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अब नहीं दिखती दूध-जलेबी और रबड़ी के बीच चुनावी चकल्लस

By HindusthanSamachar | Publish Date: Apr 6 2019 7:31PM
अब नहीं दिखती दूध-जलेबी और रबड़ी के बीच चुनावी चकल्लस
हरिद्वार, 06 अप्रैल (हि.स.)। चुनाव प्रचार करने का सिलसिला वक्त के साथ बदलता चला गया। एक दौर वो था जब रिक्शा और घोड़े पर बैठकर उम्मीदवार वोट मांगने निकला करते थे। चौपाल और चौराहों के साथ चाय की दुकान चुनावी चर्चा का मुख्य अड्डा हुआ करती थीं। वर्तमान में लक्जरी ऑलीशान कार में बैठकर उम्मीदवार चुनाव क्षेत्र में पहुंचते हैं। जनसभाओं को संबोधित करते हैं। उस दौर में उम्मीदवार की बातों पर जनता यकीन करती थी लेकिन आज के दौर में जनता उम्मीदवार की बातों पर चटकारे लेती है। कनखल में फत्तू हलवाई की दुकान, यहां दूध-जलेबी के साथ रबड़ी का आनन्द लिया जाता था और चुनावी चकल्लस जमकर होती थी। शहर के सभी बड़े लोगों का यहीं मजमा लगा करता था। छतरी वाला कुआं, चौक बाजार स्थित रोशन लाल की चाय की दुकान तथा चारजों की चौपाल और कनखल की घास मंडी में भी चुनावी चर्चा होती थी, जबकि कांग्रेस की रणनीति का अड्डा देश रक्षक औषधालय, हीरावल्लभ त्रिपाठी का मकान तथा जगदीश चौधरी की दुकान हुआ करता था।भाजपा के नेता अशोक त्रिपाठी के आवास, मोहन लाल दिल्ली वालों की दुकान तथा हरिद्वार में राममूर्ति वीर व रामलीला भवन मुख्य चर्चा के केन्द्र हुआ करते थे। कांग्रेस के नेताओं में पारस कुमार जैन तथा जगदीश चौधरी कांग्रेस की राजनीति के मुख्य स्तंभ होते थे तो वहीं अशोक त्रिपाठी और राममूर्ति वीर भाजपा के ऐसे नेता थे, इन्होंने भाजपा के बुरे दौर में भी भाजपा का झंडा हमेशा बुंलद रखा। समय के साथ-साथ राजनीति बदली और राजनीति करने वाले भी बदले। राजनीति तो वहीं रही लेकिन राजनीति के आचरण में गिरावट आती चली गई। राजनीति के उस दौर में नेता पार्टी और जनता के प्रति समर्पित रहते थे लेकिन आज हालत यह है कि निजी स्वार्थों को प्राथमिता दी जाने लगी और पार्टी तथा जनता दूसरे नम्बर पर आ गई। इसकी बानगी टिकट न मिलने पर दल-बदल के रूप में हरिद्वार में कई बार देखने को मिली। इसी के चलते किसी जमाने में जिस परिवार की राजनीति में तूती बोलती थी आज वह जनता और पार्टी में हाशिए पर पहुंच गए हैं। इसका एक कारण और भी रहा की अपनी पसंद का उम्मीदवार मैदान में न आने पर भीतरघात करना रहा। बहरहाल, हरिद्वार ने देश की आजादी से पूर्व और बाद में राजनीति के कई रंग देखे हैं। राजनीति तो आज भी वहीं है लेकिन नेताओं के आचरण, पार्टी के प्रति निष्ठा व समर्पण के साथ जनता के हितों को दरकिनार करने और निजी स्वार्थों को प्राथमिकता दी जाने लगी है। हिन्दुस्थान समाचार/रजनीकांत/अमर/पवन
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