लोस चुनाव : सपा के गढ़ में कमलेश कठेरिया ने ठोकी थी चुनावी ताल, आज भी दमखम को याद करती है जनता
- गुजरे 2009 के चुनाव में भले ही हार मिली लेकिन विपक्ष को किया था बेचैन - बिना किसी लहर और परम्पराग
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- गुजरे 2009 के चुनाव में भले ही हार मिली लेकिन विपक्ष को किया था बेचैन

- बिना किसी लहर और परम्परागत मतों की सेंधमारी के बीच बेहतर मतों आंकड़ा किया था पार

औरैया, 08 फरवरी (हि.स.)। सियासी गलियारों में लोकसभा चुनाव की सरगर्मियां जोर पकड़ रहीं हैं। ऐसे में गुजरे चुनाव की यादें भी ताजा हो रही हैं। इस चर्चा और परिचर्चा के दौरान पार्टियों के उम्मीदवार चयन को लेकर लोगों में पुराने चेहरों को लेकर खासी सुगबुहट देखने को मिल रही हैं। जनपद में इन चर्चाओं में कमलेश कठेरिया का चुनाव लड़ना और आम जनों के प्रति लगाव, संघर्ष की लोग लोकसभा चुनाव के नजदीक आते ही याद कर रहे हैं।

समाजवादी गढ़ रही इटावा लोकसभा में जहां जातिगत और सैफई परिवार की आमजन के बीच गहरी पैठ ने हमेशा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को हाशिये पर रखा। इसके बावजूद लोकसभा चुनाव 2009 में जब चुनाव सम्पन्न हुए तब सफलता के शिखर पर सवार सपा को जीत का आंकड़ा छूने के लिए रात दिन करना पड़ गया था। इसके परिणाम भी देखने को मिले और बीजेपी ने यहां महिला शक्ति के रूप में कमलेश कठेरिया को उम्मीदवार बनाकर तीसरी ताकत और प्रबल दावेदार पूर्व कैबिनेट मंत्री रहे दलितों के बड़े चेहरा गौरीशंकर को पछाड़ कर मतदाताओं के लाखों मतों में अपनी उपस्थिति दर्ज करवायी थी।

चुनावी मामलों में खासी दिलचस्पी रखने वाले पत्रकार जय मिश्रा बताते हैं कि तब तक के हुए चुनावों में सुखदा मिश्रा के बाद बीजेपी से कमलेश कठेरिया का चुनावी प्रबंधन और लोगों में पकड़ काबिल-ए-तारीफ थी। उस चुनाव में भले ही जीत का सेहरा सपा के सिर बंधा हो, मगर इस त्रिकोणीय मुकाबले में बसपा के सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय के नारे को कमलेश कठेरिया की लोकप्रियता ने नेस्तनाबूद कर डाला था। लोगों की उम्मीद से कहीं ज्यादा मत मिलने के पीछे उनकी मेहनत की लोग आज भी चर्चा करते नहीं थकते हैं। गौरतलब है कि इस नेत्री ने निकट संबंधियों सहित आम जनों से लगातार सम्पर्क बनाए रखा, जिसे दूसरे दलों के लोग भी खूब सराहते हैं।

सरकारी योजनाओं को डोर टू डोर में पहुंचाने में महती भूमिका

वर्तमान में डबल इंजन सरकार द्वारा चलाई जा रहीं तमाम जनकल्याणकारी योजनाओं का फीडबैक लेने और वंचितों को जोड़ने की ललक एक कार्यकर्ता के रूप में कमलेश को घर-घर में लोकप्रिय बनाती है। विकास से पिछड़े बीहड़ क्षेत्र में सड़कों और पुलियों सहित सम्पर्क मार्गों को दुरुस्त करवाने में, आमजन की आवाज बुलंद करने में उनकी जमकर सराहना हो रही है।

हारने का नहीं रहा मलाल

लोगों में यह भी चर्चा है कि जो उम्मीदवार चुनाव हार जाता है वह पीछे मुड़कर देखना तो दूर कार्यकर्ताओं और जनता से भी दूरियां बना लेता है, मगर कमलेश कठेरिया इसका अपवाद रहीं हैं और उनमें लोगों से दूरी के बजाए निकटता एक कुशल नेतृत्व की झलक देखने को मिल रही है। इन दिनों लोकसभा चुनाव की सरगर्मियों के बीच उनकी क्षेत्रीय जनता में चर्चा हो रही है।

हिन्दुस्थान समाचार/सुनील /मोहित