Hindusthan Samachar
Banner 2 शुक्रवार, मार्च 22, 2019 | समय 19:27 Hrs(IST) Sonali Sonali Sonali Singh Bisht

(लेख) इंसानों के सुखी जीवन के लिए पशु- सुरक्षा की मुहिम : डॉ. आर. बी. चौधरी

By HindusthanSamachar | Publish Date: Dec 4 2018 6:47PM
(लेख) इंसानों के सुखी जीवन के  लिए पशु- सुरक्षा की मुहिम : डॉ. आर. बी. चौधरी
भारतीय जीव जंतु कल्याण बोर्ड की सचिव डॉक्टर नीलम बाला के अनुसार पृथ्वी पर हरित कवच की कमी एवं ग्रीन हाउस गैस में होने वाले बढ़ोतरी से उत्पन्न समस्या- ''जलवायु परिवर्तन'' का संबंध सिर्फ खाद्यान्न उत्पादन, लोगों के रहन- सहन, खान-पान आदि रोजमर्रा की जरूरतों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका भारी असर पशु- पक्षियों और धरती के सभी जीव - जंतुओं पर पड़ा है। लोगों की जरूरतें और भोजन की आदतों में निरंतर परिवर्तन हो रहा है। खाद्यान्न उत्पादन और उसकी उपलब्धता की होड़ ने तो इंसान को अंधाधुंध दौड़ जीतने पर मजबूर कर दिया है। इससे मनुष्य एवं उसका पशुओं से संबंध अब संघर्ष में बदल गया है। डॉक्टर नीलम बाला के कथन के आलोक में हम देखते हैं कि पशुओं पर अत्याचार बढ़ता जा रहा है। नतीजन पशु जन्य खाद्य पदार्थों की उपलब्धता और उसकी गुणवत्ता भी गिरती जा रही है। इसका सीधा असर हमारे रहन-सहन , खान-पान एवं स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। इस विषय पर इसी आठ दिसंबर को दिल्ली में एक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी होने जा रही है। इस संगोष्ठी का मुख्य विषय पशुओं के साथ हो रहा व्यवहार, उनका रखखाव, उनसे संबंधित अनुसंधान और शिक्षण –प्रशिक्षण ही है। संगोष्ठी केो मूल में पशुओं के प्रति जनजागृति की भारतीय दशा एवं दिशा समाहित है। विश्व पटल पर जलवायु परवर्तन से जूझने के लिए “वन हेल्थ कांसेप्ट” अर्थात “एक स्वास्थ्य सिद्धांत” (सभी का साथ-सभी का स्वास्थ्य ) को प्रचारित करने का अभियान चलाया जा रहा है। ताजे अनुसंधान से यह सिद्ध हो चुका है कि जब पशु तनावग्रस्त होते हैं, तो मनुष्य की तरह उनके शरीर के अंदर कई प्रकार के हानिकारक हार्मोन्स पैदा होते हैं। इनमें एड्रेनालाईन और कोर्टिसोल श्वास तथा ह्रदय की गति बढ़ता है एवं थकान पैदा कर शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को घटा देता है। इससे पशु के शरीर प्रक्रिया पर प्रतिकूल असर पड़ता है। ऐसे में जब हम पशु जन्य खाद्य सामग्रियों का इस्तेमाल करते हैं तो उसका सीधा असर हमारे स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। नार्वे के एक वैज्ञानिक डाएली गजेरलाग एनगर के अनुसार तनाव से प्रोटीन , विटामिन और खनिज तत्वों की संरचना बदल जाती है। इससे मांस की गुणवत्ता पर असर पड़ता है। आज पशुओं के ऊपर प्रयोग किए जाने वाले हानिकारक रसायनों, हार्मोन्स, वैक्सीन,एंटीबायोटिक्स आदि का खुलकर प्रयोग किया जाता है। खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2011 के अनुसार यह कार्य दंडनीय अपराध भी है। हमारे देश में ऐसे अपराधियों के खिलाफ नियम - कानून की कमी नहीं है। इसके बावजूद, जनजागृति के अभाव में भोजन और स्वास्थ्य से संबंधित अपराध चलते रहते हैं। वर्ष 2014 में ड्रग कंट्रोलर ऑफ इंडिया ने ऑक्सीटॉसिन नामक हार्मोन की खुलेआम बिक्री से रोक लगाने का अध्यादेश जारी किया था।इसके बावजूद, आज भी देश के कई प्रांतों में पशुपालक पशुओं से दूध उतारने में इसका प्रयोग कर रहे हैं।अनेक अनुसंधान में बताया गया है कि इंजेक्शन लगाए पशु का दूध पीने योग्य नहीं होता है। ऐसे पशु के दूध के सभी घटक बदल जातें है। साथ ही साथ लगातार इंजेक्शन लगाने से पशुओं की प्रजनन क्षमता भी चली जाती है। देखा गया है कि उनमें प्रोलेप्स (बच्चेदानी बाहर आने की समस्या) पैदा हो जाती है और पशु मुश्किल से दो या तीन ब्यांत में वधशाला जाने के लिए मजबूर हो जाता है। आज पशु कल्याण का प्रमुख मुद्दा सिर्फ दया -करुणा या ममता तक सीमित नहीं है। सच यह है कि इनकी परिभाषाएं भी बदल गईं हैं। पशुओं के प्रति दया और करुणा का भारतीय दर्शन अब पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन से भी जुड़ गया है। संसार भर में पशु कल्याण अब पशु चिकित्सा विज्ञान का एक महत्वपूर्ण विषय हो चुका है। यूरोपियन देशों में तो इसकी व्यवस्थित पढ़ाई और अनुसंधान कार्य किया जा रहा है ताकि इंसानों की दुनिया सुखी और संपन्न रह सके। इसलिए पूरी दुनिया में खासकर विकसित देशों में वन हेल्थ कांसेप्ट अर्थात एक स्वास्थ्य सिद्धांत (पशु स्वास्थ्य - पर्यावरण स्वास्थ्य और मानव स्वास्थ्य) पर कार्यक्रम चलाये जा रहें हैं। दरअसल, विश्व स्वास्थ्य संगठन ,विश्व कृषि खाद्य संगठन एवं विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन ने मिलकर इस अभियान को आरंभ किया है ताकि प्रकृति का संचालन यथावत चलता रहे। सवाल है कि जलवायु परिवर्तन में पशु कल्याण की क्या भूमिका है ? बात साफ़ है कि प्रकृति की खाद्य श्रृंखला (फूड चेन) विखंडित हो रही है, यानी संचालन तंत्र विखर रहा है। विगत वर्षों में उत्पादन स्रोत और उत्पाद अत्यंत प्रभावित हुए हैं। फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया अर्थात भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण के अनुसार बाजार में बिकने वाले दूध और दूध से बने पदार्थ तकरीबन 68.7 प्रतिशत मिलावटी हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की हाल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर मैं कैंसर से मरने वाले 98 लाख लोगों में से 8.17 प्रतिशत भारतीय हैं। पश्चिमी देशों की भांति आज भारत फैक्ट्री फार्मिंग की तरफ तेजी से बढ़ रहा है। पशु कल्याण के सुनिश्चित मानकों के अनुसार तनाव रहित- खुले वातावरण वाली तकनीक से पशुओं का पालन -पोषण होना चाहिए। इस तरह उनका उत्पादन प्राकृतिक तौर-तरीके से हो . किंतु ऐसा न हो पाने की वजह से भारत में भी पशुओं से मिलने वाले उत्पाद अपनी गुणवत्ता से दूर होते जा रहें है। हमारे देश में इसका सबसे बड़ा शिकार देशी गोवंशीय पशु हैं जिसकी संख्या तेजी से घटती रही है। बहुत कम लोगों को पता होगा कि एक किलो मांस पैदा करने के लिए 5 किलो अनाज की खपत हुआ करती है। इतने मांस उत्पादन के लिए 18,9027 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। देसी पशुओं को पालने और मांस उत्पादन करने में खेती के मुकाबले सिर्फ 30 फीसद स्वच्छ जल की जरूरत पड़ती है। अगर यही हालात बनी रही तो यूनाइटेड नेशन के चेतावनी के अनुसार वर्ष 2025 तक भारत के 34 करोड़ लोग पानी के मोहताज हो जाएंगे। साथ ही साथ वर्ष 2040 तक भारत में पेयजल की समस्या एक विकराल रूप ले लेगी। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार प्रतिवर्ष तकरीबन 30 प्रतिशत ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जित होती है जिसका सीधा असर जलवायु परिवर्तन पर पड़ता है। नतीजतन पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है। इतना ही नहीं, हर साल 5,300 लाख टन उपजाऊ मिट्टी का विनाश हो रहा है। हालत यह है कि मिट्टी के अंदर उर्वरता बनाये रखने वाले जीवांश( कार्बन तत्व या ह्यूम्स) की मात्र 4.5% से घटकर 0.5% हो गयी है। इससे खेती की उपज घटती जा रही है और प्राप्त अनाज में न तो पौष्टिकता है और न ही स्वाद। उपरोक्त सारी समस्याओं की जड़ सिर्फ एक है कि प्रकृति , मनुष्य एवं पशु पक्षियों के बीच में जो पारस्परिक सामंजस्य होना चाहिए , वह आज अलग-थलग पड़ गया है। पशु हमारा मित्र नहीं, एक साधन या मशीन बन गया है। यही तो फैक्ट्री फार्मिंग है, जिसने बड़ी चुनौती खड़ी की है। एक रिपोर्ट के मुताबिक 12 लाख पशु प्रति घंटे मनुष्यों के भोजन के लिए मारे जाते हैं। देश में 180 लाख मुर्ग- मांस की वार्षिक खपत है। वर्ष 2014 में 373 लाख गोवंशीय पशु निराश्रित पाए गए और जिनकी किस्मत में वधशालाओं में जाने के सिवा दूसरा कोई रास्ता नहीं था। कानूनी पकड़ के लिए जिम्मेदार पांच दशक पुराने जीव जंतु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 की वैधानिक कमजोरियां एवं विवशताएं पशुओं के ऊपर होने वाले अत्याचार को कम नहीं कर पा रही हैं। संशोधित पशु कल्याण अधिनियम केंद्र सरकार के पास अरसे से विचाराधीन है। अब ऐसी हालत में भला अंतरराष्ट्रीय पशुओं के पांच सूत्रीय अधिकार ( भूख प्यास से मुक्ति ,असुविधा से राहत, पीड़ा और दर्द से छुटकारा,सामान्य मन: स्थिति में रहने की आजादी, भय एवं तनाव से मुक्ति ) देने की कल्पना कैसे की जा सकती है। विश्व भर के सभी देशों में इन पांच सूत्रीय मापदंडों को पशु कल्याण कार्यों की ऊंचाई नापने के लिए प्रयोग किया जा रहा है। भारत समूचे विश्व में एक अत्यंत गौरवशाली राष्ट्र के रूप में जाना जाता है। खासकर, भारत की संस्कृति, चिंतन- मनन, आदर्श एवं परम्पराएं जिसमें दया और करुणा कूट-कूट कर भरी है। उल्लेखनीय है 300 ईसा पूर्व विश्व का पहला पशु चिकित्सालय की स्थापना सम्राट अशोक ने की थी। उन्होंने पशुओं के उपचार के लिए औषधि, पेड़-पौधों की खेती से लेकर औषधि बनाने के कार्यों को बढ़ावा दिया। इसे गुप्त साम्राज्य के अन्य राजाओं ने भी आगे बढ़ाया। वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधीन कार्यरत भारतीय जीव जंतु कल्याण बोर्ड पिछले पांच दशकों से पशुओं के कल्याण , संरक्षण, संवर्धन एवं उनके अधिकारों के प्रति कार्य कर रहा है। इस बोर्ड का प्रमुख कार्य है पशुओं पर होने वाले अत्याचार को रोकना और कल्याणकारी योजनाओं को देशभर में चलाना। आज स्थिति यह है कि पशु कल्याण का यह लक्ष्य जन सहभागिता अभियान से जुड़ नहीं पा रहा है। देश में पशु क्रूरता की घटनाएं बढ़ रही हैं। मुंबई एसपीसीए ,परेल के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2000 में संस्था ने 2,315 क्रूरता की घटनाओं को पंजीकृत किया था जो वर्ष 2016 में बढ़कर 3,357 हो गया। अध्ययन में यह भी बताया गया कि 2012 में 459 पशु बचाए गए जिनकी संख्या वर्ष 2016 में 1,013 तक पहुंच गयी। इसका मतलब है की सरकार के वर्तमान कार्यक्रमों एवं नीतियों में आवश्यक सुधार की आवश्यकता है। राष्ट्रीय पशु कल्याण संस्थान के संस्थापक सलाहकार डॉक्टर अरुण वर्मा के अनुसार पशु कल्याण की आवश्यकताओं के मुतैाबिक, खासकर फिल्ड में काम करने वाले पशु प्रेमियों के जरूरत के अनुसार नीति निर्धारण करने की आवश्यकता है। दिल्ली में 8 दिसंबर को आयोजित हो रहे अंतरराष्ट्रीय पशु कल्याण संगोष्ठी के संयोजक डॉक्टर बी. पी. सिंह के अनुसार देश में पशु कल्याण पर वैज्ञानिक मानसिकता की आवश्यकता है। लोगों की सोच दया करुणा से ऊपर उठकर मनुष्य, पर्यावरण और पशु- पक्षियों का सहसंवंध प्रकृति से बना रहना चाहिए. इस दिशा में देश के पशु चिकित्सक एवं पशु वैज्ञानिक अहम भूमिका निभा सकते हैं। इस दिशा में शीघ्र ही इंटरनेशनल सोसायटी फॉर अप्लाइड इथालाजी के इंडिया ब्रांच के सहयोग से पशु कल्याण पर शिक्षण कार्यक्रम चालू किया जाएगा। (हिंस) (लेखक वैज्ञानिक अनुसन्धान एवं तकनीकी विकास को समर्पित भारत सरकार की कई पत्रिकाओं के सम्पादक रहे हैं।)
लोकप्रिय खबरें
फोटो और वीडियो गैलरी
image