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मेरठ रहा है रावण की ससुराल, अभी भी मौजूद है चिन्ह

By HindusthanSamachar | Publish Date: Oct 19 2018 12:29PM
मेरठ रहा है रावण की ससुराल, अभी भी मौजूद है चिन्ह
मेरठ, 19 अक्टूबर (हि.स.)। दशहरे पर लंकापति रावण का पुतला जलाकर बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व मनाया जाता है। इस दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया था। वेस्ट यूपी की धरती से लंकापति रावण का खासा जुड़ाव रहा है। रावण के जन्म से लेकर उसकी ससुराल तक वेस्ट यूपी में मौजूद है। इसके चिन्ह भी यहां पर दिखाई देते हैं। दशानन रावण का पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों से गहरा नाता रहा है। इसी कारण कई स्थानों पर रावण का पुतला नहीं जलाया जाता और लंकेश्वर के मंदिर तक बनाए जा चुके हैं। एमएम काॅलेज मोदीनगर के इतिहास विभागाध्यक्ष डाॅ. केके शर्मा का कहना है कि जनुश्रूति के अनुसार गौतमबुद्ध नगर क्षेत्र के बिसरख में रावण के पिता महर्षि विश्रवा मुनि का आश्रम था। यही पर रावण का जन्म हुआ था। उसका बचपन भी यही पर बीता था। भगवान शिव का भक्त होने के कारण वह अपने पिता के साथ प्रतिदिन गाजियाबाद के दूधेश्वर महादेव मंदिर में पूजा करने जाता था। यह मंदिर आज भी विद्यमान है। इसी तरह से बिसरख में भी प्राचीन शिव मंदिर अभी भी विद्यमान है। बिसरख में लोग दशहरा नहीं मनाते। यहां पर रावण का एक मंदिर भी बनाया जा चुका है। इतिहासकार डाॅ. अमित पाठक का कहना है कि मेरठ का प्राचीन नाम मयराष्ट्र है। मय दानव के नाम पर ही मेरठ का नाम मयराष्ट्र पड़ा। मय दानव की पुत्री मंदोदरी से लंकेश्वर रावण का विवाह हुआ था। इससे स्पष्ट है कि मेरठ से भी रावण का गहरा नाता रहा है। ऐतिहासिक रूप से भी प्रमाण मिलते हैं कि सदर स्थित बिल्वेश्वर महादेव मंदिर में मंदोदरी पूजा करने जाती थी। जिस स्थान पर मय दानव रहता था, वहां तहसील टीला है। इतिहासकारों का कहना है कि बागपत के रावण उर्फ बड़ागांव की स्थापना रावण ने की थी। रावण के नाम पर ही गांव का नाम पड़ा। राजस्व रिकाॅर्ड में भी यह रावण उर्फ बड़ागांव के नाम से दर्ज है। एक समय हिमालय में तपस्या करते समय रावण ने देवी को प्रसन्न किया और उनसे लंका चलने की याचना की। जिस पर देवी ने शक्तिपुंज के रूप में रावण के साथ चल दी। बड़ागांव के पास आते ही रावण को लघुशंका हुई तो उसने एक ग्वाले को देवी का शक्तिपुंज दे दिया। ग्वाले ने उसे नीचे रख दिया। उसी स्थान पर आज मंशा देवी का मंदिर है। मंदिर के पास ही रावण कुंड स्थित है। इस गांव में दशहरे पर रावण का पुतला नहीं जलाया जाता और लंकापति को आदर से देखा जाता है। हिन्दुस्थान समाचार/कुलदीप/राजेश
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