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आतंकी युवाओं की नई नस्ल: प्रमोद भार्गव

By HindusthanSamachar | Publish Date: Feb 15 2019 1:51PM
आतंकी युवाओं की नई नस्ल: प्रमोद भार्गव
जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में जो आत्मघाती आतंकी हमला सीआरपीएफ की बस पर किया गया है, उसका सरगना जैश-ए-मोहम्मद का युवा आतंकवादी आदिल अहमद डार रहा है। यह आतंकी घाटी के ही ग्राम काकपोरा का रहने वाला है। वह 2018 में आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद में शामिल हुआ था। जैश ने इस आतंकी का फोटो भी जारी किया था। इससे पता चलता है कि यह संगठन घाटी में आतंकी युवाओं की नई फसल उगाने की तैयारी में है। इस संगठन और इस हमले का प्रमुख वह मसूद अजहर है, जिसने भारत को अनेक घाव दिए हैं। स्थानीय आतंकियों से बड़ा आत्मघाती हमला करवाना कश्मीर के तालीबानीकरण की पाक रणनीति का हिस्सा है, जिसे अजहर अंजाम तक पहुंचाने में लगा है। राज्य के रक्षा विशेषज्ञ भी मानते हैं कि पाकिस्तान इस समय कश्मीर के युवाओं को जिहाद के लिए भड़का रहा है। ऐसे में कश्मीर में धार्मिक कट्टरवाद पर अंकुश लगाना जरूरी हो गया है, क्योंकि पाक इसी का फायदा उठा रहा है। दरअसल घाटी में कुछ मस्जिद और मदरसे भी धर्म के बहाने छात्रों को कट्टरता का पाठ पढ़ाने में लगे हैं। इन्हें पाक एवं अन्य इस्लामिक देशों से आर्थिक मदद पहुंचाई जा रही है। इस दृष्टि से कश्मीर में एक लड़ाई वैचारिक स्तर पर भी लड़नी होगी। मौजूदा हालात इसलिए चिंताजनक हैं, क्योंकि यह वह समय है, जब भारत-पाक नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तानी सेना लगातार संघर्ष विराम का उल्लंघन करती हुई प्रत्यक्ष युद्ध के हालात निर्माण करने में लगी है। जाहिर है,भारतीय सेना को एक साथ दो मोर्चे संभालने पड़ रहें है। बीते तीन साल के भीतर कश्मीर में एक गंभीर मसला यह भी देखने में आया है कि वहां पाक से आयातित साप्रंदायिक आतंकवाद की शक्ल स्थानीयता में तब्दील हो रही है। जुलाई 2012 में पत्तन में एक मुठभेड़ के बाद मारे गए आतंकवादियों की शिनाख्त हुई तो ये लाशें स्थानीय लड़कों मोहम्मद इब्राहिम जांवरी और निसार अहमद की निकलीं थीं। ये दोनों बीस साल के थे। इस मुठभेड़ ने तय किया कि वादी में दहशतगर्दी की नई नस्ल तैयार की जा रही है। बुरहान बानी और आदिल अहमद डार इसी नस्ल की नई कड़ियां हैं। हालांकि राज्य पुलिस एवं खुफिया एजेंसियों को ऐसी आशंकाएं पहले से ही थीं। उन्हें ऐसे संकेत व सबूत लगातार मिल रहे थे कि 1989 के बाद जन्मी पीढ़ी जो युवा है,उन्हें आतंकवादी संगठन उग्रवादी बनाने में लगे हैं। यह नस्ल उग्रवाद के गढ़ माने जाने वाले सोपोर,पुलनामा और त्राल में गढ़ी जा रही थी। इसे गढ़ने में लगे थे, हिजबुल मुजाहिदीन जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए तैयबा जैसे भारत विरोधी आतंकवादी संगठन। नब्बे के दशक में कश्मीर के युवाओं ने पूरी तरह दहशतगर्दी को नकार दिया था। हालांकि इक्का-दुक्का युवा आतंकी समूहों को अप्रत्यक्ष सर्मथन देते रहे थे। लेकिन सीधे तौर से उन्होंने गोला-बारूद हाथ में लेकर कोई वारदात नहीं की। लेकिन 2008 और 2010 के बीच कश्मीर में सेना के खिलाफ जन प्रदर्शनों के दौरान पत्थरबाजी शुरू हुई। हालात नियंत्रण की दृष्टि से सेना द्वारा की गई गोलीबारी में कुछ लोंगो की मौत हुई। इस स्थिति का लाभ कश्मीर में सक्रिय आतंकवादी संगठनों ने उठाया और उन्होंने मृतकों की किशोर संतानों को बरगला कर उग्रवाद की राह पर धकेल दिया। पुलवामा आत्मघाती हमले का मास्टरमाइंड जैश-ए-मोहम्मद का प्रमुख मसूद अजहर रहा है। इसी ने दिसंबर 2001 में भारतीय संसद पर हमले की व्यूहरचना की थी। इस समय भारत और पाकिस्तान युद्ध के मुहाने पर पहुंच गए थे। लेकिन अमेरिका और अन्य अंतरराष्ट्रीय दबाबों के चलते तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पीछे हट गए। इसका नतीजा भारत बार-बार आतंकी हमले सहते हुए आज तक भुगत रहा है। 2016 में हुए पठानकोट हमले के पीछे भी मसूद अजहर और उसके भाई इब्राहिम अजहर का हाथ था। 2008 के मुंबई हमले के बाद यह लगभग 6 वर्ष तक भूमिगत रहा है। इसके बाद 26 जनवरी 2014 को पाकिस्तान के मुज्जफराबाद में एक सभा में इसने कश्मीर में जेहाद का एलान किया। इसी अजहर ने तत्कालीन अटल बिहारी सरकार के दौरान 24 दिसंबर 1999 को अपहृत इंडियन एयरलाइंस की उड़ान आईसी-814 को छोड़ने के बदले आतंकी अहमद उमर, सईद शेख और मुश्ताक अहमद जरगर को मुक्त कराया था। इन्हें कंधार ले जाकर छोड़ा गया था। इस दौरान आतंकियों से बातचीत करने वाले तीन सदस्यीय भारतीय दल में वर्तमान राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल भी शामिल थे। भारत की यह उदारता कूटनीति के स्तर पर नाकाम रही। इसी के दुष्परिणामस्वरूप घाटी में आतंकवाद और प्रोत्साहित हुआ। जबकि इस मामले को अमेरिका और यूएई से बात करके अपहरणकर्ताओं पर पर्याप्त दबाव बनाने की जरूरत थी। 1994 में मसूद अजहर को सुरक्षा एजेंसियों ने श्रीनगर में गिरफ्तार भी कर लिया था, किंतु वह भाग निकलने में सफल हो गया। अर्से से भारत इसे संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंधित आतंकियों की सूची में डालने के प्रयास में लगा है, लेकिन चीन इस प्रयास को तकनीक के आधार पर असफल कर देता है। फरवरी 2017 में चीन ने अजहर पर प्रतिबंध लगाने के अमेरिकी प्रयासों पर भी वीटो लगा दिया था। साफ है, हम एक आतंकी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकी घोषित करने में भी नाकाम रहे हैं। यही अजहर इस्लाम के नाम पर अपने आतंकी व आक्रामक भाषणों के जरिए पाकिस्तान तथा भारत के युवाओं को आतंकी बनाने में लगा है। इस घटना के मद्देनजर ऐसा लगा रहा है कि घाटी में 1989-90 के हालात लौट रहे हैं। इसका आशय है कि एक बार फिर घाटी से गैर मुसलिमों का विस्थापन शुरू होगा। इस समस्या को ज्यादातर कश्मीरी लोग हिंदुओं की सुरक्षा से जोड़कर देखते हैं,जबकि यहां संकट में डोगरे, सिख और लद्दाखी बौद्ध भी हैं। कश्मीर को बदहाल बनाने में केंद्र्र सरकार द्वारा की जा रही बेतहाशा आर्थिक मदद भी है। यहां गौर करने की बात है कि जब कश्मीर की धरती पर खेती व अन्य उद्योग धंधे चैपट हैं तब भी वहां की आर्थिक स्थिति मजबूत क्यों है? पूरी तरह केंद्र्र पर अश्रित अर्थव्यस्था होने के बावजूद लोग खुशहल क्यों है?जाहिर है,केंद्र्र सरकार इस राज्य में बेतहाशा धन बहा रही है। इसके बावजूद न यहां अलगाववाद की आग ठंडी हुई,न प्रगति हुई और न शांति का वातावरण बना। 2010 तक यहां 43,350 करोड़ रुपये खर्च किए गए। सीएजी ने जब इसके खर्च की समीक्षा की तो पाया कि 71088 करोड़ रुपये का कोई हिसाब ही नहीं है। तय है कि कश्मीर को दिए जा रहे आर्थिक पैकेज सूबे की सत्ता पर काबिज होने वाले चंद परिवारों के निजी हित साध रहे हैं। मोदी ने भी घाटी में बहुत धन बांटा है। यहां चौंकाने वाला एक तथ्य यह भी है कि यहां प्रति व्यक्ति खर्च 9661 रुपये है,जो राष्ट्रीय औसत से 3,969 रुपये से तीन गुना अधिक है। राज्य सरकार के कर्मचारियों की संख्या 45 लाख है। पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नवी आजाद ने एक बार कहा था कि राज्य सरकार को वास्तव में आधे कर्मचारियों की जरूरत है। सार्वजनिक क्षेत्र के यहां 23 उद्योग हैं, जिनमें से केवल 4 लाभ में हैं। बाकी केंद्र्र के अनुदान पर टिके हैं। यह एक अनूठा ऐसा राज्य है,जो अपने कुल खर्च का महज 25 फीसदी ही करों से कमा पाता है,शेष धन की आपूर्ति केंद्र्रीय मदद से होती है। पाक से निर्यात जाली मुद्रा भी यहां की अर्थव्यस्था को सुदृढ़़ बनाए रखने का एक आधार है,जो कश्मीर के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था को चौपट करने का काम कर रही है। मुसलिमों के लिए तैयार की गई रंगनाथ मिश्र की रिपोर्ट भी इस बात की पुष्टि करती है कि कश्मीर में मुसलिम हिंदू,सिख,डोगरे और बौद्धों की तुलना में न केवल आर्थिक,बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी मजबूत हैं। जाहिर है, केंद्र्र की आर्थिक मदद कश्मीरी मुसलिमों को निठल्ला बनाने का काम कर रही है। इस निठल्लेपन को बरगलाकर पाक आतंकवादी नस्ल में ढालने का काम कर रहे हैं। यदि कश्मीर में अतिरिक्त आर्थिक मदद पर अंकुश लगाया जाता है तो यह स्थिति भी आतंकवाद और बढ़ती हिंसा को नियंत्रित करने का काम करेगी। (हिन्दुस्थान समाचार)
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