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कलबुर्गी आरक्षित लोकसभा क्षेत्र : कांग्रेस के लिए अबकी राह आसान नहीं!

By HindusthanSamachar | Publish Date: Jan 11 2019 8:12PM
कलबुर्गी आरक्षित लोकसभा क्षेत्र : कांग्रेस के लिए अबकी राह आसान नहीं!

नूरुद्दीन

बेंगलुरु, 11 जनवरी (हि.स.)। इस साल होने वाले लोक सभा चुनाव में कलबुर्गी (आरक्षित) सीट से कांग्रेस की राह थोड़ी मुश्किल लग रही है। इसकी प्रमुख वजह यह है कि पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के कद्दावर नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने भाजपा के जिस रेवुनाइक बेलमगी को 74 हजार से अधिक वोटों के अंतर से हराया था, वह अब जनता दल सेक्यूलर में शामिल हो चुके हैं।अगर जनता दल सेक्यूलर भी इस सीट पर अपना उम्मीदवार उतारता है और कांग्रेस खड़गे को टिकट देती है तो खड़गे के लिए राह मुश्किल भरी हो सकती है।

गुलबर्गा से कलबुर्गी बनने वाला यह क्षेत्र हैदराबाद-कर्नाटक क्षेत्र का संभागीय मुख्यालय है। पूर्व में निजाम के राज्य का हिस्सा रहा गुलबर्गा 1971 में अलग हो गया था। यदि एक नवंबर 1956 को कर्नाटक राज्य अस्तित्व में आया तो इसके अलावा हैदराबाद कर्नाटक क्षेत्रों में रहने वाले सभी लोग अपना एकीकरण दिवस 1971 के कैलेंडर को ध्यान में रखते हुए मनाते हैं। जिले में भीमा, बेनिथोरा और अन्य नदियां हैं, नए यादगिरी जिले को विभाजित किया गया है। कलबुर्गी आजादी के बाद अस्तित्व में आने के बाद से बड़े पैमाने पर कांग्रेस का गढ़ बना रहा। 1951 के दौरान पहले आम चुनावों के बाद और 1957, 1962, 1967 और 1971 के चुनावों के बाद हुए चुनावों में हैदराबाद राज्य में केवल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवारों को चुनना पसंद किया गया। यहां एक महत्वपूर्ण और गौर करने वाली बात यह है कि स्वामी रामानंद तीर्थ 1951 के चुनावों में पहली बार लोकसभा सदस्य बने थे। इस क्षेत्र में 1971 में कर्नाटक का हिस्सा बनने के बाद भी स्थिति बेहतर नहीं थी और बड़े पैमाने पर यह केवल कांग्रेस के उम्मीदवार थे, जो इस निर्वाचन क्षेत्र से जीते थे। 1996 में पहली बार क़मर उल इस्लाम जनता दल के टिकट पर विजयी हुए। 1998 के दौरान एक ऐसा ही कारनामा दोहराया गया था, जब बसवराज पाटिल सेडम से भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार के रूप में वहां से जीते थे।

इन दो अपवादों के साथ ही यह पिछड़ा जिला अपनी चिलचिलाती गर्मी के लिए जाना जाता है और तुअर दाल की बंपर फसल यहां की पहचान है। 1980 के दशक में इन निर्वाचन क्षेत्रों ने राष्ट्रीय सुर्खियां बटोरीं, जब सत्तारूढ़ सांसद धर्मसिंह ने केरल कांग्रेस नेता सीएम स्टीफन को यहां से राजनीतिक पुनर्जन्म लेने में सक्षम बनाने के लिए सीट खाली कर दी। वह प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की कैबिनेट में केंद्रीय संचार मंत्री बने और अपने मतदाताओं का आभार जताने के लिए उन्होंने सामुदायिक टीवी सेटों पर दूरदर्शन टीवी चैनल के कार्यक्रमों को चलाने के लिए लो पावर ट्रांसमीटर की स्वीकृति दी। जब पूरे राज्य को यह भी पता नहीं था कि टीवी सेट का मतलब क्या है। उस दौर में इस पिछड़े जिले के लोगों ने अपने घर में टीवी देखने का गौरव प्राप्त किया। अब वही कलबुर्गी लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र एक आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र बन गया है जबकि पड़ोसी बीदर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र सामान्य रूप से आरक्षित वर्ग से अलग हो गया है। कलबुर्गी इन दिनों ख़बरों में अधिक हैं, क्योंकि मल्लिकार्जुन ख़ड़गे के रूप में पिछले दो कार्यकाल के लिए सांसद और लोकसभा में कांग्रेस पार्टी के नेता तीसरी बार भी चुनाव मैदान में होंगे। खड़गे राज्य के सबसे वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं में से एक हैं, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत दिवंगत डी देवराज उर्स के नेतृत्व में की थी, जिन्हें एम. वीरप्पा मोइली के साथ अस्सी के दशक के दौरान राज्य में पिछड़े वर्ग के आंदोलन के चैंपियन के रूप में वर्णित किया गया था।

मल्लिकार्जुन खड़गे को गुरमीटक्कल और चित्तापुर निर्वाचन क्षेत्रों से रिकॉर्ड नौ बार लगातार राज्य विधानसभा के लिए चुने जाने का अनूठा गौरव प्राप्त है। उन्होंने केंद्र और राज्य में कई महत्वपूर्ण विभागों को संभाला है और जिले के एक लोकप्रिय नेता हैं, जो मुख्यमंत्री बनने की स्थिति के करीब पहुंचे नजर आते हैं। कई दलित नेताओं ने आरोप लगाया कि वे मुखर नहीं थे, क्योंकि उनके पास पहले दलित मुख्यमंत्री बनने के पर्याप्त अवसर थे लेकिन 2013 के दौरान ही उन्होंने अपने बेटे को मंत्री बना दिया। राज्य और राष्ट्रीय राजनीति में बने रहने के लिए उनका बड़ा योगदान है। उन्होंने कई शैक्षणिक संस्थानों को शुरू करने के अलावा केंद्रीय विश्वविद्यालय, 500 बिस्तरों वाले ईएसआई अस्पताल और ईएसआई मेडिकल कॉलेज की स्थापना करवाई है। उन्होंने जो बुद्ध विहार स्थापित किया है, उसके लिए पूरे क्षेत्र में पर्यटन स्थल की तलाश है। 2014 के संसदीय चुनावों के दौरान उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के रेवुनाइक बेलमगी को 74,733 मतों के बड़े अंतर से हराया था। पिछले चुनावों में भी उन्होंने उसी उम्मीदवार को हराया था लेकिन अब 2018 के दौरान राज्य विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए पार्टी का टिकट खारिज होने के बाद बेलमगी ने जेडीएस का दामन थाम लिया। इस तरह से उनका कोई जिक्र नहीं है।

भारतीय जनता पार्टी में टिकट के दावेदारों की कोई कमी नहीं है। भाटी पाड़ो योजना के प्रदेश संयोजक सुभाष राठौड़ ने कहा कि वे दो बार जिला परिषद सदस्य और एक बार उपाध्यक्ष रह चुके हैं। हालांकि निर्वाचन क्षेत्र में लिंगायतों, एससी / एसटी और मुस्लिमों का मिश्रित संयोजन है। कांग्रेसियों का दावा है कि अगर यहां की सीट से जेडीएस चुनाव लड़ने से परहेज करती है और खड़गे की उम्मीदवारी का समर्थन करती है तो जीत आसान होगी, क्योंकि दलित और मुस्लिम मतदाता यहां निर्णायक हैं। एक सेवानिवृत्त सरकारी विभाग के मुखिया के अनुसार मल्लिकार्जुन खड़गे एक चतुर नेता हैं, जिनके खिलाफ कोई शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वी नहीं है। उन्हें लोगों की नब्ज समझने में महारत हासिल है। ऐसे में अब सवाल यह है कि भाजपा की तरफ से कौन मैदान में होगा और कौन किसको काटेगा? वास्तव में खड़गे की छवि के समक्ष उनका कोई राजनीतिक प्रतिस्पर्धी नहीं हैं। हिन्दुस्थान समाचार

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