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टीडीपी के सामने झुक गईं थीं 'आयरन लेडी इंदिरा'

By HindusthanSamachar | Publish Date: Nov 2 2018 4:29PM
टीडीपी के सामने झुक गईं थीं 'आयरन लेडी इंदिरा'
अमोदकांत हैदराबाद, 02 नवम्बर (हि.स.)। तेलुगूदेशम पार्टी (टीडीपी) और कांग्रेस के बीच अब पटाने लगी है। दोनों के हाथ मिलाने के बाद चर्चाएं जोरों पर है। इस गठजोड़ ने तेलंगाना के चुनावी पारा को बढ़ा दिया है। पूर्व प्रधानमंत्री और आयरन लेडी के नाम से मशहूर इंदिरा गांधी चर्चा में हैं। इतना ही नहीं, लोग गांधी परिवार और तेलुगूदेशम पार्टी (टीडीपी) के बढ़ी दूरियों की वजहों को याद कर रहे हैं। चौराहों और दुकानों पर कांग्रेस-टीडीपी समझौता पर राजनीति गरम है। लोग इस समझौते को समझने की कोशिश में हैं कि इंदिरा गांधी को झुकाने वाली टीडीपी आखिर झुकी क्यों? यह चर्चा आम है कि कांग्रेस-टीडीपी के बीच एक बार खड़ी हुई दीवार लगातार बढ़ती गयी। कभी किसी ने इस दीवार को छोटा होते देखना पसंद नहीं किया। यहां तक कि टीडीपी कार्यकर्त्ताओं ने भी कांग्रेस को पूरी तरह नकार दिया और एक लंबे समय तक पार्टी ने तेलुगू भाषी इलाके में अपनी मजबूत पकड़ बनाये रखी। जनता में मजबूत पकड़ का ही यह परिणाम था कि पूर्व प्रधानमंत्री और आयरन लेडी के रूप में मशहूर इंदिरा गांधी को भी पार्टी के सामने झुकना पड़ा था। अब इस बात की चर्चा है कि वर्ष 1983 में एनटी रामाराव और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बीच शुरू हुआ यह सिलसिला कांग्रेस-टीडीपी के हाथ मिलाने से थमता दिख रहा है। बावजूद इसके स्थानीय लोगों के मन में संशय भी है। कार्यकर्ताओ के मन मे घर गया विचार भला अब कैसे निकलेगा? इधर, पतली हालात की कांग्रेस अब तेलुगू क्षेत्र के स्वाभिमान का विश्वास जीतने को आतुर है। अनेक उपाय और हथकंडे अपना रही है। शायद, कांग्रेस ने अब टीडीपी से हाथ मिलाने में ही भलाई समझा है। पुरानी बातों को भुलाकर नई शुरुआत करने की ओर बढ़ रही है। बावजूद इसके कितनी सफलता मिलेगी, यह आने वाला वक्त ही बताएगा। हिन्दुस्थान समाचार ने इस बावत लोगों की राय जानने की कोशिश की। हालांकि कोई भी कैमरे के सामने कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया। फिर भी दबी जुबान अपनी बात कह गए। के. राजेश का कहना है कि आयरन लेडी के रूप में मशहूर पूर्व प्रधानमंत्री और कांग्रेस की दिग्गज स्व. इंदिरा गांधी ने आंध्र के स्वाभिमान को ललकारा था। तत्कालीन आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री एनटी रामाराव से उनकी तनातनी हुई थी। यह सिर्फ राजनैतिक नहीं था। रामाराव ने इस तनातनी को बहुत ही चतुराई से तेलुगु स्वाभिमान से जोड़ दिया था। कांग्रेस को आंध्र प्रदेश की राजनीति से विदा होना पड़ा था। एनटी रामाराव ने झुकाया 80 सावन देख चुके बुजुर्ग नेहपाल इस घटना का जिक्र करते हुए बताते हैं कि एनटी रामाराव अपने हृदय का ऑपरेशन करवाने अमेरिका गए थे। इस बीच राजनैतिक उठापटक हुई और गद्दी ही चली गयी। कहते हैं कि केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी कांग्रेस की नेता व तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के इशारे पर राज्यपाल रामलाल ने जनमानस की अपेक्षाओं को पैरों तले कुचल दिया तथा भास्कर राव को मुख्यमंत्री की शपथ दिला दी। तब रामाराव ने मामले को दिल्ली पहुंचाया। संसद और राष्ट्रपति भवन के सामने 183 विधायकों की परेड करवाई और पुनः आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री की शपथ ली थी। अटल की सलाह आई थी काम रामाराव द्वारा उठाये गए इस कदम के बारे में भी चर्चाएं हैं। लोगों का कहना है कि बुजुर्गों से इन बारे में सुनते आ रहे हैं। शायद, भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी की सलाह पर एनटी रामाराव इस मसले को दिल्ली लेकर गए थे। इसके पीछे के कारणों की चर्चा करते हुए ये बताते हैं कि इंदिरा गांधी, इंटरनेशनल छवि को लेकर काफी सतर्क रहती थीं। दिल्ली में रामाराव समर्थक 183 विधायकों की परेड के बाद सितंबर 1984 में रामाराव ने दोबारा मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। इंदिरा गांधी अपनी इंटनेशनल छवि बरकरार रखने को पीछे हट गयीं और तत्कालीन राज्यपाल रामलाल को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी थी। लोकसभा चुनाव में दिखा था असर लोगों का कहना है कि उस समय एनटी रामाराव ने तेलुगू स्वाभिमान शब्द का प्रयोग कर आम जनमानस को खुद की पार्टी से जोड़ने का काम किया था। यही वजह है कि वर्ष 1984 में जनता ने भी रामाराव की बातों को गंभीरता से लेते हुए लोगों ने लोकसभा चुनाव में (तत्कालीन आंध्र प्रदेश) 42 में से 36 सीटें देकर टीडीपी को लोकसभा में मुख्य विपक्षी दल का तमगा दिला दिया था। इस बार भी कांग्रेस को टीडीपी के साथ आए लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ा था। गैर कांग्रेसी दलों के समर्थन से राष्ट्रपति बन पाए नीलम संजीव रेड्डी लोगों में नीलम संजीवारेड्डी के राष्ट्रपति चुनाव में हुई राजनैतिक घटना भी चर्चा का विषय है। इनका मनना है कि कमोबेश यही स्थिति नीलम संजीव रेड्डी के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान रही। वर्ष 1969 के राष्ट्रपति चुनाव में इंदिरा के विरोधी गुट के होने के नाते इन्हें हार का सामना करना पड़ा था। नीलम संजीव रेड्डी को नापसंद करने वाली इंदिरा द्वारा पार्टी सांसदों और विधायकों से अपनी अंतरात्मा की आवाज सुन राष्ट्रपति चुनने की अपील ने कांग्रेस की अंतर्कलह को बाहर कर दिया था। कांग्रेस के उम्मीदवार होने के बाद भी इन्हें हार का सामना करना पड़ा था। लेकिन जब अगले चुनाव में तेलुगू राजनीतिज्ञों के प्रयास से गैर कांग्रेस दलों का समर्थन मिला तो इन्हें जीत मिल सकी थी। कांग्रेस को भी इस समय चुप्पी साधनी पड़ी थी और नीलम संजीव रेड्डी के साथ आना पड़ा था। हिन्दुस्थान समाचार/आमोद/सुनीत
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