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चुनाव से राजमहल की शृंखलाओं में मौसम गुलाबी

By HindusthanSamachar | Publish Date: Apr 12 2019 6:26PM
चुनाव से राजमहल की शृंखलाओं में मौसम गुलाबी
-आजादी के सात दशकः हर चुनाव में पहाड़िया जनजाति पर निगहबान होती हैं राजनीतिक पार्टियां -मूलभूत सुविधाओं का अभाव, यहां हर चुनाव आता है उत्सव बनकर, नसीब होने लगता है दारू-मुर्गा गोड्डा, 13 अप्रैल (हि.स.)। इस बार का लोकसभा चुनाव भी ''राजमहल'' की पहाड़ियों (शृंखलाओं) में उत्सव बनकर आया है। आजादी के सत्तर दशक से हर बार ऐसा हो रहा है। वादों से फिर राजमहल की शृंखलाओं की वादियां गुलजार हैं। चुनाव के मौसम में यहां के पहाड़ों में अंग्रेजी खानपान से लेकर देशी मसाला ही नहीं, और भी सब कुछ मिलने लगा है। यहां के पहाड़ों पर पहाड़िया जनजाति के 80 हजार मतदाता हैं। इन्हें लुभाने के लिए राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता सक्रिय हो चुके हैं। राजमहल आदिवासी सुरक्षित सीट है। यह पहाड़ी शृंखला बोआरीजोर से राजमहल तक फैली हुई है। यहां ताटकुंडा, मेरेडेडे, केरलो, पुरिया बाजार सहित कई गांवों में इस वक्त रात देर से हो रही है। देशी मुर्गा और हड़िया (दारू) से पेट भरा जा रहा है। बाकी दिनों में इन लोगों को भरपेट खाना और शुद्ध पानी तक नसीब नहीं होता। अंधेरे में रहने को अभिशप्त इन लोगों पर जनप्रतिनिधियों को कभी तरस नहीं आया। यह दर्द इन लोगों की बातों में छलकता है। इस शृंखला में रहने वाले मैसा पहाड़िया का दर्द समझने की जरूरत है। वह कहते हैं, चुनाव में लोग यहां आते हैं। गांव में बिजली, पानी और स्वास्थ्य की सुविधा मुहैया कराने का वादा कर लौट जाते हैं। यह वादे कभी नहीं पूरे होते। योजनाएं जमीन से पहाड़ की ऊंचाई तक पहुंचने से पहले दम तोड़ देती हैं। वह सवाल करते हैं-इसके लिए जिम्मेवार कौन है? यह हैरानीजनक है कि मेसो परियोजना के तहत इस जनजाति के विकास के लिए बजट बनता है। यह पैसा कहां खर्च हो जाता है? यह रहस्य आज तक बरकरार है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुुमो) ने कई बार यहां से चुनाव जीता है। बरा कोठा गांव के प्रधान सुरेन्द्र पहाड़िया और ताटकुंडा के प्रधान मंगला मैसा पहाड़िया कहते हैं, चुनाव जीतने के बाद नेता सब भूल जाते हैं। उनकी पहली जरूरत शुद्ध पानी की है। झरनों और कुएं का पानी पीकर लोग आये दिन बीमार हो जाते हैं। आवागमन का कोई साधन नहीं है। गांव में कोई बीमार पड़ जाए तो अस्पताल पहुंचने से पहले ही सांस थम जाती है। चुनाव के मौहाल में खाने-पीने में मस्त यह जनजाति मूल सवाल भूल जाती है। जो खिलाने-पिलाने आए, उसका स्वागत करती है। इस सीट पर 14 लाख मतदाताओं में पांच फीसदी आबादी इनकी भी है। हिन्दुस्थान समाचार/रंजीत/वंदना/मुकुंद
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