इसरो का बाहुबली 'एलवीएम3-एम2'
योगेश कुमार गोयल भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने 22-23 अक्टूबर की रात अपने पहले वाणिज्यिक
योगेश कुमार गोयल


योगेश कुमार गोयल

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने 22-23 अक्टूबर की रात अपने पहले वाणिज्यिक मिशन के तहत अपने सबसे भारी रॉकेट ‘एलवीएम3-एम2’ के जरिये ब्रिटेन की कम्पनी ‘वनवेब लिमिटेड’ के लिए 36 ब्रॉडबैंड संचार उपग्रहों को सफलतापूर्वक निर्धारित कक्षाओं में स्थापित करके सफलता का नया इतिहास रच डाला। श्रीहरिकोटा अंतरिक्ष यान से रॉकेट के प्रक्षेपण के करीब 75 मिनट बाद सभी 36 उपग्रह कक्षाओं में स्थापित हो गए, जो भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए एक ऐतिहासिक घटना है। एक साथ 36 संचार उपग्रहों को अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित कोई आसान कार्य नहीं था लेकिन भारत के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने ऐसी बड़ी चुनौतियों को सफलतापूर्वक अंजाम देते हुए भारत के प्रति भरोसा दुनियाभर में कई गुना बढ़ा दिया है। वनवेब का यह अब तक का 14वां प्रक्षेपण तथा न्यू स्पेस इंडिया के साथ पहला प्रक्षेपण था।

‘वनवेब लिमिटेड’ इसरो की वाणिज्यिक शाखा एनएसआईएल (न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड) का ब्रिटेन स्थित और अंतरिक्ष के क्षेत्र में काम करने वाला वैश्विक संचार नेटवर्क है, जो सरकारों तथा उद्योगों को इंटरनेट कनेक्टिविटी उपलब्ध कराता है। वनवेब को पहले नेटवर्क एक्सेस एसोसिएट्स के नाम से जाना जाता था, जो भारती एंटरप्राइसेस तथा ब्रिटेन सरकार का संयुक्त उपक्रम है। वनवेब का इसरो के साथ 72 उपग्रह भेजने का एक हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा का अनुबंध है। इस मिशन के लिए वनवेब लिमिटेड ने इसरो की वाणिज्यिक शाखा एनएसआईएल के साथ करार किया था और स्वयं इसरो ने इसे एक ऐतिहासिक मिशन करार दिया। मिशन की सफलता के बाद वनवेब का कहना था कि इसरो और इसकी वाणिज्यिक शाखा एनएसआईएल के साथ उसकी साझेदारी ने 2023 तक भारत में दूर-दूर तक कनेक्टिविटी प्रदान करने की प्रतिबद्धता को प्रदर्शित किया है। ब्रिटेन के संचार नेटवर्क ‘वन वेब’ का लक्ष्य कुल 648 उपग्रह लो-अर्थ ऑर्बिट में भेजने का है, जिनमें से 36 इसरो द्वारा भेज दिए गए हैं। लो-अर्थ ऑर्बिट पृथ्वी की सबसे निचली कक्षा होती है, जिसकी ऊंचाई पृथ्वी के चारों ओर 1600 से 2000 किलोमीटर के बीच है, जिसमें किसी ऑब्जेक्ट की गति 27 हजार किलोमीटर प्रतिघंटा होती है। इसी कारण लो-अर्थ ऑर्बिट में मौजूद उपग्रह तेजी से मूव करता है और इसे टारगेट करना आसान नहीं होता।

इसरो और एनएसआईएल दोनों के लिए ही अब वनवेब मिशन बेहद अहम माना जा रहा था क्योंकि लॉन्च व्हीकल मार्क 3 (जीएसलीवी मार्क 3) के जरिये पहली बार कोई व्यावसायिक लॉन्च किया गया था। इसरो व्यावसायिक लॉन्च के लिए इससे पहले पीएसएलवी का इस्तेमाल करता था लेकिन अब एलवीएम3 के व्यावसायिक बाजार में उतरने के साथ ही यह इसरो और एनएसआईएल के लिए नए प्लेटफार्म खोलेगा। लॉन्च व्हीकल मार्क 3 (एलवीएम3) इसरो का सबसे भारी भरकम 641 टन वजनी रॉकेट है, जो अपने साथ करीब 4 टन वजनी पेलोड जियो सिंक्रोनस ऑर्बिट में और 8 टन वजनी पेलोड लो-अर्थ ऑर्बिट में ले जाने में सक्षम है। एलवीएम3 को इसके भारी भरकम रूप के कारण ही इसरो का बाहुबली भी कहा जाता है, जो तीन स्टेज का रॉकेट है, जिसके पहले चरण ठोस ईंधन होता है, दूसरे चरण में तरल ईंधन और तीसरा क्रायोजेनिक मोड है। अब वनवेब लिमिटेड के लिए 36 ब्रॉडबैंड संचार उपग्रहों के सफल प्रक्षेपण के बाद इसरो ने पूरी दुनिया के समक्ष साबित कर दिया है कि वह अब अपने एलवीएम3 के साथ दुनिया के किसी भी भारी मिशन के लिए भी पूरी तरह तैयार है।

इस बड़ी सफलता के साथ ही इसरो ने 7 अगस्त की अपनी उस विफलता को पीछे छोड़ दिया है, जब इसरो का पहला छोटा उपग्रह प्रक्षेपण यान (एसएसएलवी) टर्मिनल चरण में ‘डेटा लॉस’ का शिकार हो गया था और उससे सम्पर्क टूट गया था। 1969 में बना इसरो अपने कुछ मिशनों की विफलता के बावजूद आज दुनिया की सबसे सफल और भरोसेमंद अंतरिक्ष एजेंसियों में शामिल हो चुका है। इसरो ने 7 अगस्त 2022 तक अपने 84 अंतरिक्ष मिशन लॉन्च किए थे, जिनमें से 67 सफल, 5 आंशिक सफल और केवल 10 ही विफल रहे। अपने इन मिशनों के अलावा इसरो 100 से भी ज्यादा विदेशी अंतरिक्ष मिशन में भी शामिल रहा है। हालांकि अमेरिका के नासा, यूरोपियन स्पेस एजेंसी तथा रूस के रॉसकोमॉस जैसे अंतरिक्ष संगठन भले ही आर्थिक रूप से ज्यादा मजबूत हैं लेकिन अंतरिक्ष मिशनों की लॉन्चिंग की सफलता के मामले में ये इसरो से आगे नहीं हैं।

भारत के अंतरिक्ष संगठन इसरो का मुख्य कार्य एयरोनॉटिकल तकनीक उपलब्ध कराना है, जिसका मुख्य उद्देश्य उपग्रह, लॉन्च व्हीकल, साउंडिंग रॉकेट तथा ग्राउंड सिस्टम तैयार करना है। इसरो ने अपना पहला उपग्रह ‘आर्यभट्ट’ 19 अप्रैल 1975 को सोवियत संघ के सहयोग से छोड़ा था। 7 जून 1979 को 442 किलोग्राम वजनी दूसरा उपग्रह ‘भास्कर’ छोड़ा गया, जिसे पहली बार पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया गया। 22 अक्टूबर, 2008 को इसरो ने चंद्रयान-1 तथा 24 अक्टूबर 2014 को मंगलयान भेजा था और भारत मंगल पर एक ही बार में पहुंचने वाला पहला देश बना था। भारत में निर्मित पहले लॉन्च व्हीकल एसएलवी-3 से रोहिणी उपग्रह छोड़ा गया था और 2014 में जीसैट-14 का जीएसएलवी-डी5 लॉन्च किया गया था, जो स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन था। इसरो अब तक 50 से भी ज्यादा विदेशी उपग्रहों को सफलतापूर्वक लॉन्च कर चुका है और इसरो ने जिस प्रकार अब तक काफी कम खर्च में 300 से भी ज्यादा सफल कमर्शियल लॉन्च किए हैं, उसी का परिणाम है कि दुनिया के कई देश अब अपने बड़े से बड़े लॉन्च के लिए भी हमारी स्पेस एजेंसी इसरो पर भरोसा जताने लगे हैं। बहरहाल, वनवेब के 36 उपग्रहों के अंतरिक्ष में सफल प्रक्षेपण के बाद भारत में अंतरिक्ष क्षेत्र की सेवाओं की उपलब्धता तथा देश में विदेशों से अरबों डॉलर आने की संभावनाओं के दरवाजे खुल गए हैं। अब यदि वनवेब के साथ इसरो के अनुबंध के तहत जनवरी माह तक शेष 36 उपग्रह भी इसरो द्वारा सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में स्थापित कर दिए जाते हैं तो निश्चित रूप से दुनियाभर में भारत की अंतरिक्ष सेवाओं के प्रति आकर्षण और भरोसा और ज्यादा बढ़ जाएगा। इसरो के चेयरमैन एसपी सोनाथ के मुताबिक अगला मिशन केवल वनवेब के लिए ही होगा और उसके बाद इसरो के अगले मिशन चंद्रयान-3 तथा गगनयान अनाम मिशन होंगे। चंद्रयान-3 मिशन भारत का चंद्रमा पर अंतरिक्ष यान भेजे जाने का तीसरा मिशन है, जो अगले साल जून माह में लॉन्च किए जाने की संभावना है।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

हिन्दुस्थान समाचार/मुकुंद