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डॉ. मयंक चतुर्वेदी
विश्व अर्थव्यवस्था आज ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां अनिश्चितता ही सबसे बड़ी स्थिरता बन गई है। ऊंची मुद्रास्फीति, संरक्षणवादी व्यापार नीतियां और धीमी आर्थिक वृद्धि ने विकसित देशों तक की विकास गति को कमजोर कर दिया है। ऐसे चुनौतीपूर्ण वैश्विक वातावरण में यदि कोई बड़ी अर्थव्यवस्था लगातार तेजी से आगे बढ़ रही है, तो वह भारत है। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) का यह अनुमान कि भारत वित्त वर्ष 2028-29 तक 5.1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था बन सकता है।
वस्तुत: आज केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा संसद में प्रस्तुत तथ्य इस विश्वास को और मजबूत करते हैं। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7.7 प्रतिशत रही, जबकि चौथी तिमाही में यह 7.8 प्रतिशत दर्ज की गई। यह उपलब्धि ऐसे समय में सामने आई, जब अनेक विकसित अर्थव्यवस्थाएं दो से तीन प्रतिशत की वृद्धि के लिए भी संघर्ष कर रही थीं। इसके बाद वर्तमान वित्त वर्ष में भी भारत की जीडीपी की स्थिति बहुत अच्छी है।
कह सकते हैं कि भारत की यह गति बताती है कि उसकी विकास यात्रा किसी एक क्षेत्र पर निर्भर नहीं है, बल्कि घरेलू मांग, सेवा क्षेत्र, विनिर्माण, सार्वजनिक निवेश और डिजिटल अर्थव्यवस्था जैसे अनेक मजबूत स्तंभों पर आधारित है। जिसमें कि जब हम पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था हो जाने की बात कहते हैं, तब इसका अर्थ सिर्फ जीडीपी के आकार बढ़ जाने तक सीमित नहीं है, इसका अर्थ है;भारत के प्रति दुनिया के निवेशकों का बढ़ता विश्वास, अधिक औद्योगिक उत्पादन, तेजी से बढ़ता निर्यात, करोड़ों नए रोजगार, बेहतर आधारभूत संरचना और वैश्विक आर्थिक निर्णयों में भारत की अधिक प्रभावशाली भूमिका का हो जाना।
यह तो सार्वजनिक सत्य है ही कि जिस देश की अर्थव्यवस्था जितनी बड़ी होती है, उसकी वैश्विक आर्थिक और रणनीतिक हैसियत भी उतनी ही मजबूत होती है। यही कारण है कि भारत का यह लक्ष्य सामरिक और वैश्विक महत्व का भी है।इस लक्ष्य की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि सरकार ने उसके अनुरूप आर्थिक आधार भी तैयार किया है। बजट 2026-27 में प्रभावी पूंजीगत व्यय को बढ़ाकर 17.15 लाख करोड़ रुपये किया गया है, जो सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 4.4 प्रतिशत है। इनमें से 12.22 लाख करोड़ रुपये सड़क, रेलवे, बंदरगाह, पुल, लॉजिस्टिक्स और अन्य आधारभूत संरचना परियोजनाओं पर खर्च किए जाएंगे।
विश्व बैंक, ओईसीडी और एशियाई विकास बैंक जैसे संस्थान लंबे समय से यह रेखांकित करते रहे हैं कि आधारभूत संरचना में निवेश का गुणक प्रभाव सबसे अधिक होता है। इससे निर्माण गतिविधियां बढ़ती हैं, रोजगार सृजित होता है, उद्योगों की लागत घटती है और निजी निवेश को भी गति मिलती है। भारत की वर्तमान विकास रणनीति इसी आर्थिक सिद्धांत पर आधारित दिखाई देती है।
सरकार ने राजकोषीय अनुशासन को भी समान महत्व दिया है। बजट में राजकोषीय घाटे को 4.3 प्रतिशत तक सीमित रखने और वर्ष 2031 तक केंद्र सरकार के ऋण को जीडीपी के लगभग 50 प्रतिशत के दायरे में लाने का लक्ष्य यह संकेत देता है कि विकास और वित्तीय स्थिरता को साथ लेकर चलने का प्रयास किया जा रहा है। वस्तुत: यही संतुलन किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था की दीर्घकालिक विश्वसनीयता का आधार बनता है।
घरेलू मांग को मजबूत बनाने की दिशा में नया आयकर अधिनियम-2025 भी महत्वपूर्ण कदम है। 12.75 लाख रुपये तक की वार्षिक आय पर कर राहत से मध्यम वर्ग की क्रय-शक्ति बढ़ेगी। भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत उसका विशाल घरेलू बाजार है। जब उपभोग बढ़ता है, तब उत्पादन बढ़ता है, निवेश बढ़ता है और रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं।
इसके साथ ही भारत को वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनाने की दिशा में भी उल्लेखनीय प्रगति दिखाई दे रही है। उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना, 'मेक इन इंडिया', अनुबंध विनिर्माण को बढ़ावा, इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग का विस्तार और इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 यह संकेत देते हैं कि भारत अब उच्च मूल्य वाले विनिर्माण का वैश्विक केंद्र बनने की तैयारी कर रहा है। वैश्विक कंपनियां अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं का विविधीकरण कर रही हैं और भारत उनके लिए सबसे विश्वसनीय विकल्पों में उभर रहा है। मोबाइल फोन निर्यात से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण तक भारत की बढ़ती हिस्सेदारी इस परिवर्तन की शुरुआती झलक भी दे रही है।
सरकार ने विकास के जिन पांच स्तंभों- आधारभूत संरचना, विनिर्माण, कृषि आधुनिकीकरण, व्यापार सुगमता और डिजिटलीकरण को प्राथमिकता दी है, वे वास्तव में भविष्य की भारतीय अर्थव्यवस्था की आधारशिला हैं। वर्तमान में पीएम गतिशक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान, राष्ट्रीय जलमार्गों का विस्तार, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, यूपीआई, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, हरित ऊर्जा और कौशल विकास जैसी पहलें यह दर्शाती हैं कि भारत आने वाले दशकों की प्रतिस्पर्धा को ध्यान में रखकर निवेश कर रहा है।
विशेष रूप से एमएसएमई क्षेत्र पर सरकार का जोर अत्यंत महत्वपूर्ण है। यही क्षेत्र भारत में सबसे अधिक रोजगार उपलब्ध कराता है और निर्यात का भी बड़ा आधार है। यदि छोटे उद्योगों को सस्ती पूंजी, बेहतर तकनीक, सरल नियम और वैश्विक बाजार तक पहुंच मिलती है, तो पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य अधिक तेजी से प्राप्त किया जा सकता है। यही कारण है कि बजट में ऋण गारंटी योजनाओं, औद्योगिक क्लस्टरों के पुनर्जीवन और संस्थागत वित्त तक पहुंच बढ़ाने पर विशेष बल दिया गया है।
यह सही है कि भारत ने पहले वर्ष 2024-25 तक पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य रखा था, किंतु वैश्विक महामारी के बाद उत्पन्न परिस्थितियां, अंतरराष्ट्रीय संघर्ष, वैश्विक मुद्रास्फीति और डॉलर के मुकाबले रुपये की विनिमय दर में बदलाव ने उस समयसीमा को प्रभावित किया। किंतु महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि लक्ष्य नहीं बदला, केवल समय बदला है। आर्थिक विकास की दिशा और गति आज भी बनी हुई है। यही किसी भी मजबूत अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा संकेत होता है।
निस्संदेह, आगे की राह आसान नहीं है। वैश्विक अनिश्चितताओं, ऊर्जा कीमतों, जलवायु परिवर्तन और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में संभावित व्यवधानों पर लगातार नजर रखनी होगी। साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। जब आर्थिक वृद्धि रोजगार सृजन, किसानों की आय, उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मकता और नागरिकों की जीवन गुणवत्ता में वास्तविक सुधार का माध्यम बनती है, तभी वह विकास टिकाऊ और सार्थक कहलाता है।
ऐसे में कहना यही होगा कि भारत आज जिस दिशा में आगे बढ़ रहा है, वह वैश्विक शक्ति संतुलन में अपनी भूमिका को नए सिरे से परिभाषित करने की प्रक्रिया है। यदि सुधारों की गति, निवेश का प्रवाह, राजकोषीय अनुशासन और विकास की समावेशी दृष्टि इसी प्रकार बनी रहती है, तो वित्त वर्ष 2028-29 में पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य भारत की आर्थिक शक्ति, नीतिगत परिपक्वता और वैश्विक नेतृत्व क्षमता की ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में दर्ज होगा।
(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)
हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी