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राजस्थान चुनाव: राज्य में चार बार लग चुका है राष्ट्रपति शासन

By HindusthanSamachar | Publish Date: Nov 5 2018 6:49PM
राजस्थान चुनाव: राज्य में चार बार लग चुका है राष्ट्रपति शासन
जयपुर, 05 नवम्बर (हि.स.)। राजस्थान में 15वीं विधानसभा के लिए चुनाव प्रक्रिया चल रही है। राजशाही के बाद लोकतांत्रिक व्यवस्था के करीब 66 सालों के इतिहास में राजस्थान ने कई उठापटक देखे। विधानसभा में सीटों की संख्या में तीन बार इजाफा हुआ जो 160 से अब 200 तक पहुंच गयी है। इस दौरान राज्य में चार बार राष्ट्रपति शासन भी लगाना पड़ा। आजादी के बाद साल 1952 में राजस्थान में जब पहली बार चुनाव हुए उस समय विधानसभा की कुल 160 सीटें थीं। 23 फरवरी 1952 को गठित पहली विधानसभा में कांग्रेस 82 सदस्यों के साथ पूर्ण बहुमत में थी। इस तरह चुनावी प्रक्रिया प्रारम्भ होने के बाद प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री टीकाराम पालीवाल बने। हालांकि चुनाव से पहले राजस्थान के प्रथम मुख्यमंत्री होने का गौरव हीरालाल शास्त्री को है। कांग्रेस नेता शास्त्री अप्रैल 1949 से पांच जनवरी 1951 तक मुख्यमंत्री रहे। उनके बाद सीएस वेंकटाचारी और जय नारायण व्यास क्रमशः छह जनवरी 1951 से 25 अप्रैल 1951 और 26 अप्रैल 1951 से तीन मार्च 1952 तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर रहे। राजस्थान की पहली विधानसभा के कार्यकाल (23 फरवरी 1952 से 23 मार्च 1957) तक टीकाराम पालीवाल, जय नारायण व्यास और मोहन लाल सुखाड़िया मुख्यमंत्री रहे। दूसरी विधानसभा का कार्यकाल दो अप्रैल 1957 से पहली मार्च 1962 तक रहा। दूसरी विधानसभा में सीटों की संख्या 160 से बढ़कर 176 हो गयी और 119 सदस्यों के साथ कांग्रेस फिर बहुमत में रही। मुख्यमंत्री के रुप में मोहन लाल सुखाड़िया का कार्यकाल पूरे पांच साल तक रहा। सुखाड़िया तीसरी विधानसभा के कार्यकाल (तीन मार्च 1962 से 28 फरवरी 1967) में भी राजस्थान के मुख्यमंत्री बने रहे। तीसरी विधानसभा में भी विधायकों की संख्या 176 ही रही लेकिन, चौथी विधानसभा के लिए जब 1967 में चुनाव हुए तो सीटों की संख्या बढ़ाकर 184 कर दी गयी। चौथी विधानसभा में भी कांग्रेस ही बहुमत में रही और 103 विधायकों के साथ इस कार्यकाल के लिए भी मोहन लाल सुखाड़िया को ही मुख्यमंत्री बनाया गया। लेकिन करीब तीन साल बाद कांग्रेस नेतृत्व ने उन्हें हटाकर बरकतुल्लाह खान को राज्य का मुख्यमंत्री बना दिया। राजस्थान की पांचवी विधानसभा का कार्यकाल 15 मार्च 1972 से 30 अप्रैल 1977 तक रहा। इस दौरान राज्य को बरकतुल्लाह खान और हरिदेव जोशी के रुप में दो मुख्यमंत्रियों का नेतृत्व मिला। पांचवी विधानसभा में भी विधायकों की संख्या 184 ही रही, लेकिन छठी विधानसभा के लिए जब चुनाव हुए तो सदस्यों की संख्या एक बार फिर बढ़ाकर 200 कर दी गयी। ये चुनाव देश में लगे आपातकाल के बाद 1977 में हुए थे। इस चुनाव में 150 सीटें जीतकर जनता पार्टी ने भारी बहुमत के साथ प्रदेश में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनायी और भैरो सिंह शेखावत मुख्यमंत्री बने। लेकिन, जनता पार्टी की सरकार बामु्श्किल दो साल आठ माह ही चल सकी। परिणामस्वरुप करीब चार माह तक राज्य में राष्ट्रपति शासन रहा। इसके बाद छठी विधानसभा के लिए जब चुनाव हुए तो 200 में से 133 सीटों के साथ कांग्रेस एक बार फिर बहुमत में आ गयी और जगन्नाथ पहाड़िया मुख्यमंत्री बनाये गये। हालांकि पहाड़िया सातवें विधानसभा के पूरे कार्यकाल (छह जून 1980 से नौ मार्च 1985) तक मुख्यमंत्री के पद पर नहीं रह सके। करीब एक साल बाद 14 जुलाई 1981 को कांग्रेस विधायक दल की तरफ से शिवचरण माथुर को प्रदेष का अगला मुख्यमंत्री चुना गया और वह भी 23 फरवरी 1985 तक इस कुर्सी पर रहे। इसके बाद हीरा लाल देवपुरा को मुख्यमंत्री बनाया गया। राजस्थान की आठवीं विधानसभा का कार्यकाल नौ मार्च 1985 से पहली मार्च 1990 तक रहा। इसमें भी 113 सीटों के साथ कांग्रेस ही बहुमत में रही और इस दौरान मुख्यमंत्री के रुप में हरिदेव जोशी और शिवचरण माथुर पे राज्य की सत्ता संभाली। नौवीं विधानसभा (दो मार्च 1990 से 15 दिसम्बर 1992 तक) में कांग्रेस अल्पमत में आ गयी और प्रदेष में पहली बार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व में सरकार बनी। इस चुनाव में भाजपा 84 सीटों पर जीती थी। मुख्यमंत्री भैरो सिंह शेखावत थे। उनकी सरकार में 54 विधायकों के साथ जनता दल भी शामिल थी, लेकिन करीब ढ़ाई साल बाद भाजपा नेतृत्व की सरकार गिर गयी और प्रदेष एक बार फिर साल भर के लिए राष्ट्रपति शासन के अधीन हो गया। वर्ष 1993 में जब 10वीं विधानसभा (कार्यकाल-चार दिसम्बर 1993 से 30 नवम्बर 1998 तक) के लिए चुनाव हुए तो 125 सीटें जीतकर भाजपा पूर्ण बहुमत में आयी और भैरो सिंह शेखावत ने पुनः राज्य के मुख्यमंत्री बनाये गये। लेकिन, 11वीं विधानसभा (कार्यकाल-पहली दिसम्बर 1998 से पांच दिसम्बर 2003 तक) का चुनाव कांग्रेस के पक्ष में गया और अशोक गहलोत राज्य के अगले मुख्यमंत्री बनाये गये। इसके बाद 12वीं विधानसभा (कार्यकाल-पांच दिसम्बर 2003 से दस दिसम्बर 2008 तक) कांग्रेस की बाजी पलट गयी और 123 सीटें जीतकर भाजपा फिर सत्ता में आ गयी। इस बार भाजपा ने वसुन्धरा राजे सिंधिया को मुख्यमंत्री बनाया। वह प्रदेष की प्रथम महिला मुख्यमंत्री बनीं, लेकिन 13वीं विधानसभा (कार्यकाल-11 दिसम्बर 2008 से नौ दिसम्बर 2013 तक) के लिए हुए चुनाव में उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा और 102 सीटों के साथ कांग्रेस सत्ता में लौट आयी और पार्टी ने एक बार फिर अशोक गहलोत पर विष्वास करते हुए उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाया। हालांकि गहलोत 14वीं विधानसभा (कार्यकाल-11 दिसम्बर 2013 से आज तक) में विष्वास कायम रखने में असफल रहे और वसुन्धरा राजे सिंधिया के नेतृत्व में भाजपा फिर सत्ता में आ गयी। इस तरह राजस्थान में 1952 से 1977 तक कांग्रेस लगातार सरकार बनाती रही। आपातकाल के बाद 1977 में हुए चुनाव में पहली बार वह सत्ता से बाहर हुई। इसके बाद प्रदेष में दो दलीय परम्परा स्थापित सी हो गयी और सत्ता भाजपा व कांग्रेस के इर्दगिर्द सिमट गई। पिछले कई चुनावों से यहां की सियासी स्थिति ऐसी हो गयी है कि इन दोनों दलों में जिसकी सरकार बनती है, वह अगले चुनाव में सत्ता से बाहर हो जाती है। आजादी के बाद करीब 66 सालों के लोकतांत्रिक इतिहास में राजस्थान ने चार बार राष्ट्रपति शासन भी देखा। राज्य में पहली बार राष्ट्रपति शासन 13 मार्च 1967 से 26 अप्रैल 1967 तक रहा। दूसरी बार 30 अप्रैल 1977 से 21 जून 1977 तक फिर 17 फरवरी 1980 से पांच जून 1980 तक और चैथी बार 15 दिसम्बर 1992 से तीन दिसम्बर 1993 तक रहा। राजस्थान में 15वीं विधानसभा के लिए सात दिसम्बर को मतदान होने हैं। राजस्थान का गठन 30 मार्च 1949 को भारत के सातवें राज्य के रूप में हुआ था। राज्य में 33 जिले और विधानसभा की वर्तमान में कुल 200 सीटें हैं। राजस्थान में अब तक कुल 14 लोग 24 बार मुख्यमंत्री का पद संभाल चुके हैं। इनमें मोहन लाल सुखाड़िया सबसे ज्यादा चार बार मुख्यमंत्री रहे। अब तक के मुख्यमंत्री और उनके कार्यकाल- मुख्यमंत्री का नाम कार्यकाल दल 1-हीरा लाल शास्त्री 07 अप्रैल 1949 से 05 जन0 1951 तक कांग्रेस 2-सी एस वेंकटाचारी 06 जन0 1951 से 25 अप्रैल 1951 तक कांग्रेस 3-जय नारायण व्यास 26 अप्रैल 1951 से 03 मार्च 1952 तक कांग्रेस 4-टीका राम पालीवाल 03 मार्च 1952 से 31 अक्टू0 1952 तक कांग्रेस 5-जय नारायण व्यास 01 नव0 1952 से 12 नव0 1954 तक कांग्रेस 6-मोहनलाल सुखाड़िया 13 नव0 1954 से 11 अप्रैल 1957 तक कांग्रेस 7-मोहन लाल सुखाड़िया 11 अप्रैल 1957 से 11 मार्च 1962 तक कांग्रेस 8-मोहन लाल सुखाड़िया 12 मार्च 1962 से 13 मार्च 1967 तक कांग्रेस 9-मोहन लाल सुखाड़िया 26 अप्रैल 1967 से 09 जुलाई 1971 तक कांग्रेस 10-बरकतुल्लाह खान 09 जुलाई 1971 से 11 अगस्त 1973 तक कांग्रेस 11-हरिदेव जोशी 11 अगस्त 1973 से 29 अप्रैल 1977 तक कांग्रेस 12-भैरोसिंह शेखावत 22 जून 1977 से 16 फरवरी 1980 तक जनता पार्टी 13-जगन्नाथ पहाड़िया 06 जून 1980 से 13 जुलाई 1981 तक कांग्रेस 14-शिवचरण माथुर 14 जुलाई 1981 से 23 फरवरी 1985 तक कांग्रेस 15-हीरालाल देवपुरा 23 फरवरी 1985 से 10 मार्च 1985 तक कांग्रेस 16-हरिदेव जोशी 10 मार्च 1985 से 20 जनवरी 1988 तक कांग्रेस 17-शिवचरण माथुर 20 जनवरी 1988 से 04 दिसम्बर 1989 तक कांग्रेस 18-हरिदेव जोशी 04 दिसम्बर 1989 से 04 मार्च 1990 तक कांग्रेस 19-भैरोंसिंह शेखावत 04 मार्च 1990 से 15 दिसम्बर 1992 तक भाजपा 20-भैरोसिंह शेखावत 04 दिसम्बर 1993 से 29 दिसम्बर 1998 तक भाजपा 21-अशोक गहलोत 01 दिसम्बर 1998 से 08 दिसम्बर 2003 तक कांग्रेस 22-वसुन्धरा राजे 08 दिसम्बर 2003 से 11 दिसम्बर 2008 तक भाजपा 23-अशोक गहलोत 12 दिसम्बर 2008 से 13 दिसम्बर 2013 तक कांग्रेस 24-वसुन्धरा राजे 13 दिसम्बर 2013 से अब तक भाजपा हिन्दुस्थान समाचार/ पीएन द्विवेदी/ ईश्वर
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