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मराठी थिएटर की रानी सरिता जोशी ने दिए अभिनय के टिप्स

By HindusthanSamachar | Publish Date: Mar 13 2018 2:20PM
मराठी थिएटर की रानी सरिता जोशी ने दिए अभिनय के टिप्स
नई दिल्ली, 13 मार्च (हि.स.)। आठवें थिएटर ओलंपिक के 'लिविंग लेजेंड' के चौथे सत्र की विख्यात थिएटर, टेलीविजन और फिल्म कलाकार सरिता जोशी ने शोभा बढ़ाई। सरिता जोशी सुप्रसिद्ध टीवी सीरियल ‘बा, बहू और बेबी’ में गोदावरी ठक्कर के रोल के लिए काफी लोकप्रिय रही हैं। यह बेहतरीन अदाकारा गुजराती और मराठी थिएटर की रानी मानी जाती हैं और गुजराती थिएटर में अपने बेहतरीन योगदान के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित हो चुकी हैं। लिविंग लेजेंड सत्र में सरिता जोशी ने थिएटर के शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताया कि “मेरे परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी| जब मैं बहुत छोटी थी तभी मेरे पिता गुजर गए। मैं सिर्फ सात साल की थी तभी से थिएटर में काम करने लगी ताकि अपनी मां का सहयोग कर सकूं। मुझे अपने पहले नाटक में गाया हुआ गाना आज भी याद है, क्योंकि मुझे गाना गाना बेहद पसंद था।’ छह साल तक बाल कलाकार के तौर पर काम करने के बाद, 16 साल की उम्र में जोशी ने मुख्य कलाकार के तौर पर काम किया। उन्होंने इंडियन नेशनल थिएटर के साथ एक्टिंग करना शुरू किया और 1980 में टीवी सीरियल ‘तितलियां’ से टेलीविजन की दुनिया में कदम रखा। इस सीरियल की निर्देशक नादिरा बब्बर थी। इसके बाद 90 के दशक में उन्होंने तमाम सीरियल्स में काम किया जिनमें ‘हसरतें’ भी शामिल है। सरिता जोशी कहती हैं, एक कलाकार के तौर पर मैं हमेशा अपनी नीतियों पर चली हूं। मैंने हमेशा कमिटमेंट पूरा किए| मैंने पैसे के लिए किसी भी प्रोडक्शन को नहीं छोड़ा। सत्र के दौरान, मिस जोशी ने एक कलाकार के तौर पर अपने अनुभवों को खुलकर साझा किया और थिएटर में एक्टिंग की चाह रखने वाले युवाओं को गाइड भी किया। उन्होंने कहा, मेरा मानना है कि हर कलाकार के लिए, परम्परागत थिएटर में इस्तेमाल होने वाली ‘स्तुति’ एक बेहतरीन स्पीच ट्रेनिंग है। मैंने थिएटर में अपने उच्चारण और डिक्शन पर बहुत ध्यान दिया, क्योंकि ये दोनों चीजें स्टेज पर बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उन्होंने कलाकार और उसकी कला के मध्य संबंधों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि, हर कलाकार को खुद से प्रेम करना सीखना चाहिए और अपनी कला की देखभाल करनी चाहिए। कलाकारों को बहुत सारे त्याग भी करने पड़ते हैं। उदाहरण के तौर पर, मैं अपनी आवाज ठीक रखने के लिए कभी बर्फ अथवा किसी ठंडी चीज का इस्तेमाल नहीं करती। आजकल थिएटर आसान हो गया है। अब माइक्रोफोन, प्रॉम्प्टर जैसी चीजें आ गई हैं| लेकिन आज भी इसमें एक्सप्रेशन यानि भाव, फुटवर्क यानि पदचाप और हाथों की गतिविधियों पर काफी ध्यान देना होता है। थिएटर की विशिष्टता पर प्रकाश डालते हुए जोशी के कहा कि, 'मैं परम्परागत थिएटर से हूं जो उस दौर में मनोरंजन का प्रमुख साधन हुआ करते थे। लाइव आर्ट हमेशा फिल्म और टेलीविजन से आगे रहा है और थिएटर का प्रभाव आज के दौर में भी कम नहीं हुआ है।' हिन्दुस्थान समाचार/सुभाषिनी/राधा रमण
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