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आजादी के 70 साल बाद भी एक अदद सड़क को तरस रहा ठाठा गांव

By HindusthanSamachar | Publish Date: Jul 14 2018 12:42PM
आजादी के 70 साल बाद भी एक अदद सड़क को तरस रहा ठाठा गांव
विशेष ... बेगूसराय,14 जुलाई (हि.स.)। आजादी के 70 साल बीत गए| इस दौरान कई सरकारें आईं और गईं| बहुत कुछ बदला, विकास भी हुआ। लेकिन, नहीं बदली तीन तरफ से बूढ़ी गंडक से घिरे ठाठा गांव की तकदीर। गांव में सरकारी चापाकल है जो चलता नहीं, सोलर लाइट है जो जलती नहीं। यहां सड़कों का अभाव है। बारिश शुरू होते ही पांच महीने तक आवागमन का एक ही साधन है नाव और वह भी मात्र दिन में| रात में अगर कोई बीमार पड़ जाए तो मौत के सिवा कोई विकल्प नहीं। ग्रामीणों ने डीएम से पीएम तक कई बार आवेदन दिया| जनवरी 2018 में प्रधानमंत्री को आवेदन भेजने बाद पीएमओ से 19 जनवरी 2018 को बिहार के मुख्य सचिव को आवेदन पर कार्रवाई के लिए लिखा गया। लेकिन छह माह बीतने के बाद भी मामला जस का तस है। कुल मिलाकर चेरिया बरियारपुर प्रखंड के शाहपुर पंचायत का पांच हजार की आबादी वाला गंडक पार का यह गांव ठाठा 21वीं सदी में भी बदहाली के आंसू बहाने को विवश है। आज भी है बाजार, पंचायत, थाना, प्रखंड मुख्यालय के अलावा कहीं भी जाने के लिए गंडक नदी का ही सहारा है। ग्रामीण चंदन राज ने करीब दो लाख रुपये की नाव खरीदकर दी है| उसके नाविक को सभी ग्रामीण परिवार साल में 20 किलो गेहूं मेहनताना देते हैं। कई बार पीपा पुल की मांग की गई, लेकिन कोई सुनता नहीं। जबकि आठ साल से यहां के विधायक बिहार सरकार के महत्वपूर्ण विभाग में मंत्री हैं। गांव से जिला मुख्यालय जाने के लिए भीठसारी होकर कच्चा रास्ता है। बारिश के समय करीब पांच महीनों तक यह रास्ता बंद हो जाता है। ग्रामीण बूढ़ी गंडक नदी पर पुल की आशा छोड़ ठाठा से भीठसारी तक करीब तीन किलोमीटर कच्चे रास्ते पर सेलिंग या पीसीसी करवाने की मांग स्थानीय मुखिया रिंकू देवी से करते हैं तो बीच में कुछ निजी जमीन है, कह दिया जाता है। लेकिन जब जमीन देने वाले तैयार होते हैं तो कहती है अब फंड ही नहीं है। हालांकि कभी-कभार बालू जरूर डलवाई जाती है। प्राकृतिक सौंदर्य का नमूना, तीन तरफ से घिरे इस गांव की 60 प्रतिशत गलियां आज भी कच्ची हैं। उप स्वास्थ्य केंद्र का भवन तो बना, लेकिन डॉक्टर या नर्स कभी नहीं आते हैं। सरकारी चापाकल देखरेख-मरम्मत के अभाव में बेकार पड़ा है, करीब 10 वर्ष पूर्व लगाई गई बंद पड़ी सोलर लाइट भी खराब है। हलांकि गांव में एक मध्य विद्यालय जरूर है। चंदन राज, संजीत प्रसाद सिंह, हरिकृष्ण पासवान समेत अन्य ग्रामीण बताते हैं कि बारिश के समय इलाज के अभाव में लोग और असमय काल-कलवित हो जाते हैं। किसे सुनाएं, कोई सुनता ही नहीं है। चुनाव के समय बड़े-बड़े लोग आते हैं, बड़े-बड़े वायदे होते हैं। लेकिन सदन पहुंचते ही वादा भूल हम सबको दोजख भरी जिंदगी जीने को छोड़ दिया जाता है। उन्होंने बताया कि चुनाव पूर्व सड़क नहीं बनी तो अब गांव के सभी गलियों में बैनर लगाकर नेता, अधिकारी को गांव में प्रवेश करने से रोका जाएगा। हिन्दुस्थान समाचार/सुरेन्द्र/अरुण/सुप्रभा/राधा रमण
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