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आरएलपी के गठन ने कांग्रेस भाजपा के टिकटों की सूची को लगाया ब्रेक

By HindusthanSamachar | Publish Date: Oct 30 2018 4:34PM
आरएलपी के गठन ने कांग्रेस भाजपा के टिकटों की सूची को लगाया ब्रेक

सतीश

जोधपुर। आगामी सात दिसंबर को राजस्थान में होने वाले विधानसभा चुनाव में कौन जितेगा और कौन सरकार बनायेगा यह तो फैसला परिणाम के बाद सामने आयेगा लेकिन जयपुर में हुए तीसरे मोर्च के गठबंधन के बाद कांग्रेस भाजपा के नेताओं की नींद उड़ा दी और अब वे टिकटों के बंटवारे को लेकर चल रही रणनीति में बदलाव करने को मजबूर हो रहे हैं। दोनों ही नेताओं को नयी पार्टी के कर्णधारों से ज्यादा अपनी पार्टी से बगावत कर इनका हाथ थामने वाले नेताओं से मिलने वाली टक्कर से होने वाली हार का अहसास होने लगा है।

राजस्थान की राजनीति में अब तक हर विधानसभा चुनाव में बनने वाले तीसरे मोर्च के बावजूद एक बार कांग्रेस एक बार भाजपा का परचम लहराता नजर आया है। लेकिन इस बार जहां भाजपा फिर से नाराज के साथ भाजपा के नेता येन केन प्रकारेण सरकार बनाने की जुगत भिड़ाने को जुटे हुए है तो कांग्रेस अपनी पुरानी परम्परा पिछली बार भाजपा इस बार कांग्रेस का नारा देकर सत्ता में आने का मसूंबा पाले हुए नजर आ रही है। जानकारों की माने तो मारवाड़ पर तो असर कम ही होगा। मगर शेखावटी अंचल पर इनका दबादबा ज्यादा देखा जा सकता है। फिर भी भाजपा और कांग्रेस खेमे एक अजीब सी खलबली मची हुई है। तीसरा मोर्चा प्रदेश में बनन से कांग्रेस व भाजपा की सीटों की गणित गड़बड़ा सकती है।

उम्मीदवारों की भीड़ बढ़ी:

दोनों ही पार्टियों में इस विधानसभा चुनाव में कार्यकर्ताओं से ज्यादा उम्मीदवारों की भीड़ नजर आ रही है और हर उम्मीदवार अपने अपने क्षेत्र में जीत के दावे आकड़़ों के माध्यम से और भीड़ के माध्यम से करने का वादा अपने आकाओं से करता रहा है। कांग्रेस और भाजपा दोनों में ही टिकट के दावेदारों ने इस बार टिकट नहीं तो पार्टी नहीं के मंसूब भी अपने नेताओं के सामने शुरू कर दिये।

बेनिवाल की पकड़ से दोनों दलों में बढ़ी चिंता:

काफी लम्बे समय से जहां किसानों के नाम पर हुंकार रैली भरकर विधायक हनुमान बेनीवाल अपनी पकड़ मारवाड़ और शेखावटी में बनाने में जुटे हुए हैं तो स्वाभिमान को लेकर भारत वाहिनी बनाने वाले घनश्याम तिवाड़ी भी भाजपा और कांग्रेस में मान सम्मान के अभाव में किनारे आये नेताओं के बलबूते पर अपनी वेतरणी पार करने की जुगाड़ में नजर आ रहे है। दोनों ही नेता करीब छह माह से अपने संगठन और समर्थकों की भीड़ जुटाने में लगे हुए थे लेकिन आखिर माह में आकर दोनों ही नेताओं ने स्व आंकलन के बाद एक से भले दो की कहावत को चरितार्थ करते हुए जयपुर में एक मंच पर आकर राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी का गठन कर चुनाव लड़ने की ठानी। इनको उम्मीद है कि उम्मीदवार तो उनको दोनों ही पार्टियों से टिकट से वंचित रहे नेता मिल ही जायेगे और रही बात मतदाताओं की तो उन्होने कांग्रेस और भाजपा के कारनामों का कच्चा चिट्ठा दिखाकर अपने पक्ष में करने की कोशिश में कुछ हद तक सफल भी होंगे। हालांकि इस तीसरे मोर्च के शुरूआती बयान से तो वे जनता की सरकार बनाने के दावे कर रहे है लेकिन हकीकत का फैसला तो मतदान और मतगणना के बाद ही सामने आएगा।

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