Hindusthan Samachar
Banner 2 गुरुवार, मार्च 21, 2019 | समय 05:25 Hrs(IST) Sonali Sonali Sonali Singh Bisht

पर्यावरण प्रेमियों ने अरावली में की नेचर वाक

By HindusthanSamachar | Publish Date: Mar 16 2019 9:47PM
पर्यावरण प्रेमियों ने अरावली में की नेचर वाक
फरीदाबाद, 16 मार्च (हि स)। विश्व की प्राचीनतम अरावली पहाड़ियां अपने अंदर जैविक, भौगोलिक और वानस्पतिक विशेषताएं समेटे हुए हैं। इन पहाड़ियों में वर्षों पुरानी चट्टानें हैं तो उन पर उगे पुराने वृक्ष से लेकर प्रतिवर्ष उगने वाली झाड़ियां और घास भी। मांसाहारी पशुओं का वर्चस्व है तो जंगली होने के बावजूद मानव से घुल मिल चुके बंदर, लंगूर आदि पशुओं का घर। शहरों से गायब हो चुके पक्षी भी अरावली की फिजाओं में उड़ान भरते नजर आते हैं तो सिर्फ जंगल में रहने वाले उल्लू जैसे पक्षी भी यहां बस रहे हैं। अरावली और उसके जंगल को बचाने की लड़ाई लड़ रहे सेव फरीदाबाद टीम के सदस्यों ने शनिवार को नेचर वॉक का आयोजन किया। अरावली एन्साइक्लोपीडिया के नाम से मशहूर सुनील हरसाना ने वॉक में शामिल हुए लोगों को अरावली की विशेषताओं के बारे में विस्तार से जानकारी दी। नेचर वॉक में कपिल पाराशर, विजय विश्वकर्मा, दीपक मिश्रा, पवन शर्मा, विष्णु गोयल, वीर प्रताप शर्मा, चौधरी धीरज राणा, अजय गौतम, राजेश शर्मा, दिव्यांश भाटिया, गर्वित गोयल, दृष्टि गोयल, दीपांकर बरुआ आदि विभिन्न प्रकृति प्रेमी मौजूद रहे। अरावली की फिजाओं में उड़ रहे स्टेप ईगल, इजिप्शियन वल्चर, स्पॉटेड आउल (उल्लू की सबसे छोटी प्रजाति), रेड वेंटेड बुलबुल, रूपस ट्री पाई, फैनटेल, ओरिएंटल मैग्पाई रॉबिन, रॉबिल, पर्पल सन बर्ड, रोज रिंग पैराकीट्स और ब्लैक काइट आदि दिखाए। सुनील हरसाना ने जंगल में पंजों के निशान से पशुओं की पहचान करवाई। लकड़बग्घा, गीदड़, नीलगाय आदि पशुओं के पंजों के निशान दिखा कर उनके बारे में बताया। बताया कि प्रत्येक पशु एक खास इलाके में रहता है, वह अपने इलाके की पहचान के लिए कुछ निशान बनाता है, जैसे नील गाय अपने इलाके की पहचान अपने गोबर से करती है। तेंदुआ भी अपने इलाके की पहचान पेड़ों पर नाखून के निशान और पेशाब कर के बनाता है, दूसरा तेंदुआ पेशाब की गंध और निशान देख कर समझ जाता है कि यह किसी अन्य का क्षेत्र है। उन्होंने जंगल में सीवेट (बिल्ली और नेवले से मिलती बनावट वाला पशु), गीदड़, लकड़बग्घे के पंजों के निशान दिखाए और इनके पंजों में फर्क के बारे में विस्तार से बताया। अरावली की पहाड़ियों पर वनस्पति उगने के पैटर्न के बारे में भी उन्होंने समझाया। बड़ी चट्टानें जहां मिट्टी की मात्रा न के बराबर होती है, वहां सालन, बरगद जैसे वृक्ष पनपते हैं। चट्टानों के अपरदन से बने पथरीले इलाके में धौ, दूधी, पसेंदू या बिस्तेंदु, सिरिस जैसे पौधे उगते हैं। पानी के बहाव वाले चट्टानी इलाकों में कृष्णा कदंब, जंगली खजूर और अमलतास आदि पौधे होते हैं। पहाड़ी के ऊपर मैदानी जैसे इलाके में कुम्ठा, रौंज, ढाक और पापड़ी आदि वनस्पतियां पाई जाती हैं। पहाड़ी की ढाल वाले इलाके में बांसा, गंगेर और हीस आदि झाड़ियां लगी हुई दिखाईं। अरावली की पहाड़ियां भूजल रिचार्ज करने में किस तरह मदद करती हैं हरसाना ने इस बारे में भी बताया। ठोस चट्टानों के बीच पड़ी खड़ी दरारों को दिखाते हुए उन्होंने बताया कि यह दरारें जमीन के अंदर भी इसी तरह चली गई हैं। इन दरारों के जरिए बरसात का पानी रिसते हुए जमीन के अंदर समा जाता है। परसोन मंदिर के पास चट्टान से निकल रहे झरने के बारे में बताया कि इसका पानी पहाड़ियों के नीचे बने किसी प्राकृतिक टैंक में जमा होता है। चट्टानों से बने प्राकृतिक टैंक में भी बहुत महीन दरारें होती हैं जिनसे रिसते हुए पानी बाहर आता है, जिस जगह से पानी बाहर आता है उसे झरना कहते हैं। उन्होंने बताया कि अरावली में प्रति वर्ष प्रति हेक्टेयर 20 लाख लीटर पानी जमा होता है, यदि जंगल कटे तो पानी का भूजल रिचार्ज का यह स्त्रोत खत्म हो जाएगा। हिन्दुस्थान समाचार/मनोज/वेदपाल
लोकप्रिय खबरें
फोटो और वीडियो गैलरी
image