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होली के तीसरे दिन हजारों क्षत्रिय निकालेंगे झंडे की शोभायात्रा

By HindusthanSamachar | Publish Date: Mar 17 2019 2:02PM
होली के तीसरे दिन हजारों क्षत्रिय निकालेंगे झंडे की शोभायात्रा
-गौरवंशीय राजाओं के वंशजों ने शान के प्रतीक झण्डे को यमुना में नहलाकर निकाली शोभायात्रा -यवनों से संघर्ष दौरान सिंहलदेव व वीसलदेव ने राजगढ़ से आकर की थी हम्मीरदेव की मदद हमीरपुर, 17 मार्च (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले में आदिकालीन क्षत्रिय वंशज गौर वंश का इतिहास, अपने आप में आज भी समेटे हुये कुरारा क्षेत्र की धरती पर गौर वंश का प्रतीक बना हुआ है। यहां का झण्डा जिसे आज भी होली पर्व के तीसरे दिन बड़े ही धूमधाम से निकाले जाने की परम्परा कायम है। इसमें हजारों की तादाद में क्षत्री हिस्सा लेते है। पूर्व के गौर वंशीय राजाओं के वंशज आज भी इस झण्डे को अपनी शान समझते हैं। जिले के कुरारा कस्बे में सैकड़ों सालों से झण्डा निकालने की परम्परा चली आ रही है। इस झण्डे के माहात्म्य के संबन्ध में कस्बे के बुजुर्ग रमेश सिंह गौर ने बताया कि पूर्व में महाराजा हम्मीरदेव ने यवनों से संघर्ष के लिये राजगढ़ (राजस्थान) रियासत से मदद मांगी थी। जिसमें वहां से सिंहलदेव व वीसलदेव ने यहां आकर हम्मीरदेव के प्राणों की रक्षा करते हुये विजयश्री दिलायी थी। युद्ध जीतने के बाद सिंहलदेव को विजय निशान के रूप में नगाड़ा दिया गया था तथा वीसलदेव को ध्वज दिया गया था। दोनों को ही बारह-बारह गांव उपहार स्वरूप दिये गये थे जिसमें वीसलदेव का विवाह हम्मीरदेव की पुत्री रामकुंवर के साथ हुआ था और इनकी नौ पीढिय़ों में सिर्फ एक-एक ही संतानें पैदा हुईं थी। नौवीं पीढ़ी में कोणार्क देव का जन्म हुआ था जिनके नौ संतानें पैदा हुईं थी। कोणार्कदेव के नाम पर ही कुरारा का नाम पड़ा। उन्होंने अपने सभी गांव अपनी संतानों को बांट दिये थे जिसमें कुरारा, रिठारी, जल्ला, चकोठी, पारा, कण्डौर, पतारा, झलोखर व नौवीं संतान को टीकापुर, बहदीना, कुम्हऊपुर व बैजेइस्लामपुर दिये गये थे। मौजूदा में हरेहटा गांव कभी हुरेहटा नाम से जाना जाता था और होली का जलसा वहीं पर मनाया जाता था। एक दर्जन गांवों के लोग वहीं पर एकत्र होते थे और झण्डे को हमीरपुर यमुना नदी में स्नान करवाकर कुलदेवी गौरादेवी के मंदिर पर पूजा अर्चना करने के बाद वहीं से झण्डे को नहलाकर कुरारा कस्बे में भ्रमण कराया जाता था। बाद में कुछ लोगों ने पंचायत कर कहा कि सिकरोढ़ी में ही यमुना नदी में झण्डे को नहलाया जाये लेकिन वहां पर नाला आदि रास्ते में होने के कारण इस झण्डे को बचरौली में काफी समय तक स्नान कराया जाता रहा मगर वहां भी क्षत्रियों से विवाद के कारण झण्डा कुरारा कस्बे तक सीमित होकर रह गया है। कोणार्कदेव की दो संतानों ने जन्म लिया था जिसके नाम पटलदेव व ठरानदेव हुये। इनके नाम से कुरारा कस्बे में आज भी दो मुहल्लों के नाम चले आ रहे हैं। महलदेव के चार पुत्र हुये जिनके नाम बलभद्र, नीर, हमीर व भीखम है जिसमें उनके वंशज आज भी कस्बे में निवास कर रहे है। बलभद्र की वंशावली में रमेश सिंह, चन्द्रभान सिंह, बाबू सिंह आर्य आदि है तथा नीर के वंशज जगत सिंह, पृथ्वीपाल सिंह, महेश्वरी सिंह आदि है। हम्मीर के वंशज शिवपाल सिंह, हरपाल सिंह, लल्लू, बाबू सिंह, राम सिंह, जगत सिंह है। इसके अलावा भीखम के पुत्र नहीं थे सिर्फ लड़की ही थी जिनके रिश्तेदारों में कंधी सिंह का नाम लिया जाता है। वहीं खानदेव के भी पुत्र नहीं थे। मात्र पुत्रियां हीं थी। उन्होंने अपने रिश्तेदारों को यहां पर बसा दिया था जो आज भी कुरारा कस्बे में रहकर वंश परम्परा को आगे बढ़ा रहे है। कुरारा कस्बे में झण्डा एक एतिहासिक पर्व माना जाता है जिसमें समाज के सभी वर्गों के लोग बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते है और कुरारा क्षेत्र का यह झंडा शान का प्रतीक बन चुका है। सैकड़ों साल पुरानी परम्परा को आगे बढ़ाते हुये यह झण्डा होली के तीसरे दिन धूमधाम से निकाले जाने की परम्परा है। इस परम्परा को धूमधाम से मनाये जाने के लिये अब तैयारियां शुरू कर दी गयी है। कण्डौर गांव में आठवें दिन होती है होली हमीरपुर जिले में गांव-गांव की अपनी अलग-अलग परम्परायें होती है। इसी परम्परा में जिले के कुरारा क्षेत्र के ग्राम कण्डौर में आठवें दिन होली मनाई जाती है। इस सम्बन्ध में रमेश सिंह गौर ने बताया कि गौर वंश की नौंवीं पीढ़ी में कोणार्कदेव ने आठ दिन तक अलग-अलग गांवों में होली मनाने की परम्परा कायम की थी जिसमें आठवां एवं अंतिम दिन कण्डौर के हिस्से में आया था। अन्य गांवों ने तो परम्परा तोड़ दी है लेकिन हमीरपुर जिले के कण्डौर गांव में सैकड़ों साल पुरानी यह परम्परा आज भी कायम है। सैकड़ों सालों से कण्डौर गांव में आठवें दिन ही होली का पर्व मनाया जाता है जिसे देखने के लिये क्षेत्र के कई गांवों के लोग फाग गायन में शरीक होते हैं। हिन्दुस्थान समाचार/ पंकज/सुनीत
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