प्रधानमंत्री के अनुरोध में छिपा सबका हित
-सियाराम पांडेय ‘शांत’ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अमेरिका-ईरान युद्ध के मद्देनजर कुछ बड़े और कड़े फैसले लिए हैं। उन्होंने देशवासियों से आग्रह किया है कि वे वाहनों के लिए जरूरत के अनुरूप डीजल-पेट्रोल का सीमित उपयोग करें और कम-से-कम एक साल तक
सियाराम पांडेय ‘शांत’


-सियाराम पांडेय ‘शांत’

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अमेरिका-ईरान युद्ध के मद्देनजर कुछ बड़े और कड़े फैसले लिए हैं। उन्होंने देशवासियों से आग्रह किया है कि वे वाहनों के लिए जरूरत के अनुरूप डीजल-पेट्रोल का सीमित उपयोग करें और कम-से-कम एक साल तक सोना न खरीदें। सार्वजनिक वाहनों से यात्रा करें। मेट्रो और रोडवेज बसों, सिटी बसों जैसे सार्वजनिक वाहनों का इस्तेमाल अधिक करें। उन्होंने अपने मंत्रियों से भी कुछ इसी तरह का आग्रह किया है। उन्होंने अधिकारियों से भी अनुरोध किया है कि वे भी डीजल-पेट्रोल की खपत कम करने की दिशा में काम करें। सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से भी उन्होंने लगभग इसी तरह का अनुरोध किया है। एक बार नहीं, अनेक बार किया है ताकि कोई उनके अनुरोध को हल्के में न ले। भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने इस दिशा में काम करना आरंभ भी कर दिया है।

प्रधानमंत्री ने अपने काफिले के वाहनों की तादाद घटाई तो ‘महाजनो येन गता स पंथा:’ की रीति-नीति पर काम करते हुए उनके मंत्रियों ने भी उस पर अमल प्रारंभ कर दिया है। गृहमंत्री, रक्षामंत्री ने भी अपने काफिले की गाड़ियों की संख्या घटा दी है। भाजपा शासित राज्यों उत्तर, प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, ओडिशा और असम आदि राज्यों के मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों के काफिलों में भी वाहनों की संख्या घट गई है। एकाध न्यायाधीश तो साइकिल चलाकर न्यायालय पहुंचे हैं। इन संदेशों के गहरे निहितार्थ हैं, जिन्हें समझे जाने की जरूरत है। प्रधानमंत्री का देशवासियों से आग्रह है कि संभव हो तो कुछ समय के लिए अपनी विदेश यात्रा टाल दें। इससे जहां देश के विदेशी मुद्रा भंडार और आर्थिक सुरक्षा को मजबूती मिलेगी बल्कि विकसित भारत के उसके सपनों के पंख कमजोर नहीं होंगे। इसके विपरीत विपक्ष का तर्क है कि सरकार को यह कदम पहले ही उठाना चाहिए था। आज की तिथि में ऐसा करने का क्या औचित्य है? उनका सवाल कुछ हद तक वाजिब भी है लेकिन यह समय सवाल पूछने का नहीं, अनुरोध की गंभीरता को समझने का है।

मध्य-पूर्व संकट के मद्देनजर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभावों के मद्देनजर प्रधानमंत्री द्वारा उठाया गया यह कदम बेहद मायनेखेज है। भले ही यह निर्णय देर से लिया गया हो लेकिन 'जब जागे तभी सबेरा।' इस निर्णय को दिखावे का विषय नहीं बनना चाहिए वरन देश के हर आम और खास नागरिक को इस दिशा में सोचना चाहिए और तदनुरूप कार्य व्यवहार करना चाहिए। वैसे भी जो राष्ट्र अर्थ संयम के सिद्धांतों का पालन नहीं करता, वह दुखी रहता है। आय और व्यय के बीच संतुलन तो होना ही चाहिए। इतने गंभीर विषय पर राजनीति करना देश को संकट के दलदल में झोंकने जैसा है? यह किसी से छिपा नहीं है कि अमेरिकी राष्ट्रपति तक साइकिल चलाकर अपने फार्म हाउस जाते रहे हैं फिर भारत में बेवजह राजनीतिक अहमन्यता का प्रदर्शन क्यों? दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाले देश के मुखिया को अगर ऊर्जा के समुचित इस्तेमाल की नसीहत देनी पड़ रही है तो इसका मतलब है कि खतरा बड़ा है और देशवासियों ने अपने विवेक से काम नहीं लिया तो पानी सिर से ऊपर बह सकता है। देश को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

अमेरिका-ईरान युद्ध का असर भारत ही नहीं, दुनिया के तमाम देशों पर पड़ा है, यह किसी से छिपा नहीं है। होर्मुज जलडमरूमध्य क्षेत्र से भारतीय तेल टैंकरों का आना कठिन हो रहा है। दूसरी ओर अमेरिका ने भी नाकेबंदी कर रखी है। गनीमत थी कि भारत के कुछ टैंकर आ गए थे लेकिन अगर युद्ध लंबा खिंचता है तो भारत के पास जो भी ईंधन है, उसी से काम चलाना होगा। ऐसे में संयम बरतने के अलावा कोई अन्य विकल्प है भी नहीं। वैसे भी ईरान-अमेरिका के बीच युद्ध समाप्त होने के फिलहाल कोई आसार नहीं हैं। युद्ध विराम के जुबानी प्रपंच के बीच दोनों देशों ने ऐ दूसरे पर टपुट हमले भी किए हैं, उसे युद्ध नहीं तो और क्या कहा जाएगा?

अमेरिका और ईरान की अपनी-अपनी नाकेबंदी के वैश्विक प्रभाव भी किसी से छिपे नहीं हैं। अमेरिका में पेट्रोल का वैसे तो कोई संकट नहीं है लेकिन वहां भी पेट्रोल की कीमत में 7.5 प्रतिशत का इजाफा हो गया है। ब्रिटेन में डीजल की कीमत 33 प्रतिशत बढ़ गई हैं। घर को उष्ण बनाए रखने के लिए एलपीजी का उपयोग लगभग बंद कर दिया गया है। दक्षिण कोरिया में नहाने में शॉवर के न्यूनतम उपयोग, सप्ताहांत में ही वाशिंग मशीन चलाने और सरकारी दफ्तरों में लिफ्ट बंद करने जैसी कुछ व्यवस्थाएं लागू की गई हैं। चीन, फ्रांस, स्पेन, इटली जैसे देशों में भी पेट्रोल-डीजल और गैस के दाम बढ़ा दिए गए हैं। भारत में अभी पेट्रोल के दाम में 3 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी करनी पड़ गई है। अमेरिका और ईरान की तनातनी कम नहीं हुई तो अन्य क्षेत्रों में भी मुद्रासफीति की सुरसा अपने मुंह फैला सकती है।

दरअसल, इस निर्णय को सरकार की विवशता के तौर पर ही लिया जाना चाहिए। इसमें जनता को बेवजह परेशान करने की मानसिकता तलाशना, वास्तविकता से मुंह मोड़ने जैसा है। प्रधानमंत्री मोदी की इस बात में दम है कि भारत में कच्चे तेल के बड़े कुएं न होने की वजह से तेल आयात करना हमारी विवशता है। युद्ध के कारण और कच्चा तेल लगातार महंगा होने के चलते भारत की तेल कंपनियों को 30 हजार करोड़ रुपये प्रतिमाह नुकसान सर्वविदित है। हर रोज का औसत घाटा 1600 करोड़ रुपये के आसपास है। सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर जो टैक्स कम किया था, उससे ही सरकार को हर माह 14 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है। सच तो यह है कि भारत विदेश से 93 लाख करोड़ रुपये का डीजल- पेट्रोल और गैस का आयात कर रहा है। देश का वार्षिक व्यापार घाटा भी 11.3 लाख करोड़ रुपये का है।

इस सत्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि अमेरिकी टैरिफ और अमेरिका-ईरान युद्ध के चलते भारत के आर्थिक और कारोबारी हालात बिगड़े हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी का संयमित खर्च का अनुरोध काबिलेगौर भी है और जरूरत के अनुरूप भी है। देश का मुखिया होने के नाते अपनों को समय रहते सचेत करने की उनकी जिम्मेदारी भी बनती है। इसे अन्यथा लिया जाना या फिर बात का बतंगड़ बनाना किसी भी लिहाज से उचित नहीं है। उन्होंने तो यहां तक कहा है कि देशवासी अपने भोजन में तेल की मात्रा घटाएं। ऐसा करने से वे स्वस्थ भी रहेंगे और देश पर भी खाद्य तेल आयात करने का बोझ भी कम होगा।

भारत के दर्जन भर जहाज, टैंकर फिलहाल होर्मुज जलडमरूमध्य के पास समुद्र में फंसे हैं। हमलों में भारत के कुछ नाविक मारे गये हैं और कुछ घायल भी हुए हैं। ईरान और अमेरिका धमकियां दे रहे हैं और होर्मुज जलमार्ग का नाजायज फायदा उठा रहे हैं। रही बात सोने के आयात की तो भारत ने 2025-26 में 6.40 लाख करोड़ रुपये का सोना आयात किया था। विदेश यात्राओं पर भारतीय नागरिक लगभग 3.65 लाख करोड़ रुपये हर वर्ष खर्च करते हैं। इन पर थोड़ी भी रोक लगेगी तो भी विदेशी मुद्रा तो बचेगी ही। 2025-26 में भारत ने कच्चे तेल के आयात पर 10. 35 लाख करोड़ रुपये खर्च किए। चूंकि ईरान युद्ध के कारण कच्चा तेल 50 फीसदी महंगा हो गया है, लिहाजा अब हमें तेल के आयात पर करीब 17 लाख करोड़ रुपये खर्च करने पड़ेंगे। यह बोझ देश की अर्थव्यवस्था पर ही पड़ेगा। विश्व बैंक भी मानता है कि युद्ध के कारण 2026 में ऊर्जा की कीमतें 24 फीसदी तक बढ़ सकती हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री की अपील पर अमल करने में ही देश का कल्याण है। किसी के झांसे में आने की बजाय देशवासी अपने हितों पर खुद मंथन करें।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगियों से सप्ताह में कम से कम एक दिन सार्वजनिक वाहन का उपयोग करने का आह्वान किया है और उन्हें शासन में मितव्ययिता,ऊर्जा संरक्षण और जनप्रेरक आचरण की नई कार्य संस्कृति विकसित करने का संदेश दिया है। उन्होंने मंत्रियों से अपने काफिले को 50 प्रतिशत तक कम करने का भी आह्वान किया है। मुख्यमंत्री ने अगले छह माह तक राज्य सरकार के सभी मंत्रियों एवं वरिष्ठ अधिकारियों को अपरिहार्य परिस्थितियों को छोड़कर विदेश यात्राओं से परहेज करने के निर्देश दिए हैं। जिन किन्हीं राज्यों में इस तरह की पहल पर काम हो रहा है, उसकी जितनी भी सराहना की जाए, कम है।

इसमें संदेह नहीं कि मौजूदा हालात में ईंधन संरक्षण केवल आर्थिक आवश्यकता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय दायित्व भी है। एक जनप्रतिनिधि का आचरण ही जनता के लिए सबसे बड़ा संदेश होता है। मंत्री, अधिकारी अपने आचरण पर डटे रहे तो जनता उनसे आगे बढ़कर ऊर्जा संरक्षण और देश की आर्थिक सुरक्षा पर अपना ध्यान केंद्रित करेगी। इसमें रंच मात्र संदेह नहीं है। विपक्ष प्रधानमंत्री पर ‘ पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ वाला आरोप लगा रहा था लेकिन प्रधानमंत्री ने अपने निर्णय को सर्वप्रथम खुद पर लागू किया है और इसके बाद उसे अपने सहयोगियों और देशवासियों के विवेक पर छोड़ दिया है। कुछ लोग उनकी विदेश यात्रा पर सवाल कर रहे हैं लेकिन सोचना होगा कि जब वाकई संवाद की जरूरत है, ऐसे में घर बैठे तमाशा देखना क्या उचित होगा।

सवाल इस बात का भी है कि हमें इस मुद्दे पर अमल कर अपने देश को आगे ले जाना है या दिखावे की सामाजिक संस्कृति को आगे बढ़ाना है। नीति भी कहती है कि धनार्जन और धन का संरक्षण यत्नपूर्वक किया जाना चाहिए। ‘धनात धर्म: तत: सुखम।’ धन रहेगा तभी धर्म भी होगा और धर्म रहेगा तभी सुख भी मिलेगा। अब यह हमें तय करना है कि हमें ऊर्जा संरक्षण को महत्व देना है या उसके अंधाधुंध मनमाने उपयोग को। फैसला हमारा है कि हम इस बावत केवल कुछ दिनों का दिखावा करेंगे या अपने जीवन व्यवहार में भी अर्थ संयम और ऊर्जा संरक्षण की जरूरतों को सतत अहमियत देंगे।

(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश