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- उज्जवला योजना ने बदला जीवन : रसोई में नहीं भरता धुआं, आंखों से न बहता पानी

By HindusthanSamachar | Publish Date: Apr 8 2019 4:52PM
- उज्जवला योजना ने बदला जीवन : रसोई में नहीं भरता धुआं, आंखों से न बहता पानी
अंबाला, 8 अप्रैल, (हि.स.)। डेढ़ साल पहले तक हमने कभी नहीं सोचा था कि हमारे घर में गैस चूल्हा होगा। धुएं से रसोई अकसर भरी रहती थी। कई बार तो आधा-आधा घंटा आग जलाने में ही निकल जाता था। मिट्टी का तेल खत्म हो जाने पर गोबर के उपलों में कागज और लिफाफे डालकर आग सुलगाते थे। लेकिन डेढ़ साल पहले मुफ्त में सिलेंडर और गैस चूल्हा मिलने की सूचना हमें लगी। हमने फार्म भर दिए और हमें गैस सिलेंडर के साथ-साथ मुफ्त चूल्हे भी मिल गए। अब तो इनकी आदत सी पड़ गई है। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत प्रशासन और सरकार के दावों की हकीकत जानने के लिए टीम हिन्दुस्थान समाचार गांव बलाना में वाल्मीकि बस्ती में पहुंची तो महिलाओं ने कुछ इसी अंदाज में बात बताई। आज भी बनाती है उपलों से खाना वाल्मीकि बस्ती में घुसते ही एक बुजुर्ग महिला जगीरो देवी का घर है। जागीरो देवी एक टूटे-फुटे बिना प्लस्तर के घर में रह रही है। घर के भीतर आज भी पहले की तरह मिट्टी से निर्मित चूल्हे रखे हुए हैं। 70 वर्षीय जगीरो कुछ देर पहले ही इस पर खाना बनाकर हटी है। इसीलिए वह चूल्हे से राख निकालने का काम कर रही है। पूछताछ में जगीरो ने बताया कि न तो उसके पास गैस सिलेंडर लेने के लिए पैसे हैं न ही उसे यह पता कि मुफ्त में गैस सिलेंडर कहीं मिलते हैं। बेटा मजदूरी करता है। इसीलिए वह आज भी गोबर के उपले और लकड़ी जलाकर रोटियां बनाते हैं। अब खाना बनाने में होती है आसानी जागीरो देवी से घर से चंद कदम दूर इसी बस्ती में महिंद्र कौर रहती हैं। महिंद्र कौर ने बताया कि पिछले साल तक वह गोबर के उपले जलाकर ही रोटियां बनाती थी। लेकिन अब ऐसा नहीं है। प्रधानमंत्री उज्जवला योजना के तहत उन्हें दो मुफ्त गैस सिलेंडर और चूल्हा मिल गया है। इसी गैस चूल्हे पर अब रोटियां बनती हैं। हालांकि आज भी यह परिवार गोबर के उपले जलाता है लेकिन घर से बाहर खाली जगह में वह भी सर्दियों के दिनों में पानी गर्म करने के लिए ताकि गैस की खपत कम हो। परिवार बड़ा होने और आमदन कम होने के कारण सिलेंडर ज्यादा नहीं ले सकते। हमने तो गोबर का चूल्हा नहीं जलाया, करती हैं काम... इसी गांव की रहने वाली मंजीत कौर और उसकी बहन मंदीप बताती हैं कि उन्होंने तो गोबर के उपलों वाला चूल्हा कभी नहीं जलाया। मां रानी अकसर गोबर के उपलों वाला चूल्हा जलाती थी। लेकिन करीब दो साल पहले उन्हें मुफ्त गैस सिलेंडर और चूल्हा मिला था। हालांकि गैस सिलेंडर भराई के 1600 रुपये देने थे लेकिन हमने उसे सब्सिडी में कटवा दिया। हमने सिलेंडर की एक भी सब्सिडी नहीं ली। इसीलिए भरे हुए गैस सिलेंडर और चूल्हा मुफ्त में पड़ गया। मंजीत ने बताया कि गैस होने के कारण ही अब वह कोई न कोई कोर्स कर लेती हैं क्योंकि खाना बनाने की कोई दिक्कत नहीं रही। आसानी से गैस जलाकर फटाफट खाना बन जाता है। मां भी दिहाड़ी-मजदूरी करती हैं और पिता दर्शन भी। अब धुंए से मिली निजात सरोज देवी का कहना है कि पति का निधन हो चुका है। पहले मिट्टी का तले मिलता था। लेकिन वह भी बंद हो चुका है। पिछले साल मुफ्त गैस चूल्हा और एक सिलेंडर मिला था। सिलेंडर भरवाई के ही बस 700 रुपये दिए थे। अब इसी गैस चूल्हे पर रोटी बनती है। गैस चूल्हे के चलते अब घर में धुआं नहीं होता। पहले तो सारे घर में धुआं हो जाता था। यही धुआं दीवारों पर जम जाता था और दीवारें काली नजर आती थी। अब घर साफ सुथरा रहता है। सिलेंडर मिलने से हुई सहूलियत सीमा रानी का कहना है कि गैस चूल्हा और सिलेंडर मुफ्त में मिलने से सारी सहूलियत हो गई हैं। अभी तक चूल्हा ही जलाते आए थे। सारी उम्र चूल्हा ही जलाया था। लेकिन अब तो सर्दी हो या गर्मी। हम सारा काम अब इसी गैस चूल्हे पर करते हैं। इससे सारा काम आसानी से हो जाता है। न तो धुएं के कारण हमारी आंखें खराब होती न ही खांसी होती। अब तो मिट्टी का तेल भी बंद हो चुका है। हिन्दुस्थान समाचार/राजीव/वेदपाल
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