भारतीय साहित्य को देश के कोने-कोने में पहुंचा रहा 'गाथा' : प्रो. अभय करंदीकर
- आईआईटी कानपुर ने धूमधाम के बीच की चौथे गाथा महोत्सव की मेजबानी कानपुर, 24 जुलाई (हि.स.)। भारतीय
भारतीय साहित्य को देश के कोने कोने में पहुंचा रहा 'गाथा' : प्रो. अभय करंदीकर


भारतीय साहित्य को देश के कोने कोने में पहुंचा रहा 'गाथा' : प्रो. अभय करंदीकर


- आईआईटी कानपुर ने धूमधाम के बीच की चौथे गाथा महोत्सव की मेजबानी

कानपुर, 24 जुलाई (हि.स.)। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) हिन्दी को बढ़ावा देने के साथ ही भारतीय साहित्य के प्रचार-प्रसार पर काम कर रहा है। इसको लेकर प्रसिद्ध आडियो प्लेटफार्म 'गाथा' को संचालित किया जा रहा है। इसके जरिये भारतीय साहित्य को देश के कोने-कोने में पहुंचाने का प्रयास है। यह बातें रविवार देर शाम आईआईटी कानपुर के निदेशक प्रो. अभय करंदीकर ने कही, जिसकी जानकारी सोमवार को जनसंपर्क विभाग के जरिये दी गई।

आईआईटी कानपुर के आउटरीच सभागार में रविवार को प्रसिद्ध ऑडियो प्लेटफार्म गाथा जो आईआईटी कानपुर के राजभाषा प्रकोष्ठ और शिवानी केंद्र के साथ कार्यरत है, उसके चार वर्ष पूरे होने पर गाथा महोत्सव के चतुर्थ संस्करण का आयोजन किया गया। आईआईटी कानपुर के निदेशक प्रोफेसर अभय करंदीकर ने कहा कि गाथा पूरे भारतीय साहित्य को देश के कोने-कोने में पहुंचाने में अभूतपूर्व कार्य कर रहा है। गाथा और आईआईटी का साथ बहुत लंबे समय तक रहने वाला है।

कार्यक्रम में प्रथम सत्र में उत्कर्ष अकादमी के निदेशक डॉ प्रदीप दीक्षित ने सोशल मीडिया के युग में बौद्धिक और सामाजिक चुनौतियां विषय पर चर्चा करते हुए कहा कि हमें सोशल मीडिया को लेकर अपनी प्राथमिकताएं स्वयं तय करनी होंगी। अन्यथा वह दिन दूर नहीं है जब सोशल मीडिया हमारे असली अस्तित्व को खा जाएगा।

प्रसिद्ध अभिनेता अखिलेंद्र मिश्रा ने अपनी चर्चा के दौरान कहा कि भारत कहानियों का देश है। कहानियां बिखरी पड़ी हैं बस निर्माताओं को थोड़ा शोध और मिट्टी से जुड़ने की जरूरत है। सिनेमा में मानवीय मूल्यों को यदि जोड़ा जाएगा तो सिनेमा का स्तर निश्चय ही बहुत ऊपर जाएगा।

तीसरे सत्र में प्रसिद्ध साहित्यकार अनामिका, कानपुर की कवयित्री एवं अध्यापिका कमल मुसद्दी जी और साहित्यकार लता कादम्बरी ने चर्चा करते हुए वर्तमान भारतीय परिपेक्ष्य में महिला सशक्तिकरण पर चर्चा की। कहा, सशक्तिकरण जब तक पंक्ति में खड़ी हर आखिरी महिला तक नहीं पहुंचता तब तक इस तरह की चर्चाएं बेकार हैं। वहीं जमील गुलरेज की अगुवाई में मुंबई से आई कथा कथन की टीम ने मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी ‘कफन’ का सजीव नाट्य रूपांतरण करके सभी को तालियां बजाने पर मजबूर कर दिया।

प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम ने कहा कि संस्कृत में प्रगति की अनेकों संभावनाएं हैं बस तलाशने की देर है। प्रख्यात लेखक नवीन चौधरी ने कहा कि संस्कृति की जड़ें पकड़े बिना प्रगति की बात करना बेमानी है। हिंदी अकादमी दिल्ली के उप निर्देश ऋषि कुमार शर्मा ने कहा कि नवाचार ऐसा हो की संस्कृति का मूल बना रहे।

इस अवसर पर विश्वनाथ विश्व, डॉ अल्पना सुहासिनी, प्रो. ब्रज भूषण, प्रोफेसर कांतेश बलानी, प्रो. अर्क वर्मा, प्रो. राकेश शुक्ला, श्रवण शुक्ला, विनोद श्रीवास्तव, राधा शाक्य समेत सैकड़ों की संख्या में लोग उपस्थित रहें।

हिन्दुस्थान समाचार/अजय/राजेश