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युवाओं के लिए संभावनाओं से भरा बीकानेर

By HindusthanSamachar | Publish Date: Oct 26 2018 3:24PM
युवाओं के लिए संभावनाओं से भरा बीकानेर

राजीव

बीकानेर। विधानसभा चुनाव से पूर्व बीकानेर की राजनीति का बदलता परिदृश्य युवाओं के लिए संभावनाओं से भरा हुआ साबित होने वाला है। वयोवृद्ध नेताओं द्वारा दावा हटाने के बाद सीधे तौर पर यह लगने लगा है कि इस बार बीकानेर जिले से युवाओं की संख्या अधिक होगी।

पिछली बार कोलायत से भंवरसिंह भाटी, बीकानेर विधानसभा पूर्व से सिद्धिकुमारी, खाजूवाला से डॉ.विश्वनाथ जैसे चेहरे राजस्थान विधानसभा में बीकानेर का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। इस बार इस संख्या में इजाफा हो सकता है। हालांकि इस बीच यह भी सवाल खड़ा हो रहा है कि कहीं इस तरह की घोषणा सिर्फ समर्थकों की सहानुभूति लेने का ही तो फार्मूला नहीं है। एक तरफ जहां मानिकचंद सुराना और देवीसिंह भाटी पहले ही चुनाव की राजनीति से दूर रहने की घोषणा कर चुके हैं तो डॉ.गोपाल जोशी ने भी दो दिन पहले चुनाव नहीं लडऩे की घोषणा कर दी है।

सुराना और जोशी अस्वस्थ भी रहते हैं, इसलिए उनके राजनीति में सक्रिय नहीं रहने की बात समझ आती है। देवीसिंह भाटी का मामला कुछ ढुलमुल है, क्योंकि उन्हीं की पार्टी के नेता उन्हें चुनाव लड़वाना चाहते हैं। श्रीडूंगरगढ़ के विधायक किसनाराम नाई के लिए भी कमोबेश ऐसे ही कयास लगाए जा हैं कि वे इस बार चुनावी समर में कूदने के सवाल पर अनिश्चित हैं। इस बात की संभावना कम ही है कि किसनाराम अपने लिए टिकट की मांग करे। इससे भी अधिक इस बात में दम है कि पार्टी उम्र के तकाजे पहले ही किसनाराम को समझा देगी कि इस बार दावा नहीं करने में ही फायदा है, लेकिन किसनाराम जरा अलग तेवर के व्यक्ति हैं, इसलिए पार्टी को अगर श्रीडूंगरगढ़ में जीत चाहिए तो किसनाराम से पटरी बैठानी पड़ेगी। अगर ऐसा होता है तो श्रीडूंगरगढ़ से भी एक नया प्रत्याशी भाजपा को मिलेगा।

बीकानेर विधानसभा पश्चिम से तो नये नाम पर विचार होने की संभावना ही ज्यादा है। लूणकरणसर से मानिकचंद सुराना के चुनावी समर में नहीं उतरने के निर्णय ने कांग्रेस और भाजपा, दोनों में ही खुशी की लहर चला दी है। हालांकि इस चुनाव में सुराना अपने पौत्र सिद्धार्थ के लिए प्रयास कर रहे हैं। अगर भाजपा टिकट नहीं देती है तो वे पौत्र को निर्दलीय चुनाव लड़ाएंगे या नहीं, यह फैसला अभी तक सुरक्षित है। हालांकि अपने पौत्रों को राजनीति के दंगल में उतारने के लिए सारे नेता कमर कसे हुए हैं, लेकिन पार्टियां वंशवाद को कितना प्रश्रय देती है, यह आने वाले समय में ही पता चलेगा, लेकिन इसमें दो राय नहीं है कि जिस तरह वयोवृद्ध नेता सक्रिय राजनीति से विदा ले रहे हैं, युवाओं को अवसर मिल रहा है।

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