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मुगालतों के दम पर नहीं कार्यकर्ताओं की जमींनी मेहनत से हासिल होगी जीत...

By HindusthanSamachar | Publish Date: Nov 3 2018 12:49PM
मुगालतों के दम पर नहीं कार्यकर्ताओं की जमींनी मेहनत से हासिल होगी जीत...
मंगल नाहर
शाजापुर। विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा द्वारा जारी की गई उम्मीदवारों की पहली सूची में शाजापुर जिले की तीनों सीटों पर किसी भी उम्मीदवार की घोषणा नहीं हुई है। संगठन के इस कदम से यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो चुकी है कि शीर्ष नेतृत्व केवल जीत के लिए सोच रहा है और उस पर दावेदारों की लोकप्रियता और स्वच्छ छवि के अतिरिक्त कोई ओर फेक्टर असर नहीं कर रहा है। 
 
उल्लेखनीय है कि विगत चुनाव में शाजापुर विधानसभा में भाजपा को काफी अल्पमतों से जीत हासिल हुई थी, जिसे देखते हुए पार्टी जहां जीत के अंतराल को बढ़ाने की सोच लेकर विशेष रणनीति तैयार करने में जुटी है, वहीं ये रणनीति कारगर साबित करने के लिए पार्टी पदाधिकारी व कार्यकर्ताओं को भी अतिआत्मविश्वास और मुगालते पाले बिना वास्तविक और कड़ी मेहनत करना बेहद जरूरी है। 
 
कहने के लिए भाजपा वर्तमान में देश और दुनिया की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी है, जिसकी विचारधारा से जुड़े जनप्रतिनिधि पार्षद से लेकर प्रधानमंत्री तक बन चुके हैं, लेकिन देश और प्रदेश की सत्ता में काबिज इसी भाजपा का शाजापुर में टूटता जनाधार संगठन के लिए गंभीर चिंतन और मंथन का कारण है। 
 
आंकड़ों के मुताबिक साल 2013 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद पिछले पांच सालों में जितने में भी लोकतांत्रिक चुनाव हुए उनमें पार्टी को जबर्दस्त हार का सामना करना पड़ा है। लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के दम पर संसदीय सीट में मिली जीत के बाद चाहे वो जिला पंचायत या जनपद पंचायत के चुनाव हों या फिर नगरपालिका व नगर पंचायतों के निर्वाचन लगभग सभी में संगठन को गुटबाजी से ग्रसित कांग्रेस जैसी पार्टी के हाथों पराजय झेलना पड़ी है। 
 
एसा नहीं है कि इसके पीछे जनप्रतिनिधियों के प्रति उपजा कोई जनाक्रोश या असंतोष कारण रहा है, बल्कि देखा जाए तो विधानसभास्तर पर जितने काम बीते पांच सालों में हुए उतने पिछले पचास सालों में भी नहीं हुए होंगे, लेकिन इसके बावजूद सत्तासुख भोगने वाली पार्टी के संगठन का अंदरूनी रूप से कमजोर होना पार्टी के कमजोर पड़ते जनादेश की हकीकत खुद बयां करता दिखाई देता है। 
 
पिछली चुनावी हार के कारणों को देखते हुए भाजपा की संगठनात्मक स्थिति की यदि बात की जाए तो इसके पीछे एक बड़ा कारण जिलामुख्यालय पर भाजपा और उसके मोर्चा व प्रकोष्ठ में किसी मजबूत जिला नेतृत्व का नहीं होना है जो चुनावी दौर में जीत की बागडोर अपने हाथों में थामकर डंके की चौंट पर पार्टी को विजयश्री दिलवाने का दम रख सके। चाहे भाजपा हो या महिला मोर्चा, युवा मोर्चा अथवा अल्पसंख्यक मोर्चा इनमें विजयी नेतृत्व रखने वाले पदाधिकारी की कमीं पार्टी को चुनावी संग्राम में निश्चित खलती दिखाई देती है, हालांकि जिलामुख्यालय पर पार्टी के जिला पदों पर काम करने वाले कुशल संगठक की भूमिका बेशक बखूबी निभाते हैं लेकिन जनता के बीच जाकर जनाधार रखने वाला कोई भी एसा नेतृत्व संगठन में फिलहाल नजर नहीं आता, जो जनता के विश्वास को पार्टी के प्रति समर्थन में बदल सके। ऐसे हालात में पार्टी के घोषित उम्मीदवार सहित प्रत्येक कार्यकर्ता को पिछली विधानसभा जीत का इतिहास दोबारा दोहराने के लिए ना केवल कड़ी मेहनत करना जरूरी है बल्कि जीत के अल्पमत वाले अंतराल को खत्म करने के लिए रिकार्ड मतों से जीत हासिल करने की भीष्म प्रतिज्ञा धारण करना भी जरूरी है।
 
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