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प्रत्याशी आखिरी चरण में उछलवा रहे स्वयं के नाम

By HindusthanSamachar | Publish Date: Nov 1 2018 8:36PM
प्रत्याशी आखिरी चरण में उछलवा रहे स्वयं के नाम

उज्‍जैन, 01 नवम्बर (हि.स.)। यह विधानसभा चुनाव इस मायने में भी याद किया जाएगा कि चुनाव पूर्व टिकट के दावेदारों द्वारा स्वयं के नाम को नंबर-1 की दौड़ में लाने के लिए क्या-क्या जतन कर सकते हैं। हालात यह हैं कि कुछ टिकट के दावेदार अपनी दावेदारी को प्रथम स्थान पर बताने के चक्कर में लगे हुए हैं, तो कुछ अपने प्रतिस्पर्धी दावेदार की छवि को प्रभावित कर स्वयं को असली दावेदार बता रहे हैं। जिले में ऐसे भी मामले सामने आए हैं कि जिन लोगों को राजनीतिक दल असली दावेदार मान रही है वे अब स्वयं को लेकर सफाई दे रहे हैं कि वे ही असली दावेदार हैं। 

 
सोशल मीडिया ने इस विधानसभा चुनाव को जहां रोचक बना दिया है वहीं दावेदारों की नींद भी उड़ा दी है। दावेदारों का अनौपचारिक चर्चा में कहना है कि वे दिल्ली और भोपाल में अपने नेताओं के समक्ष दावेदारी पेश करने में इतने परेशान नहीं हुए जितना अपने समर्थकों को सुबह से रात तक जवाब दे-देकर थकने से हुए हैं। उनके अनुसार हर 10 मिनट बाद फोन आ जाता है कि फलां दावेदार का नाम तय हो गया है...आप क्या कर रहे हो...कहीं उनका टिकट फायनल न हो जाए। जब ऐसे समर्थकों से वे पूछते हैं कि आपको किसने बताया? जवाब आता है अभी सूची जारी हुई है जिसमें आपका नाम नहीं है। दावेदारों के अनुसार रोजाना दिन में दस बार ऐसी सूचियां सोशल मीडिया पर जारी हो रही हैं। सूचियों में कभी कोई ऊपर हो जाता है तो कभी कोई नीचे। इसके चलते इनकी मुसीबत हो गई है। वे समर्थकों को अपने पाले में रखने हेतु जूझने को मजबूर हैं। वे बताते हैं कि समर्थकों की भीड़ अपनी तो होती है लेकिन टिकट न मिले तो दूसरे खेमे की हो जाती है। ऐसे में क्या करें, क्या न करें? 
रंजिश भी बढ़ा रही है फर्जी सूचियां
 
राजनीतिक दलों के दावेदारों के नजदीकी सूत्र बताते हैं कि फर्जी सूचियों के कारण रंजिश बढऩा शुरू हो गई है। समर्थक जहां अपने-अपने प्रत्याशी के पक्ष में सोशल मीडिया पर लिख रहे हैं वहीं कुछ लोग गलतफहमी पैदा करने के लिए अनर्गल बातें डाल रहे हैं। जिसके खिलाफ छपता है, वह धारणा बना लेता है कि उसके प्रतिस्पर्धी दावेदार ने छपवाया होगा। इसके बाद कथित रूप से बदले का दौर शुरू हो जाता है और जिसकी गलती नहीं है वह भी उस घेरे में आ जाता है। उसके खिलाफ भी अनर्गल पोस्ट आ जाती है। इस सबके कारण कहीं न कहीं दावेदारों के बीच दूरी बढऩे लगी है। जब तक राजनीतिक दल अपनी असली सूची जारी नहीं करेंगे तब तक यह सब चलता रहेगा। 
 
शहर के बुजुर्ग राजनीतिज्ञ बताते हैं कि पहले ऐसा नहीं होता था। टिकट के लिए दावेदारी करने वाले गिने-चुने लोग होते थे। उनका सिद्धांत राजनीति करना होता था न कि प्रभुत्व जमाना। इस कारण पहले दावेदार अपनी लॉबिंग भी करते और साथ में बैठकर चाय पीते, गप्पे लड़ाते। जिसका टिकट फायनल हो जाता, बाकी लोग उसके साथ हो लेते। तब उद्देश्य होता था पार्टी को जिताना। तब न भीतरघात के इतने मामले बनते और न ही रूठकर घर बैठने के। अब हालात बदल गए हैं। दावेदार दावेदारी करते-करते इतने प्रतिस्पर्धी हो गए हैं कि टिकट न मिलने पर वे मानकर चलते हैं कि अपनी हार, तो सबकी हार। ऐसे में पार्टियों को नुकसान उठाना पड़ता है। चूंकि पूर्व की तरह राजनीतिक दलों में संगठन का महत्व समाप्त हो गया है। ऐसे में क्षत्रपों के आगे-पीछे राजनीति घूमने लगी है। यही कारण है कि अब टिकट पार्टी से मांगा जाता है और चक्कर नेताओं के लगाए जाते हैं। गुटबाजी की जड़ भी यही है और भीतरघात की वजह भी यही बातें बनती हैं। ऐसे में जब तक ऊपर से सबकुछ ठीक नहीं होगा, स्थानीय स्तरों पर राजनीति और उसके सिद्धांतों में अंतर बना रहेगा। 
 
हिन्‍दुस्‍थान समाचार/ललित/राजू 
 
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