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मंदिर जाने का फैसला खुद राहुल गांधी का ही है : गहलोत

By HindusthanSamachar | Publish Date: Nov 9 2018 3:33PM
मंदिर जाने का फैसला खुद राहुल गांधी का ही है : गहलोत

सतीश हेड़ाऊ

जोधपुर । पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के संगठन महासचिव अशोक गहलोत ने कहा कि राहुल गांधी के मंदिरों में जाकर दर्शन और पूजा अर्चना करना उनका निजी फैसला है। दरअसल गहलोत से यह कहा गया कि उनकी संगत से राहुल गांधी में बदलाव आया है वे यानी गहलोत ही राहुल गांधी को मंदिरों में दर्शन के लिए ले जाने लगे हैं और राहुल गांधी के बोलने का अंदाज भी बदला है। गहलोत ने इनकार करते हुए कहा कि यह खुद उनका फैसला है। गहलोत ने राहुल गांधी की तारीफ करते हुए कहा कि उनका व्यक्तित्व शानदार है और वह खुद उनसे सीख रहे हैं। विधानसभा चुनावों में पार्टी की ओर से दी जाने वाली जिम्मेदारी को निभाने का वे भरसक प्रयास करेंगे। उनकी अब कोई इच्छा पद पाने की या लेने की नहीं है उनका मकसद सिर्फ पार्टी को बहुमत दिलाना है।

गहलोत का अंदाज कुछ निराला आया:

शहर में लगातार दो दिन तक टिकट के दावेदारों व उनके समर्थकों की भारी भीड़ में घिरे रहने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत एकदम अलहदा अंदाज में नजर आए। सारी चिंताओं को एक तरफ रख उन्होंने शहर के कुछ चुनीन्दा पत्रकारों के साथ शाम गुजारी। बेफ्रिक नजर आ रहे गहलोत ने खुलकर अपने मन की बातें भी शेयर की। इसमें राजनीति से लेकर अपने व्यक्तिगत जीवन से जुड़ी बातों के साथ उन्होंने जोधपुर में गुजारे अपने पुराने दिनों को याद किया।

राहुल से सीख रहा हूं:

गुजरात चुनाव से पहले गहलोत राहुल गांधी के साथ जुड़े उसके पश्चात चुनाव अभियान के दौरान राहुल गांधी एकदम बदले अंदाज में नजर आए और लोग गाहे बगाहे इसका श्रेय गहलोत को दे रहे हैं। इस बारे में गहलोत का कहना है कि पता नहीं ये बात कहां से शुरू हुई, लेकिन सोशल मीडिया पर बहुत चली। जबकि वास्तविकता तो यह है कि मैं राहुल गांधी से सीख रहा हूं। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी के व्यक्तित्व के बारे में सोशल मीडिया पर कई तरह का भ्रामक प्रचार किया जा रहा है। जबकि वास्तव में वे बहुत शानदार व्यक्तित्व के धनी है। देश की समस्याओं को लेकर उनकी सोच बहुत स्पष्ट है। अलबत्ता उन्होंने स्वीकार किया कि राहुल के भाषण में शब्दों के चयन को लेकर कुछ खामी हो सकती है, लेकिन इसके पीछे उनकी परवरिश को देखना पड़ेगा। इंदिरा गांधी की हत्या के समय राहुल बहुत छोटे थे। बाद में सुरक्षा कारणों से उनकी पूरी स्कूली शिक्षा अमूमन घर पर ही हुई। उनके पिता की भी हत्या हो गई। ऐसे में कॉलेज शिक्षा के लिए भी विदेश में पढ़ने जाने के दौरान सुरक्षा एजेंसियों ने उन्हें दूर दराज के कॉलेजों में पढ़ाई करने को कहा। ऐसे में आप समझ सकते हो कि व्यक्तिगत जीवन काफी अकेलेपन में गुजरा। इसका असर कहीं न कहीं अवश्य पड़ता है।

कांग्रेस सोशल मीडिया पर नहीं बनी सक्रिय:

गहलोत ने स्वीकार किया कि देश में संचार क्रांति का सूत्रपात करने के बावजूद कांग्रेस सोशल मीडिया पर अपेक्षा के अनुरूप सक्रिय नहीं रह पाई। जबकि भाजपा ने अपने कुप्रचार के लिए इसका बेहतर तरीके से इस्तेमाल किया. पार्टी ने अब इस तरफ अपना ध्यान केन्द्रित किया है। निकट भविष्य में इस प्लेटफॉर्म पर पार्टी अपनी पकड़ साबित करेगी। गहलोत ने कहा कि राजनीतिक मजबूरियों की वजह से उन्हें कभी जयपुर तो कभी दिल्ली में रहना पड़ता है, लेकिन उनके मन में तो हमेशा जोधपुर बसा रहता है। वे इस शहर और यहां के लोगों की कमी बड़ी शिद्दत से महसूस करते हैं। उनका बस चले तो वे जोधपुर छोड़ कहीं जाए ही नहीं। व्यक्तिगत बातचीत में भी राजनीति के माहिर इस खिलाड़ी ने बड़ी चतुराई के साथ इस सवाल का जवाब गोलमाल कर दिया कि वे राज्य की राजनीति में सहज महसूस करते है या फिर केन्द्र की? बार-बार कुरेदे जाने के बावजूद गहलोत ने अपने पत्ते नहीं खोले अलबत्ता जवाब को घूमा कर कहा कि पार्टी को जहां भी जरुरत महसूस होगी वहां वे हमेशा तैयार खड़े मिलेंगे। पार्टी तय करेंगी टिकट देगी या नहीं: स्वयं के चुनाव लडऩे के बारे में गहलोत ने कहा कि पार्टी तय करेगी कि उन्हें टिकट प्रदान किया जाए या नहीं। मुस्कराते हुए उन्होंने कहा कि हो सकता है कि उनका टिकट ही कट जाए। पार्टी ने चार स्तर पर सर्वे कराया है। इन सर्वे रिपोर्ट के आधार पर तय होगा कि अपने-अपने क्षेत्रों में कौनसा व्यक्ति पांच साल से सक्रिय रहा। इसमें जिसका नाम सबसे ऊपर होगा उसे टिकट मिल जाएगा।

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