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राष्ट्रीय क्षितिज पर कला की चमक बिखेर रहे हैं संस्कार भारती के तराशे नगीने
कोलकाता, 25 नवंबर (हि.स.)। राष्ट्रवाद के लिए केंद्रित संस्कार भारती कला और कलाकारी को निखारने के लिए
संस्कार भारती


कोलकाता, 25 नवंबर (हि.स.)। राष्ट्रवाद के लिए केंद्रित संस्कार भारती कला और कलाकारी को निखारने के लिए संकल्पित है। संस्कार भारती के तराशे कई नगीने आज वैश्विक पटल पर राष्ट्रवाद की चमक बिखेर रहे हैं।

भारतीय परंपरा-संस्कृति को केंद्रित साहित्य, नाटक, नृत्य, रंगोली, चित्रकला जैसी बहुआयामी कलाकारों को वैश्विक मंच प्रदान करने वाली संस्था "संस्कार भारती" पिछले तीन दशक से देश के कोने-कोने से ऐसे नगीनों को ढूंढ ढूंढ कर सामने ला रही है, जिनकी कला राष्ट्रवाद से ओतप्रोत हैं। हमारी पीढ़ियों के दिल देश के नाम धड़के, हम भारत माता के लिए जिएं और उसी के लिए अपनी सांसें कुर्बान कर दें, हम मनसा वाचा कर्मणा राष्ट्र के प्रति समर्पित हों आदि कई उद्देश्स को लेकर संस्कार भारती कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और कच्छ से लेकर कला की नगरी पश्चिम बंगाल के कोने कोने तक राष्ट्रवाद की खेती कर रहा है।

लखनऊ में 1981 में संस्कार भारती की स्थापना के सात साल बाद 1988 में बंगाल की शाखा शुरू हुई। इसके संस्थापक सदस्यों में से एक सुभाष भट्टाचार्य ने हिन्दुस्थान समाचार से विशेष बातचीत में बताया कि 1987 के बाद से लेकर आज तक बंगाल में संगठन का विस्तार लगातार होता रहा है। पहली शाखा कोलकाता में शुरू की गई थी, उसके बाद आज राज्य के हर जिले में संस्कार भारती की इकाई कार्यरत है। यह संस्था राज्यभर के नवोदित कलाकारों को राष्ट्रीय और वैश्विक मंच प्रदान कराती है। उन्होंने बताया कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति को बढ़ावा देने वाली कविताएं, कलाकारी, चित्रकारी, नाटक, नृत्य आदि को बढ़ावा देना ही संस्कार भारती का मूल मकसद है और इसी के लिए हर एक कलाकार को प्रेरित करना और उसे मंच प्रदान करना हमारा मुख्य काम है।

सुभाष ने बताया कि संस्कार भारती नई पीढ़ी को राष्ट्रवाद केंद्रित कलाकारी करने के लिए प्रेरित करती है।संगठन का सदस्य बनाने के लिए केवल वे लोग चुने जाते हैं, जिन्हें भारतीय सभ्यता और संस्कृति में रुचि है। 1987 के बाद से लेकर 2019 तक ऐसा कोई साल नहीं गया, जब संस्कार भारती ने राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे सांस्कृतिक आयोजन नहीं किए।

राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित होने वाले सामान्य लोग संस्कार भारती की ही देन

सुभाष ने बताया कि पहले मिलने वाले राष्ट्रीय पुरस्कार केवल उन लोगों को दिए जाते थे, जो मशहूर होते थे लेकिन संस्कार भारती की बदौलत यह परंपरा बदली है। आज पद्म पुरस्कार उन लोगों को मिल रहे हैं, जो देश के दूरदराज, ग्रामीण, जंगली, सुदूर क्षेत्रों में बड़े बदलाव के लिए खुद को समर्पित कर जीवन गुजार चुके हैं। उन्होंने समाज और राष्ट्र में बदलाव के लिए अद्वितीय योगदान दिए हैं। ऐसा ही एक नाम कमली सोरेन का है, जिन्हें हाल ही में केंद्र सरकार ने पद्म सम्मान दिया है। उन्होंने दावा किया कि सोरेन के नाम का प्रस्ताव संस्कार भारती ने दिया था। बंगाल के जिन कलाकारों को राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है उनमें से अधिकतर गुमनाम रहकर राष्ट्र निर्माण में खुद को नींव की ईंट की तरह झोंक चुके थे। ऐसे राष्ट्र वीरों को ढूंढना, उनके कार्यों को परखना और उन्हें सम्मान दिलवाने का बीड़ा भी संस्कार भारती ने उठाया है।

सुभाष के अलावा संस्कार भारती की केंद्रीय कमेटी की सचिव और दक्षिण बंगाल की उपाध्यक्ष नीलांजना रॉय ने भी संगठन की अतुलनीय भूमिका के बारे में हिन्दुस्थान समाचार से बातचीत की। उन्होंने बताया कि बखूबी पिछले तीन दशक में बांग्ला फिल्म इंडस्ट्री हो अथवा बांग्ला कविता, कहानियां लिखने वाले और अन्य कलाओं से जुड़े लोगों को मंच देने का काम संस्कार भारती ने किया है। बंगाल में स्वतंत्रता आंदोलन के लिए लोगों को एकजुट करने और उनमें राष्ट्रवाद की भावना भरने के लिए कविताओं और कहानियों का ही सहारा लिया गया था और उनमें से अधिकतर लेखक और कवि गुमनाम ही रह गए। नीलांजना ने बताया कि पश्चिम बंगाल में विपरीत राजनीतिक परिवेश होने के बावजूद बड़े पैमाने पर कलाकार संस्कार भारती की स्थापना के बाद से ही लगातार जुड़ते रहे हैं और विभिन्न कार्यक्रमों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं।

हिन्दुस्थान समाचार / ओम प्रकाश


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