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दलित वोटर पलट सकते हैं बाजी, रिझाने में जुटे दल

By HindusthanSamachar | Publish Date: Nov 1 2018 12:06PM
दलित वोटर पलट सकते हैं बाजी, रिझाने में जुटे दल
भोपाल, 1 नवंबर(हि.स.)। राजनीतिक पार्टियों ने दलितों को हमेशा वोट बैंक के नजरिए से देखा है। देश का हृदय प्रदेश मप्र के राजनीतिक दल भी इससे अछूते नहीं हैं। विधानसभा चुनाव के लिए यहां भी भाजपा, कांग्रेस और बसपा में दलितों के वोट हासिल करने के लिए होड़ मची हुई है। प्रदेश में दलितों के करीब 80 लाख वोट हैं। जिन्हें पाने के लिए पार्टियों पूरी ताकत झोंक रखी है| आलम यह है कि पिछले 15 साल से सत्ता की मलाई चाट रही भाजपा को भी दलितों को लुभाने के लिए नई रणनीति अख्तियार करने पर मजबूर होना पड़ा है| यह हाल तब है, जब उसका राज्य की अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 35 सीटों में से 29 पर कब्जा है। इतना ही नहीं, 2008 और 2003 के विधानसभा चुनाव में उसे क्रमश: 28 और 30 सीटें मिली थीं, लेकिन इस बार हालात बदले हुए लग रहे हैं। इसमें एंटी इंकम्बेंसी का डर, दलितों में कांग्रेस और बसपा का बढ़ता प्रभाव प्रमुख है। एट्रोसिटी एक्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटकर भाजपा ने दलितों की नाराजगी कुछ कम करने की कोशिश जरूर की है। इसका फायदा चुनाव में मिलेगा, इस पर संशय है। लेकिन इतना जरूर है कि इस कदम से भाजपा ने अपने परम्परागत सवर्ण वोटर को नाराज जरूर कर दिया। दलितों में कांग्रेस और बसपा का प्रदेश में ज्यादा प्रभाव नजर नहीं आता है। 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों में से मात्र 3 पर विजय प्राप्त की थी| बसपा भी इसी अंक पर सिमट गई थी। 2008 और 2003 में कांग्रेस क्रमश: 7 और 3 सीटें जीत पाई थी। दूसरी ओर बसपा इन दोनों चुनाव में अपना खाता भी नहीं खोल पाई थी। बसपा बढ़ा रही है आधार प्रदेश में बसपा अपना आधार लगातार बढ़ाती जा रही है। कांग्रेस की प्रमुख चिंता यही है। बसपा 1990 से ही प्रदेश में जमीन तलाश रही है। लेकिन बड़ी कामयाबी नहीं हासिल कर सकी है। बसपा ने अभी तक जिनमें भी सीटें जीती हैं, उनमें से आरक्षित वर्ग की सीटें काफी कम हैं। वर्ष 2013 के विधानसभा चुनावों में बसपा को 21 लाख 27 हजार वोट मिले थे। ये कुल वोटर्स का 6.29 फीसदी थे। 12 सीटें ऐसी थीं, जहां पर बसपा उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहे थे। बसपा 35 सीटों पर सीधे मुकाबले में है। पार्टी का प्रभाव उप्र की सीमा से सटे इलाके ग्वालियर-चंबल, बुंदेलखंड, और विंध्य है। जहां उसके वोटर अच्छी खासी तादात में मौजूद हैं। भाजपा ने बनाई नई रणनीति नई रणनीति के तहत भाजपा 65000 भाजपा नेताओं को हर पोलिंग बूथ पर तैनात करेगी, पार्टी इन नेताओं को दलित कास्ट इंचार्ज यानि जाति प्रभारी के रूप में तैनात करेगी। इन तमाम जाति प्रभारियों को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वह दलित वोट बैंक को पार्टी के लिए संगठित करें। हर बूथ पर दलित नेता सूरज कुमार कैरो को पार्टी ने मध्य प्रदेश शेड्यूल कास्ट यूनिट का प्रभारी बनाया है। उनका कहना है कि इस कदम के जरिए हम हर जाति के लोगों को बूथ पर उनका प्रतिनिधित्व देना चाहते हैं। हमारे कार्यकर्ता इस बात की कोशिश करेंगे कि मतदाताओं को हर संभव मदद दी जाए, वह लोगों के घर जाकर उनकी मदद करेंगे, इसका हमारी पार्टी को निसंदेह लाभ होगा। कांग्रेस ने छेड़ा दलित उपमुख्यमंत्री का राग कांग्रेस ने दलित उपमुख्यमंत्री का राग छेड़कर उन्हें लुभाने का दांव चला है। बसपा से गठबंधन की उम्मीदें टूटने के बाद अब कांग्रेस सभी आरक्षित सीटों में अकेले मैदान में है। प्रदेश कांग्रेस प्रभारी दीपक बावरिया ने कहा कि अगर कांग्रेस की सरकार बनी तो वर्तमान कार्यकारी अध्यक्ष सुरेंद्र चौधरी भी उपमुख्यमंत्री हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि बौद्ध समाज को भाजपा ने कभी महत्व नहीं दिया। कांग्रेस ने देश को दलित राष्ट्रपति दिए। मप्र में ठीक वैसी ही परिस्थितियां पैदा करना है जो गुजरात के दलित समाज ने पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान की थी। भाजपा सरकार को सत्ता से उखाडऩा ही चुनौती होना चाहिए। हिन्दुस्थान समाचार/संजीव/राधा रमण
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