लोस चुनाव 2024 : 46 वर्षों से तीन दिग्गजों पर केंद्रित रही जनजाति बहुल शहडोल लोकसभा सीट
- राजेश शुक्ला अनूपपुर, 03 मार्च (हि.स.)। आधे से अधिक जनजाति मतदाताओं वाली सुरक्षित शहडोल लोकसभा सी
सांसद हिमान्द्री सिंह


- राजेश शुक्ला

अनूपपुर, 03 मार्च (हि.स.)। आधे से अधिक जनजाति मतदाताओं वाली सुरक्षित शहडोल लोकसभा सीट में आठ विधानसभा क्षेत्र हैं। जिसमेंं चार जिलों के जयसिंहनगर, जैतपुर, मानपुर, बांधवगढ़, अनूपपुर, कोतमा, पुष्पराजगढ़ और बड़वारा शामिल हैं। यह क्षेत्र कभी रीवा रियासत के अधीन था। ब्रिटिश साम्राज्य के दौरान भी शहडोल, उमरिया और अनूपपुर क्षेत्र में राज परिवारों ने वर्चस्व बनाए रखा। वर्ष 1977 के बाद शहडोल लोकसभा क्षेत्र को राजनीतिक तीन नेताओं, परिवारों से संकलित होती रही है। इन 46 वर्षों में 13 वार लोकसभा चुनाव हुए, जिसमें सबसे ज्यादा पांच बार स्व. दलपत सिंह परस्ते अलग-अलग पार्टियों के टिकट पर जीतकर लोकसभा पहुंचे।

कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व. दलबीर सिंह तीन बार सांसद बने, जबकि उनकी पत्नी राजेशनंदिनी सिंह ने एक बार कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव जीता। वर्तमान में दलवीर सिंह और राजेशनंदिनी की पुत्री हिमान्द्री सिंह भाजपा से यहां की सांसद हैं। भाजपा के ज्ञान सिंह भी यहां से दो बार सांसद रह चुके हैं। इस अपेक्षाकृत पिछड़े इलाके में स्वतंत्रता के बाद से सत्ता की चाबी सीमित जनप्रतिनिधियों और परिवार तक सिमटी रही। कोयला खदानों, बिजली प्लांट और अन्य वनोपज के माध्यम से राज्य की आर्थिक गति बढ़ाने में आम भूमिका निभा रहे संसदीय क्षेत्र ने सदैव उन जनप्रतिनिधियों का चयन किया जिनमें मतदाताओं को संभावना नजर आई। समाजवादी विचारधारा रखने वाले नेताओं ने भी इस सीट से जीत हासिल की तो कांग्रेस ने भी लंबे समय तक यहां दबदबा बनाए रखा।

जिनके सामने चुनाव लड़ा उन्हीं के बने दामाद

शहडोल की राजनीति में परिवारों के वर्चस्व में कई अनूठे संयोग भी बने। भाजपा ने वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में नए चेहरे नरेंद्र सिंह मरावी को अवसर दिया। नरेंद्र सिंह वर्तमान सांसद हिमान्द्री सिंह के पति हैं। वर्ष 2009 में नरेंद्र सिंह के सामने हिमाद्री की मां राजेशनंदिनी सिंह कांग्रेस की उम्मीदवार बनीं। उन्होंने नरेंद्र निह मरावी को हरा दिया। बाद में संयोग कुछ ऐस बना कि नरेंद्र का विवाह हिमान्द्री से हो गया और ये राजेश नंदिनी के दामाद बन गए।

वर्ष 2019 में हिमान्द्री सिंह को शहडोल से टिकट देने का मन बना चुकी कांग्रेस ने उनके सामने शर्त रखी कि वह पति नरेंद्र सिंह मरावी को पार्टी में शामिल कराएं लेकिन हिमान्द्री ऐसा करने के लिए तैयार नहीं हुईं। उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया। हिमान्द्री को भाजपा ने इसलिए पार्टी में शामिल किया था कि वह अपने गृह क्षेत्र पुष्पराजगढ़ में कांग्रेस को खत्म कर देंगी लेकिन ऐसा नहीं हो पाया और वहां कांग्रेस के फुन्देलाल सिंह मार्को विधायक चुने गये।

अजीत जोगी को करना पड़ा था छत्तीसगढ़ का रुख

यहां के मतदाता समय समय पर नेताओं को सबक सिखाने में भी पीछे नहीं रहे। दलबीर सिंह और अतीत जोगी जैसे कद्दावर नेताओं को भी यहां हार का मुंह देखना पड़ा है । यहीं से केंद्रीय राज्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे दलवीर सिंह को इसी सीट ने राजनीति के हाशिये पर पहुंचा दिया तो अजीत जोगी को आखिरकार छत्तीसगढ़ का रुख करना पड़ा। बाद में अजीत जोगी छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री बने। कांग्रेस ने बीच में कई अन्य प्रयोग भी किए लेकिन हर बार शहडोल के मतदाताओं ने ऐसे तमाम प्रयोगों को नकार दिया। वर्ष 1977 में धनशाह, वर्ष 1980 में कुंदन शाह, वर्ष 1991 में हेमवत पोर्ते, वर्ष 1999 में अजीत जोगी, वर्ष 2018 में प्रमिला सिंह ने चुनाव लड़ा लेकिन किसी को सफलता नहीं मिली।

1996 में भाजपा ने ध्वस्त किया कांग्रेस का किला

शहडोल में वर्ष 1962 तक समाजवादी विचारधारा के उम्मीदवारों का बोलबाला रहा। सात में से पांच विधानसभा सीट लंबे समय तक इसी विचारचारा वाले जनप्रतिनिधियों के पास रहीं। वर्ष 1962 के बाद कांग्रेस ने यहां अपनी पकड़ मजबूत करने में सफल हो सकी। लंबे समय से जीत से वंचित रही भाजपा ने वर्ष 1996 में कांग्रेस का किला यहां पर ढहाने में सफलता पा ली । हालांकि वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की राजेश नंदिनी सिंह ने भाजपा उम्मीदवार को हरा दिया और एक बार फिर सीट कांग्रेस के कब्जे में चली गई।

2019 में प्रमुख दलों के प्रत्याशियों में अदला-बदली

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने कांग्रेस के कद्दावर नेता दलबीर सिंह की बेटी हिमान्द्री सिंह को मैदान में उतारा तो कांग्रेस ने भाजपा की बागी नेत्री प्रमिला सिंह को अपना उम्मीदवार बनाया।

रीवा महाराज के समर्थन से निर्दलीय ने जीत लिया चुनाव

वर्ष 1971 का लोकसभा चुनाव भी बड़ा उलटफेर वाला रहा। रीवा राजघराने के पूर्व महाराजा मार्तड सिंह के समर्थन से निर्दलीय उम्मीदवार घनाशाह प्रधान ने चुनाव में मैदान मार लिया। बड़े राजनैतिक दलों के लिए यह बड़ा झटका था।

अब तक के सांसद

वर्ष 1952 में पहली लोकसभा में रणदमन सिंह किसान मजदूर पार्टी से सांसद वर्ष 1957 तक रहे। वर्ष 1957 से 1962 तक कांग्रेस के कमल नारायण सिंह, वर्ष 1962 से 1967 तक सोशलिस्ट पार्टी के बुद्ध सिंह उटिया, वर्ष 1967 से 1971 तक गिरजा कुमारी, निर्दलीय धनशाह प्रधान 1971 से 1977 तक, भाजपा के दलपत सिंह परस्ते 1977 से 1980,1989,19991989,1999,2004 एवं 2014 तक सांसद रहे। दलबीर सिंह 1980 से 1984, 1991 एवं 1996 एवं 2016 तक, राजेश नंदिनी सिंह 2009 से 2014, भाजपा के ज्ञान सिंह 1996, 2016 एवं 2019 के बाद हिमान्द्री सिंह ने 2019 में कांग्रेस की प्रमिला सिंह को हराया।

हिन्दुस्थान समाचार/ /मयंक