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रैलियों की भीड़ वोट में बदलना दलों के लिए बड़ी चुनौती

By HindusthanSamachar | Publish Date: Nov 3 2018 8:37PM
रैलियों की भीड़ वोट में बदलना दलों के लिए बड़ी चुनौती
कोरबा, 03 नवम्बर (हि.स.)। दूसरे चरण में होने वाले चुनाव में शामिल कोरबा जिले की चार सीटों के लिए 20 नवंबर के लिए लोग वोट करेंगे। आयोग द्वारा जारी की गई निर्वाचक नामावली में जिले में कुल 12 लाख 36 हजार 914 मतदाता दर्ज हैं। इन्हें अपने मताधिकार का अवसर प्राप्त होगा। अब तक की स्थिति में नामांकन दाखिल किए जा चुके हैं। उधर राजनीतिक गर्मी लगातार बढ़ती जा रही है। राजनीतिक पार्टियां भले ही आए दिन हो रही रैलियों से खुश हैं, लेकिन उनकी परेशानी यह भी है कि यह भीड़ आखिर किस पाले का हिस्सा बनेंगी। चुनाव मैदान में कितने प्रत्याशी रहेंगे, इसकी वास्तविक तस्वीर नाम वापसी के बाद दिखाई देगी। जिले में विधानसभा क्षेत्र कोरबा, कटघोरा, रामपुर और तानाखार से अंतिम स्थिति तक विभिन्न राजनैतिक दलों और स्वतंत्र उम्मीदवार सहित कुल 84 ने नामजदगी के पर्चे भरे। इस प्रक्रिया में कई तरह के दांव पेंच देखने को मिले। वैसे भी चुनाव को लेकर सर्व स्वीकृत धारणा यही है कि इसमें साम, दाम, दंड, भेद सब जायज होते हैं। यानी चुनाव लड़ने और जीतने की मानसिकता के साथ उतरने वाले किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। हालांकि पिछले कुछ वर्षों से चुनाव में किए जाने वाले खर्च और प्रचार के तौर तरीकों को लेकर भारत निर्वाचन आयोग ने सख्त रुख अपनाया है। इसकी बानगी कुछ हद तक यहां नजर आ रही है। मतदान के लिए अब 18 दिन का समय शेष रह गया है। इसके बीच में दीपावली का त्योहार अहम है। मतदाताओं को साधने के लिए प्रत्याशियों और उनके कार्यकर्ताओं की ओर से सभी क्षेत्रों में आवश्यक जतन किए जा रहे हैं। किस इलाके में कौन सा तरीका इस कड़ी में कारगर साबित हो सकता है, पार्टियों का ध्यान इस पर टिका है। अन्य राज्यों में अपनाएं गए चुनावी फार्मूलों और टोटकों से मिली सफलता को यहां भी दोहराए जाने से पार्टियां कतई पीछे नहीं है। जिले में कांग्रेस ने दो मौजूदा विधायकों को टिकट दी है, वहीं भाजपा ने अपने एक संसदीय सचिव सहित कांग्रेस से आए विधायक को प्रत्याशी बनाया है। मुकाबले को लेकर बन रहे समीकरण को लेकर कहा जा सकता है कि कोरबा,कटघोरा और रामपुर में मुकाबला आसान नहीं है। जबकि पाली तानाखार में मौजूदा विधायक की स्थिति बेहतर आंकी जा रही है। यहां मुख्य मुकाबले में भाजपा और गोंगपा हैं। जबकि कांग्रेस और अन्य दलों को ज्यादा तवज्जों नहीं दी जा रही है। पार्टियों की रणनीति है कि सीमित समय में अधिक स्थान और लोगों तक पहुंचने की कोशिश की जाए। इस तरह के प्रयासों के जरिए जन समर्थन और रैलियों में उमडऩे वाली भीड़ को वोट बैंक में परिवर्तित कैसे किया जाए, यह दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। हिन्दुस्थान समाचार/हरीश/चंद्र नारायण/बच्चन
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