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बेनीवाल व तिवाड़ी के मिलाप से रोचक हुआ विधानसभा चुनाव

By HindusthanSamachar | Publish Date: Nov 1 2018 4:47PM
बेनीवाल व तिवाड़ी के मिलाप से रोचक हुआ विधानसभा चुनाव
जोधपुर/जयपुर, 01 नवम्बर (हि.स.)। निर्दलीय विधायक और जाट नेता हनुमान बेनीवाल ने जयपुर में अपनी नयी पार्टी का एलान कर राजस्थान के विधानसभा चुनाव को दिलचस्प बना दिया है। अब तक कांग्रेस और बीजेपी के बीच चलने वाला चुनावी संघर्ष यूं तो राजस्थान के शेखावाटी और मेवात में बसपा भी त्रिकोणीय बनाने की कोशिश करती रही है। लेकिन, बसपा को जीत के लिहाज से कामयाबी कम मिली, दलित वोट बैंक के सहारे राजनीति करने वाली कांग्रेस का गणित ज्यादा बिगड़ा। अब बेनीवाल की बोतल किस दल के समीकरणों में तूफ़ान लाएगी, सबकी निगाह इसी पर टिक गयी है। निगाह इसलिए भी लगी है क्योंकि वसुंधरा विरोध के जरिये अपनी अलग राजनीतिक हैसियत नापने निकले पूर्व मंत्री और संघ पृष्ठभूमि के नेता घनश्याम तिवाड़ी भी बेनीवाल के साथ नत्थी हो गए हैं। यानि, चुनाव में बोतल के साथ अब बांसुरी भी दिखेगी। गौरतलब है कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर पहले दीनदयाल वाहिनी फिर भारत वाहिनी नामक पार्टी का गठन करने वाले घनश्याम तिवाड़ी की पार्टी का चुनाव चिन्ह बांसुरी है और बेनीवाल की पार्टी का चुनाव चिन्ह बोतल है। तिवाड़ी ने बेनीवाल की किसान हुंकार रैली में जाकर बोतल और बांसुरी के सियासी मिलन को साफ़ कर दिया है। कभी बीजेपी में भैरों सिंह शेखावत की आंख के तारे रहे तिवाड़ी और बेनीवाल उत्तरप्रदेश में प्रभावी समाजवादी पार्टी और अजीत सिंह के लोकदल को साथ ले कितनी सीटें जीत पाएंगे, यह तो भविष्य के गर्भ में है। फिलहाल, घनश्याम तिवाड़ी और हनुमान बेनीवाल की कोशिश यही है कि राजस्थान में सत्ता उनकी भागीदारी के बिना नहीं बने। किसानों के सम्पूर्ण कर्ज माफ़ी, किसानों को मुफ्त बिजली, खाली पड़े सरकारी पदों पर नियुक्ति, दस हज़ार रुपये बेरोजगारी भत्ता लागू करने, किसान हित में स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करने और मजबूत लोकपाल विधेयक लागू करने जैसे मुद्दों को जब- तब गर्माते रहे बेनीवाल, घनश्याम तिवाड़ी जैसे पुरानी नेताओं के सहारे सत्ता में आने का सपना तो संजो ही रहे हैं, पूरे प्रदेश में सडक़ों पर टोल टेक्स ख़त्म करने जैसे वादे भी कर रहे हैं। इस तरह के वादों के साथ पूरे प्रदेश का दौरा कर चुके बेनीवाल ने शेखावाटी और मारवाड़ में कई प्रभावी रैलियां कर अपनी ताकत का अहसास भी कराया, लेकिन मूल सवाल यही कि क्या यह जन समर्थन वोट में तब्दील हो पायेगा ? अतीत के उदाहरणों को देखें तो तीसरे मोर्चे के उदय की राजस्थान में संभावनाएं न के बराबर ही हैं। आज हनुमान बेनीवाल किसानों और बेरोजगारों के मुद्दों पर मतदाताओं को लुभाने की कोशिश में है तो पहले सोशियल जस्टिस फ्रंट के बैनर तले प्रभावी भीड़ के जरिये शक्ति प्रदर्शन करते रहे पूर्व मंत्री देवी सिंह भाटी और लोकेन्द्र सिंह कालवी ने भी ऐसा ही राजनीतिक प्रयोग 1998 के विधान सभा चुनावों में किया था। सामाजिक न्याय मंच ने राजनीतिक दल का रूप लिया तो हर कोई उनके स्लोगन और उस स्लोगन के साथ जुड़ती दिखी भीड़ को देख राजस्थान में नयी ताकत के उदय का अंदाज़ लगा रहा था। नारा था, उपेक्षित को आरक्षण और आरक्षित को संरक्षण, लेकिन चुनाव नतीजे सामने आये तो सारी उम्मीदें और सारे आकलन धराशायी रह गए। अतीत को देखते हुए राजनीतिक के जानकारों को लगता है कि बांसुरी और बोतल भी चाय के प्याले में तूफ़ान बनकर न रह जाए। हालांकि, पश्चिमी राजस्थान और शेखावाटी की राजनीति में बड़ा दखल रखने वाली जाट जाति के नौजवानों के लिए जातीय गौरव बने हनुमान बेनीवाल की सोशल मीडिया पर फॉलोइंग देख लगता है कि वह कुछ नया कर सकते हैं। जहां तक जातीय वोट बैंक की बात है, हनुमान बेनीवाल उसी जाट वोट बैंक में सेंधमारी की जुगत में लगे हैं, जिसे साधने के चक्कर में बीजेपी अपना मूल वोट गंवाने की स्थिति में पहुंच गई है। जाट रियासत-धौलपुर की पूर्व महारानी वसुंधरा राजे ने बतौर मुख्यमंत्री अपनी सरकार में जाट बिरादरी को कुछ इस तरह साधने और जोडऩे के उपाय किये हैं कि उसके पारम्परिक विरोधी वोट बैंक राजपूतने राजे ही नहीं, बीजेपी से भी दूरी साध ली है। राजनीतिक प्रेक्षक विधान सभा चुनाव से ठीक पहले सेमीफाइनल की तरह लड़े गए अजमेर, अलवर लोकसभा और मांडलगढ़ विधानसभा के उप चुनाव में हार की बड़ी वजह राजे के इसी जातीय तुष्टिकरण और बेलगाम ब्यूरोक्रेसी को मानते रहे हैं। लेकिन, मुख्यमंत्री के मर्जीदान अफसरों को ऐसा नहीं लगा। यही वजह है कि 17 की 17 विधान सभा सीटों पर हुई करारी हार के बावजूद वह चुनावी जंग जीतने के लिहाज से उसी वोट बैंक को साधने में जुटे रहे, जिस पर अब बेनीवाल की निगाह है। यहां तक कि अजमेर उप चुनाव में बीजेपी की हार की एक बड़ी वजह माने गए जाट आईपीएस अधिकारियों को और बड़ी जिम्मेदारी दी गई। चुनाव से ठीक पहले की गयी इस तैनाती के दिलचस्प पहलू यह है कि उदयपुर को छोड़ दिल्ली मुंबई राष्ट्रीय राजमार्ग के सभी जिला मुख्यालयों पर अभी जाट पुलिस अधिकारी तैनात हैं। यानि, उसी जातीय गणित को साधने की वसुंधरा सरकार ने बीते पांच साल से कोशिश जारी रखी है, जिसके सहारे हनुमान बेनीवाल अब तक का अपना सबसे बड़ा राजनीतिक दांव खेलने जा रहे हैं। जिलों में तैनात अखिल भारतीय सेवा और राय सेवा के पुलिस और प्रशासनिक सेवा अधिकारियों का आंकड़ा इस जातीय गणित को साधने की सरकारी कोशिश को उसी शिद्दत से रेखांकित कर रहा है, जिस शिद्दत से किसी जमाने में अखिलेश यादव की सरकार यादव अधिकारीयों की तैनाती के जरिए करती रही है। ऐसे में सवाल यह है कि शेखावाटी और मारवाड़ में प्रभावी जाट मतदाता क्या सचमुच वसुंधरा राजे का साथ छोड़ हनुमान बेनीवाल के साथ चले जाएंगे? यदि हां तो सरकार में लगातार जाट बिरादरी को पोस्टिंग में अहमियत देती रही सीएम राजे के लिए सदमा होगा, और नहीं तो हनुमान बेनीवाल की बोतल बाजार में स्थापित होने से पहले ही खाली हो जाएगी। और बोतल खाली रही तो बांसुरी भी शायद ही बज पाएगी। हिन्दुस्थान समाचार/ सतीश/संदीप
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