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- निचली अदालत की ओर से सुनाई गई उम्रकैद की सजा निरस्त
नैनीताल, 07 जुलाई (हि.स.)। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने 2014 में विकासनगर में हुए बहुचर्चित हत्या, अपहरण और फिरौती के मामले में निचली अदालत द्वारा तीन आरोपितों को सुनाई गई उम्रकैद की सजा सहित सभी सजाओं को निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा। अदालत ने स्पष्ट किया कि आपराधिक मामलों में केवल संदेह या अपुष्ट साक्ष्यों के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी एवं न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार विकासनगर के अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने फरवरी 2026 में तेजेंद्र उर्फ सीटू, सोनू स्योराण और पीयूष शर्मा को हत्या, अपहरण, फिरौती के लिए अपहरण, लूट, आपराधिक धमकी तथा शस्त्र अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास सहित अलग-अलग अवधियों की सजा सुनाई थी। इन फैसलों को अपीलकर्ताओं ने चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय में चार अलग-अलग आपराधिक अपीलें दायर की थीं, जिनकी संयुक्त सुनवाई करते हुए कोर्ट ने एक साझा निर्णय सुनाया। अभियोजन के अनुसार 19-20 सितंबर 2014 की रात सेलाकुई स्थित एक किराए के मकान में नितेश की चाकू से हमला कर हत्या कर दी गई थी। आरोप था कि घटना के बाद चिराग का अपहरण कर उसे पंचकूला ले जाया गया और उसकी रिहाई के लिए पांच लाख रुपये की फिरौती मांगी गई। पुलिस ने दावा किया था कि पंचकूला और जीरकपुर क्षेत्र में छापेमारी कर आरोपितों को गिरफ्तार किया गया, अपहृत युवक को मुक्त कराया गया तथा हथियार भी बरामद किए गए। सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने पूरे साक्ष्य का विस्तार से परीक्षण किया। अदालत ने पाया कि अभियोजन के सबसे महत्वपूर्ण गवाह काशिश, अनुज कुमार और कथित अपहृत चिराग अदालत में अपने पूर्व बयानों से मुकर गए और उन्होंने आरोपितों की पहचान तक नहीं की। इन गवाहों ने यह भी कहा कि पुलिस के समक्ष दिए गए उनके बयान दबाव में दर्ज कराए गए थे। ऐसे में अभियोजन की पूरी कहानी कमजोर हो गई। खंडपीठ ने अपने निर्णय में कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज बयान अपने आप में ठोस साक्ष्य नहीं होते। ऐसे बयानों के आधार पर अकेले किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि उन्हें न्यायालय में जिरह के माध्यम से परखा जाना आवश्यक होता है। जब मुख्य गवाह ही अदालत में अभियोजन का समर्थन नहीं कर रहे हों, तब केवल ऐसे बयानों के आधार पर दोषसिद्धि कानून की दृष्टि में टिक नहीं सकती। अदालत ने हथियारों की बरामदगी पर भी गंभीर टिप्पणी की, हाईकोर्ट ने कहा कि कथित बरामदगी का कोई स्वतंत्र और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया। बरामदगी के समर्थन में केवल विवेचक का बयान था जबकि स्वतंत्र गवाहों का अभाव रहा। इतना ही नहीं, फॉरेंसिक जांच में बरामद चाकू पर रक्त के निशान भी नहीं पाए गए, जिससे अभियोजन का दावा और कमजोर हो गया।
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हिन्दुस्थान समाचार / लता