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तजाकिस्तान में सुषमा स्वराज की साड़ी, बिंदी देख लोगों को बरबस याद आ गए राजकपूर

By HindusthanSamachar | Publish Date: Oct 12 2018 9:31PM
तजाकिस्तान में सुषमा स्वराज की साड़ी, बिंदी देख लोगों को बरबस याद आ गए राजकपूर
निमिष
दुशांबे/नई दिल्ली, 12 अक्टूबर (हि.स.)। शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक में हिस्सा लेने तजाकिस्तान की राजधानी दुशांबे पहुंची विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की साड़ी और बिंदी को लेकर हमेशा से स्थानीय लोगों में जबरदस्त क्रेज देखा गया। इस बार भी तजाकिस्तान में रह रहे भारतीय समुदाय से मुलाकात के दौरान सुषमा स्वराज ने भारत, भारतीय संस्कृति, बॉलीवुड को लेकर इन देशों में क्रेज को लेकर अपने संस्मरण सुनाए।
 
सुषमा ने कहा कि मैं भी पांचों देशों की यात्रा कर चुकी हूँ और हर जगह, ये जो सोवियत संघ का हिस्सा थे पहले, हर जगह भारत के प्रति, भारतीयों के प्रति जो प्यार, गौरव, जो आदर दिखाई देता है उससे मन अभिभूत हो जाता है। जो बच्चे यहाँ पढ़ने के लिए आए हैं, जो पहले से पढ़ रहे हैं, जो इस बार आए हैं, वो ये महसूस कर रहे होंगें। राजनेताओं द्वारा ही नहीं, बॉलीवुड की बहुत बड़ी भूमिका है इसमें। मुझे एक घटना कभी भूलती नहीं है, वर्षों पहले कि ये बात है। मैं तत्कालीन स्पीकर साहब के प्रतिनिधि मंडल में मास्को आई थी। हम लोग सड़क पर चल रहे थे। मैंने साड़ी पहनी थी, बिंदी लगाई थी तो मेरे पास एक महिला चल कर आई, इंडिया-इंडिया, मैंने कहा, यस इंडिया। उस महिला ने सीधे राज कपूर की फिल्म का गीत 'मैं आवारा हूँ' गाना शुरू कर दिया।
 
उन्होंने स्पष्ट किया कि ये तो बहुत पुरानी बात बता रही थी, करीब बीस वर्ष पहले की। लेकिन अभी-अभी एक घटना घटी। पिछले महीने मैं उज्बेकिस्तान आई थी, तो उज्बेकिस्तान के ताशकंद में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर का स्मारक है। वहाँ पुष्पांजलि अर्पित करने के लिए गई, तो एक बहुत बुजुर्ग महिला, जो 83 साल की थीं, आकर मेरे पास बोलीं, इंडिया, भारत-भारत। तो मैंने कहा, हाँ। तो पहले तो उन्होंने भी गाया 'मैं आवारा हूं', फिर शुरू हो गईं 'इचक दाना, बिचक दाना, दाने ऊपर दाना'। मैंने भारतीय राजदूत से कहा कि वो चली गईं, उनके घर का पता करो कि कहां रहती हैं, उन्हें मेरी ओर से उपहार देकर आओ, फिर वो उपहार उनके घर भिजवाया था।
 
मध्य एशिया में भारत के प्रति जो एक प्यार, एक प्रेम की भावना है वो यूँ ही नहीं बन गई। वो इसलिए बनी कि हमारे पारिवारिक मूल्य, हमारी संस्कृति एक दूसरे से मिलती हैं। उन पारिवारिक मूल्यों के कारण इन देशों को भारत अपना लगता है और भारत को ये देश अपने लगते हैं।
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