जलीकट्टू सांड़ों के साथ क्रूरता नहीं, तमिलनाडु की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है: तमिलनाडु सरकार
तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान बेंच के समक्ष रखी अपनी दलील नई दिल्ली, 24 नव
जलीकट्टू सांड़ों के साथ क्रूरता नहीं, तमिलनाडु की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है: तमिलनाडु सरकार


तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान बेंच के समक्ष रखी अपनी दलील

नई दिल्ली, 24 नवंबर (हि.स.)। तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान बेंच के समक्ष जलीकट्टू का बचाव करते हुए कहा कि जलीकट्टू तमिलनाडु की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। ये सांड़ों के साथ कोई क्रूरता नहीं है। तमिलनाडु सरकार ने जस्टिस केएम जोसेफ की अध्यक्षता वाली संविधान बेंच के समक्ष ये दलीलें रखी।

तमिलनाडु सरकार ने कहा कि जलीकट्टू केवल मनोरंजक का जरिया नहीं है बल्कि ये तमिलनाडु के लिए ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व का मामला है। जलीकट्टू पोंगल त्यौहार के समय आयोजित किया जाता है और ये अच्छी फसल के लिए भगवान को धन्यवाद देने के लिए आयोजित किया जाता है। इसके आयोजन में किसी जानवर को तकलीफ नहीं पहुंचाया जाता है और कोई दुर्घटना भी नहीं होती है। तमिलनाडु सरकार ने कहा कि 2017 में एक अध्यादेश के जरिये प्रिवेंशन ऑफ क्रूएल्टी टू एनिमल्स एक्ट, 1960 में संशोधन किया गया। इस पर राष्ट्रपति ने मुहर लगाई थी।

30 सितंबर को संविधान बेंच ने कहा था कि वो इस मसले पर सुनवाई करेगी कि क्या तमिलनाडु के जलीकट्टू और कर्नाटक में कंबाला जैसे पशुओं के खेल को सांस्कृतिक अधिकार माना जा सकता है। संविधान बेंच में जस्टिस केएम जोसेफ के अलावा जस्टिस अजय रस्तोगी, जस्टिस अनिरुद्ध बोस, जस्टिस ह्रषिकेश राय और जस्टिस सीटी रविकुमार शामिल हैं। बता दें कि इस मसले को सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच ने 02 फरवरी 2018 को संविधान बेंच को रेफर कर दिया था। तमिलनाडु सरकार ने जलीकट्टू को जबकि कर्नाटक सरकार ने कंबाला को वैध करार देते हुए इसे सांस्कृतिक अधिकार के तहत सुरक्षित माना है।

सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच ने कहा था कि हम इसे संविधान बेंच को तीन सवालों के साथ रेफर किया था। पहला कि क्या राज्य लोगों के सांस्कृतिक अधिकार का हवाला दे सकता है। दूसरा कि क्या संसद के बनाए पशु क्रूरता निरोधी कानून में बदलाव का विधानसभा को अधिकार है और तीसरा सवाल कि क्या ये बदलाव केंद्रीय कानून का उल्लंघन करता है।

पेटा ने इस कानून को चुनौती देते हुए इसे पशु क्रूरता अधिनियम का उल्लंघन माना है। पेटा का कहना है कि जलीकट्टू एक क्रूर परंपरा है और कानून के खिलाफ है जिसे सुप्रीम कोर्ट ने बैन कर रखा है। याचिका में कहा गया है कि 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि जलीकट्टू में जानवरों पर अत्याचार होता है और राज्य में जलीकट्टू को इजाजत नहीं दी जा सकती। ऐसे में तमिलनाडु राज्य प्रिवेंशन ऑफ क्रूएल्टी अगेंस्ट एनिमल जैसे केंद्रीय कानून में संशोधन नहीं कर सकता। याचिका में नए एक्ट पर रोक लगाने की मांग की गई है।

हिन्दुस्थान समाचार/संजय


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