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- डॉ. मयंक चतुर्वेदी
इस समय पश्चिम एशिया में संघर्ष, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें विश्व अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बनी हुई हैं, पर इन सबके बीच भारत का प्रदर्शन आश्चर्यजनक रूप से संतुलित और सुदृढ़ दिखाई देता है। विश्व बैंक से लेकर तमाम अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं आश्वस्त कर रही हैं कि भारत जिस तरह से अपनी अर्थव्यवस्था और भविष्य की दृष्टि से हर चुनौती के लिए तैयार दिख रहा है, वह काबिले तारीफ है।
वस्तुत: वर्ल्ड बैंक द्वारा 2026 के लिए भारत की जीडीपी वृद्धि दर को 6.6 प्रतिशत तक बढ़ाना इस बात का प्रमाण है कि भारत हर परिस्थिति पर नियंत्रित करने की क्षमता रखने वाला राष्ट्र है। यहां समझनेवाली बात है कि यह इतना आसान भी नहीं है, जितना कि बाहर से किसी को दिखाई दे, क्योंकि महंगाई, ऊर्जा लागत और वैश्विक अस्थिरता जैसे खतरे सामने खड़े हैं। ऐसे मे यदि हम वर्ल्ड बैंक के अतिरिक्त अन्य प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के अनुमानों पर दृष्टि डालें, तब एक समान संदेश सामने आता है, वह है कि भारत स्थिर है, सक्षम है और आगे बढ़ने के लिए तैयार है।
इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड ने भी 2026 के लिए भारत की वृद्धि दर 6.5 प्रतिशत से 6.8 प्रतिशत के बीच रहने का अनुमान व्यक्त किया है। इसका मानना है कि भारत की आर्थिक संरचना इतनी मजबूत है कि वह बाहरी झटकों को सहजता से झेल सकती है, क्योंकि इसकी रीढ़ घरेलू मांग है, न कि केवल निर्यात। इसी प्रकार एशियन डेवलपमेंट बैंक ने 6.7 प्रतिशत की वृद्धि दर का अनुमान लगाते हुए स्पष्ट किया है कि भारत का बुनियादी ढांचा निवेश और विनिर्माण क्षेत्र में सुधार इसे 2026 में पूरे वर्ष भर वैश्विक संकटों से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। यही विचार ऑर्गनाइजेशन फॉर इकॉनमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट के भी हैं, जोकि भारत की वृद्धि को 6.6 प्रतिशत से 6.9 प्रतिशत के बीच मानता है और यह रेखांकित करता है कि भारत की कर प्रणाली, श्रम सुधार और निर्यात रणनीति इसे अन्य अर्थव्यवस्थाओं से अलग बनाती है।
अब बात यहां मूडीज़ के साथ स्टैंडर्ड एंड पुअर्स और फिच रेटिंग्स जैसी रेटिंग एजेंसियों की भी कर लेते हैं, यह भी भारत के संदर्भ में लगभग 6.4 प्रतिशत से 6.8 प्रतिशत की स्थिर वृद्धि का अनुमान देती हैं। इन संस्थाओं का एकमत विश्वास इस तथ्य को पुष्ट करता है कि भारत आज के समय में सिर्फ संभावनाओं की अर्थव्यवस्था से कहीं आगे होकर अपना प्रदर्शन कर रहा है।
घरेलू मांग है भारत की सबसे बड़ी शक्ति
भारत की आर्थिक मजबूती का सबसे बड़ा आधार उसकी घरेलू मांग है। जब वैश्विक बाजारों में मांग घटती है, तब भी भारत के भीतर उपभोग का स्तर अपेक्षाकृत स्थिर रहता है। यह एक ऐसी विशेषता है जो बहुत कम देशों में देखने को मिलती है। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) में संभावित कटौती, सरकारी योजनाओं के माध्यम से आय में वृद्धि और ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती क्रय शक्ति ने उपभोग को निरंतर बनाए रखा है। यही कारण है कि वैश्विक मंदी का प्रभाव भारत पर सीमित रहता है। वहीं, भारत सरकार द्वारा बुनियादी ढांचे में किया जा रहा निवेश आर्थिक विकास का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुका है। सड़कें, रेलवे, बंदरगाह और डिजिटल नेटवर्क इन सभी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर पूंजीगत व्यय किया जा रहा है।
यह निवेश वर्तमान विकास को सतत बढ़ा रहा है, बल्कि यह भी कह सकते हैं कि यह भविष्य के लिए भी एक मजबूत आधार तैयार करता है। क्योंकि जब निजी निवेश अनिश्चितता के कारण धीमा पड़ता है तब सरकारी निवेश अर्थव्यवस्था को गति देने का कार्य करता है।
डिजिटल क्रांति और ऊर्जा बनी नई अर्थव्यवस्था की पहचान
भारत की डिजिटल क्रांति इन दिनों आर्थिक गतिविधियों को एक नई दिशा दे रही है। यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई), आधार और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) जैसी प्रणालियों ने आर्थिक लेन-देन को सरल और तेज बना दिया है। छोटे व्यापारियों से लेकर बड़े उद्योगों तक, डिजिटल तकनीक ने सभी को सशक्त बनाया है। यह परिवर्तन भारत को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे ले जाने वाला एक महत्वपूर्ण कारक है।
इसके अलावा एक कारण देश में ऊर्जा की पर्याप्तता भी है। दरअसल, पश्चिम एशिया के संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों को अस्थिर कर दिया है। तेल की कीमतों में वृद्धि से महंगाई बढ़ने का खतरा बना हुआ है। लेकिन भारत ने इस चुनौती का सामना करने के लिए बहुआयामी रणनीति अपनाई है।ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण, रणनीतिक भंडार का निर्माण और नवीकरणीय ऊर्जा (सोलर, विंड) की ओर तेजी से बढ़ते कदम, वस्तुत: ये सभी प्रयास भारत को इस संकट से बचाने में सहायक सिद्ध हुए हैं।
मुद्रास्फीति और संतुलन की नीति
यहां कहना यह भी होगा कि वर्तमान में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने महंगाई को नियंत्रित करने के लिए संतुलित मौद्रिक नीति अपनाई है। जहां एक ओर ब्याज दरों के माध्यम से मुद्रास्फीति पर नियंत्रण रखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर विकास की गति को भी प्रभावित नहीं होने दिया जा रहा। सरकार द्वारा लक्षित सब्सिडी प्रदान करना और आवश्यक वस्तुओं की कीमतों को नियंत्रित करना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
इन्हीं तथ्यों को ओर बेहतर तरीके से पुस्तक “द इंडिया वे” में एस. जयशंकर और गहराई से स्पष्ट करते हैं, उनका कहना है कि भारत की नीति “रणनीतिक स्वायत्तता” पर आधारित है, यानी कि भारत अपने निर्णय स्वयं लेता है और वैश्विक दबावों के अनुसार अपनी दिशा नहीं बदलता।“इंडिया सीक्स टू शेप ग्लोबल आउटकम्स, नॉट जस्ट रिएक्ट टू देम।” इसी प्रकार “इंडिया अनबाउंड” के लेखक गुरचरण दास इस बात को रेखांकित करते हैं कि आर्थिक सुधारों ने भारत को लचीला और आत्मनिर्भर बनाया है।“इकोनॉमिक फ्रीडम हैज़ अनलीश्ड इंडियाज़ एंटरप्रेन्योरियल एनर्जी।” निश्चित तौर पर यह विचार भारत की वर्तमान आर्थिक नीतियों में स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।
इसके साथ ही भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा जनसंख्या बनकर उभरी है। एक विशाल कार्यबल न सिर्फ उत्पादन क्षमता को बढ़ाता है, यह नवाचार और उद्यमिता को भी प्रोत्साहित करता है। वस्तुत: जब दुनिया के कई विकसित देश वृद्धावस्था की समस्या से जूझ रहे हैं, तब भारत की युवा ऊर्जा उसे निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।
कुल मिलाकर कहना यही है कि वर्ष 2026 का वैश्विक परिदृश्य भले ही आज तमाम चुनौतियों से भरा हुआ है, किंतु भारत ने यह सिद्ध कर दिया है कि मजबूत नीतियां, संतुलित दृष्टिकोण और दीर्घकालिक योजनाएं किसी भी संकट को अवसर में बदल सकती हैं। आज यह 6.4 प्रतिशत से 6.8 प्रतिशत की अनुमानित वृद्धि दर भारत की आर्थिक क्षमता, नीति-निर्माण की दक्षता और जनता की ऊर्जा का प्रतीक बनकर हमारे सामने है।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी