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बस्तर की बोली-भाषा अपने आप में समृद्ध : अनूप रंजन पांडेय

By HindusthanSamachar | Publish Date: Mar 17 2019 12:58AM
बस्तर की बोली-भाषा अपने आप में समृद्ध : अनूप रंजन पांडेय
अनूप रंजन पांडेय पद्मश्री अलंकरण से विभूषित रायपुर, 16 मार्च (हि.स.)। बस्तर की कला-संगीत को आगे बढ़ाने का श्रेय अनूप रंजन पांडेय को जाता है। शनिवार को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के हाथों राष्ट्रपति भवन में अनूप रंजन पांडेय को पद्मश्री अलंकरण से विभूषित किया गया। श्री पांडेय ने हिन्दुस्थान समाचार से बातचीत में बताया कि पद्मश्री सम्मान का श्रेय मेरे गुरु हबीब तनवीर के साथ ही छत्तीसगढ़ के सभी लोक-कलाकारों को जाता है। उन्होंने सुझाव देते हुए कहा कि राज्य सरकार को स्कूली पाठयक्रम में बस्तर की संस्कृति, लोक-गीत, कथाओं को शामिल करने की जरुरत है। बस्तर की बोली-भाषा अपने-आप में समृद्ध है, इसकी वैश्विक जगत में अनुगूंज है। आदिवासियों की जल, जंगल और जमीन उनके पास रहे, जिससे वे प्रेरणा लेकर अपनी कविता, नृत्य और ज्ञान को बढ़ाते रहें। ऐसा वातावरण बनना चाहिए, जिससे बस्तर में शांति स्थापित हो। आदिवासी समुदाय हजारों साल की लोक-परंपराओं को संजोए रखे हैं, उसे सीखने की जरूरत है। बस्तर की कला-संस्कृति जीवन्त है। श्री पांडेय ने अंतिम सांस तक मातृभूमि की सेवा करने की बात कही। उन्होंने बस्तर बैंड सहित प्रदेशभर के कलाकारों के प्रति आभार व्यक्त किया। श्री पांडेय ने शायराना अंदाज में कहा कि ''रात भर का हैं मेहमां अंधेरा, इसके आगे तो है बिल्कुल सवेरा।'' जीवन परिचय : पांडेय का जन्म 21 जुलाई 1965 को बिलासपुर में हुआ। माता मनोरमा पांडेय, पत्नि-अस्मिता पांडेय, बेटी-अन्नया पांडेय हैं। उनके पिता का नाम दिवंगत राधेश्याम था। अनूप की प्रारंभिक शिक्षा बिलासपुर के रेलवे स्कूल से हुई। पिता राधेश्याम पांडेय स्कूल के प्राचार्य भी थे। स्कूल समय से ही उन्हें म्यूजिक की रुचि थी। सीएमडी कॉलेज से स्नातक की शिक्षा ली। इन्होंने खैरागढ़ इंदिरा कला संगीत विश्वविदयालय से लोक संगीत में पीएचडी की। पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविदयालय से पत्रकारिता की भी शिक्षा हासिल की है। साथ ही अच्छे लेखक भी हैं। स्वास्थ्य के क्षेत्र में एमएसडब्ल्यू सहित अनेक डिग्रियां कीं। अनूप ने साक्षरता अभियान में विभिन्न अवसरों पर सक्रिय भूमिका निभाई। स्कूल समय से ही वे कलामंच से जुड़े रहे। रेलवे नाट्य स्पर्धाओं में भाग लिया। टीम बनाकर वाद्ययंत्रों का प्रदर्शन किया। बस्तर बैंड नाम से टीम बनाई और देश विदेश में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। इसके पहले उन्हें राज्य शासन के दाऊ मंदिरा पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है। वर्तमान में वे रायपुर के सेल्स टैक्स कॉलोनी खम्हारडीह शंकर नगर में निवासरत हैं। बिलासपुर के विद्यानगर में उनका घर हैं और बिलासपुर से 32 किमी दूर जांजगीर-चाम्पा जिले का ''''कोसा'''' पैत्रिक गांव है। पद्मश्री अलंकरण मिलने पर प्रदेशवासियों में खुशी की लहर है। बस्तर बैंड के प्रमुख वाद्य यंत्र : मडिया ढोल, तिरडुडी, अकुम, तोडभ्, तोरम, मोहिर, देव माहिर, नंगूरा, तुडबुडी, कुंडीड, धुरवा ढोल, डंडार ढोल, गोती बाजा, मुण्डा बाजा, नरपराय, गुटापराय, मांदरी, मिरगीन, ढोल, हुलकी मांदरी, कच, टेहंडोर, पक टेहंडोर, उजीर, सुलुड, बांस, चरहे, कोंडोडका, हिरनांग, झींटी, चिटकूल, किरकीचा, डंडा, धनकुल, तुपकी, सियाडी, वेद्दुर, गोगा ढोल आदि। देश के लगभग सभी मुख्य मंचों और आयोजनों के साथ-साथ दुनिया के विभिन्न हिस्सों में अपनी अभिनय क्षमता का परचम फहराते हुए ''जिन लाहौर नई देख्या`, मुद्राराक्षस, वेणीसंहारम, मिड समर नाईटस् ड्रीम, चरणदास चोर, आगरा बाजार, देख रहे हैं नैन, ससुराल, राजरक्त, हिरमा की अमर कहानी, सड़क, मृच्छकटिकम जैसे नाटक में इनका अभिनय जिस तरह से जीवंत हुआ है वह किसी भी दर्शक के लिए अविस्मरणीय रहा है। अनूप द्वारा अभिनीत भूमिकाओं को दर्शकों के साथ-साथ नाटय सुधियों, निर्देशकों और समीक्षकों द्वारा लगातार सराहना मिलती रही है। अनूप रंजन पांडेय ने अपनी संस्था बस्तर बैण्ड के माध्यम से छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल की कला संस्कृति को संरक्षित करने का सराहनीय कार्य किया। हिन्दुस्थान समाचार/गायत्री प्रसाद/
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