार पर कोर्ट ने सम्मन आदेश को रद्द कर दिया और याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया।
हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस आदेश से निचली अदालत को इस मामले को परिवाद के रूप में आगे बढ़ाने से नहीं रोका जाएगा, यदि कानून के अनुसार ऐसा करना आवश्यक हो।
हिन्दुस्थान समाचार / रामानंद पांडे