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जंगलों में आग लगने की घटनाओं से मंडरा रहे खतरे के बादल

By HindusthanSamachar | Publish Date: Apr 5 2019 7:28PM
जंगलों में आग लगने की घटनाओं से मंडरा रहे खतरे के बादल
कोटद्वार, 05 अप्रैल (हि.स.)। उत्तराखंड में पिछले दस सालों में हर साल औसतन तीन हजार हेक्टेयर वन जल गए हैं। प्रदेश में जंगलों का बदस्तूर जलना कई तरह के संकटों को निमंत्रण दे रहा है। जंगलों के जलने से उपजाऊ मिट्टी का कटाव तेजी से होता है। साथ ही जल संरक्षण का काम भी प्रभावित होता है। वनाग्नि का बढ़ता संकट जंगली जानवरों के अस्तित्व के लिए सवाल बना पड़ा है। बीते रविवार को लैंसडाउन वन प्रभाग के कोटद्वार रेंज के सुखरो वन क्षेत्र में आग लग गई थी, जिसके बाद वन विभाग के सुखरो क्रू स्टेशन ने आग पर काबू पाया। इस आग में आधा हेक्टेयर वन सम्पदा जल गई थी। जंगलों में ज्यादातर आग गर्मियों के समय ही लगती है। इतिहास टटोलें तो पता चलता है कि हर साल गर्मियों में उत्तराखंड के जंगल धूं-धूं कर जलते रहे हैं। मार्च से लेकर जून के आखिरी हफ्ते तक के समय को वनाग्नि काल कहा जाता है। राजधानी देहरादून में देश का वन अनुसंधान संस्थान है। इसके बावजूद वन विभाग के पास वनों में लगने वाली आग से संबंधित सवालों के न तो तर्कसम्मत जवाब हैं और न ही वनाग्नि की रोकथाम की कोई ठोस कार्ययोजना। नतीजा यह होता है कि हर साल जंगलों की आग तभी शांत होती है जब उत्तराखंड में बरसात पड़ती है। उत्तराखंड के 65 फीसदी हिस्से में वन है। हर साल राज्य में सैंकड़ों हेक्टेयर जंगल राख हो जाते हैं। लैंसडाउन वन प्रभाग डीएफओ वैभव सिंह का कहना है कि वर्तमान में लैंसडाउन वन प्रभाग के 32 क्रू स्टेशन है जो आग की सूचना पर हर समय तैयार रहते हैं। लैंसडाउन वन प्रभाग के कोटद्वार रेन्ज के सुखरो वन क्षेत्र में बीते रविवार को आग लगी थी। हालांकि जल्द ही आग पर काबू पा लिया गया। हिन्दुस्थान समाचार/अवनीश/अमर/अभिषेक
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