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फूटा ‘भगवा आतंकवाद’ का बुलबुला

By HindusthanSamachar | Publish Date: Apr 16 2018 8:00PM
फूटा ‘भगवा आतंकवाद’ का बुलबुला
नई दिल्ली, 16 अप्रैल (हि.स.)। हैदराबाद की मक्का मस्जिद में बम विस्फोट पर आए फैसले ने कांग्रेस और उसकी सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया है। हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की विशेष अदालत द्वारा दिया गया यह पहला फैसला नहीं है जिसने इस थ्योरी को झूठा करार दिया है। इससे पहले मालेगांव विस्फोट, अजमेर शरीफ दरगाह विस्फोट और समझौता एक्सप्रेस व्लास्ट केस में भी एनआईए की जांच में कोई ठोस सुबूत नहीं मिला है। इन सब मामलों में अब परत दर परत सच सामने आने के बाद विश्व हिन्दू परिषद के निवर्तमान संगठन महामंत्री दिनेश चन्द्र का कहना है कि इस्लामी आतंकवाद की तुलना में हिन्दू आतंकवाद शब्द गढ़कर कांग्रेसी नेतृत्व ने न केवल अक्षम्य अपराध किया है बल्कि राष्ट्रद्रोह भी किया है। हिन्दू आतंकवाद या कहें कि भगवा आतंकवाद से जुड़े जितने भी मामलों की जांच एनआईए ने की, उसमें शुरू से ही संदेह की गुंजाइश बनी रही। उल्लेखनीय यह है एनआईए का गठन मुंबई पर 2008 में हुए हमलों के बाद किया गया था। उस हमले में एटीएस के कुछ अधिकारी भी शहीद हुए थे जो मालेगांव विस्फोट की जांच कर रहे थे और उसमें साध्वी प्रज्ञा और कर्नल प्रसाद पुरोहित के खिलाफ सुबूत होने का दावा कर रहे थे। एटीएस के अधिकारी हेमंत करकरे के आतंकी हमले में शहीद होने के बाद कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह ही वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने मुंबई पर हमले के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार बताने की बजाय हिन्दू संगठनों पर संदेह पैदा करने की कोशिश की थी। एनआईए के गठन के बाद उसे मुंबई हमले की जांच के साथ ही उसे मालेगांव विस्फोट और समझौता एक्सप्रेस बम विस्फोट की जांच सौंपी गई। 18 फरवरी 2007 को हुए समझौता एक्सप्रेस में पकड़े गए पाकिस्तानी आरोपी अजमत अली को छोड़ने और स्वामी असीमानंद का नाम सामने लाकर भगवा आतंकवाद की थ्योरी को पुरजोर ढंग से उठाने का सिलसिला शुरू हुआ। दिनेश चन्द्र कहते हैं कि 2009 के चुनाव से पूर्व सुशील कुमार शिंदे, दिग्विजय सिंह और चिदंबरम ने इस शब्द को फैलाने का काम किया। भारत के इतिहास में मालेगांव पहला मामला होगा जिसमें एक ही मामले में दो एफआईआर दर्ज की गई। एटीएस की पूरी जांच के उलट, जिसमें आरोपियों ने गुनाह कबूल लिए थे और उनके बयानों की कड़ियां भी आपस में जुड़ रही थीं, एनआईए ने नए सिरे से जांच कर कर्नल पुरोहित और साध्वी प्रज्ञा सहित मध्य प्रदेश के कई कार्यकर्ताओं को फंसाया। सवाल यह है कि 2008 से लेकर 2014 तक एनआईए इन मामलों में कोई भी ऐसा साक्ष्य नहीं जुटा सकी जो उसकी कहानी पर विश्वास लायक होता। यही बात स्वामी असीमानंद के मामले में लागू होती है। उन्हें 18 मई 2007 को हैदराबाद की मक्का मस्जिद में जुमे की नवाज के समय बम विस्फोट का आरोपी बनाया गया था। उस आतंकी घटना में 9 लोगों की मौत हो गई थी। एनआईए की विशेष अदालत ने सोमवार को दिए निर्णय में कहा कि स्वामी असीमानंद के खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं है। उधर पटियाला की अदालत में समझौता एक्सप्रेस के मामले में भी एनआईए को कहना पड़ा है कि स्वामी असीमानंद के खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं है। अजमेर की दरगाह शरीफ के बाहर बम विस्फोट के मामले में भी स्वामी असीमानंद बरी किए जा चुके हैं। विहिप का कहना है कि स्वामी असीमानंद को विदेशी ईसाई मिशनरियों के कहने पर फंसाया गया था क्योंकि वे गुजरात के डांग जिले में उसके धर्म परिवर्तन के काम में रुकावट बन रहे थे। स्वामी असीमानंद के प्रयासों से इस क्षेत्र में पहले से बने ईसाइयों की घर वापसी होने लगी थी। कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए सरकार के कार्यकाल में हिन्दू आतंकवाद के नाम पर दर्ज मामलों की जांच में एनआईए के हाथ कुछ भी नहीं लगा। न्यायालयों में एक एक कर मामले खारिज होते जा रहे हैं। 2014 में केन्द्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार बनते ही सवाल उठा था कि क्या मोदी सरकार भगवा आतंकवाद से जुड़े मामलों की समीक्षा करेगी। तब गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने साफ कर दिया था कि सरकार का ऐसा कोई इरादा नहीं है। मामले कोर्ट में हैं और कोर्ट ही तय करेगा। साफ है कि इन मामलों में दखल देकर मोदी सरकार कोई इल्जाम अपने सिर पर नहीं लेना चाहती थी। अब न्यायालय का निर्णय आने के बाद आरोप लगाया जा रहा है कि सरकार के इशारे पर एनआईए ने मामलों की जांच और पैरवी ठीक से नहीं की। विहिप और हिन्दू संगठनों का कहना है कि कांग्रेस अपनी सरकार के रहते ही जांच एजेंसियों का भरपूर दुरूपयोग करने के बाद भी कुछ हासिल नहीं कर पाई। हिन्दू या भगवा आतंकवाद पर पहले भी कोई विश्वास नहीं करता था और अब तो न्यायालयों ने भी इसे खारिज कर दिया है। हिन्दुस्थान समाचार/जितेन्द्र तिवारी/राधा रमण
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