हिमाचल प्रदेश के लिए टिकाऊ अर्थव्यवस्था के आधार
कुलभूषण उपमन्यु हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था सेब, जल विद्युत्, सीमेंट और पर्यटन के इर्द-गिर्द घूमत
कुलभूषण उपमन्यु


कुलभूषण उपमन्यु

हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था सेब, जल विद्युत्, सीमेंट और पर्यटन के इर्द-गिर्द घूमती है। इनमें से सीमेंट कोई टिकाऊ उद्योग नहीं है। कुछ वर्षों में सीमेंट के भंडार समाप्त हो ही जाएंगे। पर्यटन के लिए हमें उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है। प्रदेश के प्रमुख पर्यटन स्थलों पर काफी भीड़ होने लगी है? पर्यटन व्यवसाय में दिखने योग्य बढ़ोतरी के लिए नए स्थल खोजकर विकसित करने की जरूरत है। जल विद्युत् में भी बहुत ज्यादा विस्तार की गुंजाइश नहीं है। जो भी बढ़ोतरी इसमें होगी वह भारी पर्यावरणीय क्षति के बाद ही संभव है। सीमेंट उद्योग की स्थिति भी यही है। ऐसे में बढ़ती आबादी और उसके साथ बेरोजगारी से पार पाने के लिए कोई वैकल्पिक क्षेत्र आर्थिक संबल के लिए ढूंढना बहुत जरूरी है, विशेषकर ऐसा विकल्प जो पर्यावरण को बचाकर जलवायु परिवर्तन से निपटने में भी मददगार हो और टिकाऊ भी हो। जिससे आम बेरोजगार को आजीविका के अवसर मिलें और सरकार के खजाने में भी बेहतर आय के अवसर उपलब्ध हों। ऐसा इसलिए भी जरूरी हो जाता है क्योंकि हिमाचल प्रदेश इस समय तक 60 हजार करोड़ रुपये के कर्ज के नीचे आ चुका है और यह कर्ज प्रति वर्ष बढ़ता ही जा रहा है। इसकी वजह यह है कि सरकार चलाने का खर्च बहुत बढ़ गया है। इसको कम करना संभव ही नहीं है। विकास की अपनी मांग हैं जिन्हें कोई भी सरकार दरकिनार नहीं कर सकती। इसलिए नया आर्थिक आयाम भरोसेमंद और टिकाऊ होना चाहिए।

कृषि तो पहाड़ी क्षेत्रों में मुश्किल से रोटी का जुगाड़ करने योग्य संबल ही दे पाती है। बागवानी में भी अब ज्यादा विस्तार की गुंजाइश कम ही दिखाई देती है। इसलिए किसान खेती के साथ सहायक व्यवसाय की तलाश में खप रहा है, क्योंकि खेती से वर्तमान समय की बुनियादी जरूरतें पूरी कर पाना कठिन है। खासकर जब 80 प्रतिशत जोतें एक हेक्टेयर से कम हैं। उनमें से भी 60 प्रतिशत के लगभग एक एकड़ से भी कम हैं। औद्योगिकीकरण का भी जो मॉडल हमने अपनाया है उसकी भी सीमायें आ गई हैं। जो भी उद्योग बाहर से लाए जाने वाले कच्चे माल पर निर्भर होगा वह यहां मुख्यधारा के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकता, क्योंकि तैयार माल को भी बेचने के लिए बाहर ही जाना पड़ता है। दोहरे किराये की मार से प्रतिस्पर्धी मूल्य दे पाना संभव नहीं होता है। इसीलिए उद्योग विशेष पैकेज के इंतजार में रहते हैं और उससे बेहतर सुविधा कहीं मिल जाए तो अपना बोरिया बिस्तर लपेट कर उस तरफ कूच करते भी देर नहीं करते हैं। इसलिए ऐसा औद्योगिकीकरण का मॉडल बनाना और बढ़ाया जाना चाहिए जो दीर्घकाल तक भरोसेमंद हो। उसके लिए हमें कच्चे माल के उत्पादन और सर्वेक्षण से शुरू करना होगा।

हमारे पास 67 फीसद वन भूमि है। इसकी हरियाली को बचाकर रखना अब देश की जलवायु नियंत्रण और अन्य पर्यावरणीय सेवाएं प्राप्त करने के लिए जरूरी हो गया है। इससे अभी क्षेत्रफल के अनुपात में आर्थिक लाभ नहीं मिल रहा है। इसका प्रबंध कैसे किया जाए कि बिना वृक्ष काटे स्थानीय समुदायों और सरकार को आर्थिक आधार भी मिल सके। प्रदेश के वनों में कई प्रकार की जड़ी-बूटियां उपलब्ध हैं। उनमें और कितनी बढ़ोतरी की जा सकती है। इस बात का आकलन किया जाना चाहिए। सुगंधित उत्पादों, जड़ी-बूटियों और अन्य पुष्प आधारित फसलों को जंगल में कैसे पैदा किया जा सकता है। इस ओर ध्यान देना होगा। दवा और सौंदर्य प्रसाधन उद्योग में इनकी मांग बढ़ती ही जा रही है। इनके उत्पादन को बढ़ाने के साथ इनके प्रसंस्करण उद्योग को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। स्थानीय समुदाय उत्पादन के काम से जोड़े जाएं तो उनको अच्छी खासी आय का आधार बन जाएगा। उद्योग से कुछ रोजगार भी खड़ा होगा। अभी जितनी भी चरागाहें लाइलाज खरपतवारों लेंटाना, यूपिटोरिय्म, कॉंग्रेस घास आदि से नष्ट हो चुकी हैं उनको समुचित रूप से उत्पादक बनाया जाना चाहिए। आप सोच सकते हैं कि जिस प्रदेश का लगभग 20 प्रतिशत क्षेत्र अनुत्पादक पड़ा हो उसका विकास कैसे संभव हो सकता है, जबकि उसको उपजाऊ बनाने के सभी प्राकृतिक तत्व मौजूद हों। यह तो निरी लापरवाही या दूरदृष्टि की कमी ही ठहरेगी। इन क्षेत्रों और बिरले पड़ चुके वन क्षेत्रों को पशुपालन के लिए विकसित किया जाना चाहिए।

हालांकि हिमाचल प्रदेश में प्रति व्यक्ति 450 ग्राम दूध उपलब्ध है जो अपनी मांग के लिए पर्याप्त है। किन्तु यहां हर वर्ष दो करोड़ के लगभग पर्यटक आते हैं, उनके लिए हमारे पास दूध उत्पादन को दोगुना-तिगुना करने कीसंभावना है। आज हर घर में पशु पालन की पुरानी परंपरा कमजोर होती जा रही है। किन्तु इसका विकल्प है छोटी डेयरियां खोलने के लिए बेरोजगार युवाओं को प्रोत्साहित करना। चार से दस पशु की डेयरी बेहतर स्थानीय रोजगार हो सकता है। इसमें प्रतिदिन 40 किलोग्राम से एक क्विंटल तक दूध पैदा हो सकता है। यानी प्रतिदिन 16 सौ रुपये से 4 हजार रुपये का दूध का उत्पादन हो सकता है। इस उत्पादन का खर्च निकाल कर इज्जत से आजीविका चलाई जा सकती है। इन डेयरी किसानों के लिए चरागाह भूमि का विकास करके पशुओं के लिए सस्ता चारा पैदा किया जाना चाहिए। सरकार ही करे यह जरूरी नहीं है। किसान खुद भी कर सकते हैं। बशर्ते इसके लिए उपयुक्त कानूनी व्यवस्था और प्रोत्साहन प्रदान किए जाएं। इस समय पंजाब से आयातित तूड़ी का भाव 13-14 रुपये किलोग्राम पहुंच गया है। पशुपालन व्यवस्थित होने से लावारिस पशुओं की समस्या से भी कुछ हद तक निजात मिलना आसान होगा।

इस दिशा में बांस उत्पादन भी एक बेहतर विकल्प हो सकता है। बांस खरपतवार वाली भूमि में भी सफलता पूर्वक लगाया जा सकता है। यह खरपतवार को दबा लेगा और पशुओं के लिए चारा भी उपलब्ध करवाएगा। हां हमें एकल रोपण नहीं करना चाहिए। मिश्रित वनों में पर्याप्त मात्रा में यदि बांस लगाया जाए और वन अधिकार कानून का लाभ लेकर वन प्रबंधन समिति बना कर बांस और मिश्रित वन लगाने का कार्य हो तो बड़े पैमाने पर बांस आधारित उद्योगों को प्रदेश में बढ़ावा दिया जा सकता है। इसमें कागज उद्योग तो है ही किन्तु अब बांस से एथनोल बना कर पेट्रोल का विकल्प ईंधन के रूप में बनाया जा सकता है। बांस में गन्ने से ज्यादा एथनोल बन सकता है और इसे सिंचाई की भी कोई जरूरत नहीं होगी। यदि एथनोल निर्माण उद्योग को बांस रोपण के साथ जोड़ कर योजना बने और वे किसानों का सहयोग करें तो सस्ते में ही यह योजना चल निकलेगी। राष्ट्रीय बांस मिशन की तरह पर्वतीय क्षेत्रों के लिए उपयुक्त योजना वन क्षेत्रों के लिए भी शुरू की जानी चाहिए। इस तरह के टिकाऊ अर्थव्यवस्था के आधार खोजे जाने चाहिए और दीर्घकालीन योजना पर कार्य करना चाहिए। वरना यह सवाल हर बार पूछा जाएगा कि कब तक कर्ज पर सरकारें चलेंगी और लोगों की सम्मानजनक आजीविका की जरूरतें भी कैसे पूरी होंगी।

(लेखक, जल-जंगल-जमीन के मुद्दों के विश्लेषक और पर्यावरणविद् हैं।)

हिन्दुस्थान समाचार/मुकुंद

 

 rajesh pande